गोडसे नहीं है गांधीजी का हत्यारा…? तो कौन है…?

इतिहास के पन्नों में आज की तारीख 30 जनवरी भारत के राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी की पुण्यतिथि के रूप में जानी जाती है l उन्हें सरेआम नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी थीl उनके आखरी शब्द थे ‘हे राम’ l आजादी के लगभग 5 महीनों के अंतराल में हमने गांधीजी जैसे एक बहुत ही बड़े नेता हमारे राष्ट्रपिता को खो दिया l

क्या सच में हमने उन्हें 30 जनवरी 1948 को खो दिया…?

अगर नाथूराम गोडसे गांधीजी को नहीं मारते तो क्या होता…?

आज जिस समाज में हम जी रहे है वहां गांधीजी का स्थान कहां होता…?

क्या आधुनिक युग में भारत के राष्ट्रपिता का स्थान सही जगह है…?

क्या उनके मौत की वजह कुछ और होती…?

क्या वो स्वाभाविक मौत मरते या उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती…?

गांधीजी ने इसी(आज) भारत का ही सपना देखा था…?

क्या सच में हमें गांधीजी वाली आजादी मिल गयी है…?

बहुत सारे सवाल है और बहुत सारे जवाब…!

कहने को तो हम हर साल 30 जनवरी को गांधीजी की पुण्यतिथि मनाते है और बहुत सारे लोग नाथूराम गोडसे को कोसते भी है l पर क्या उन लोगो से यह सवाल करना गलत है…? अगर गलत है तो बस वही जो सवाल करता हैl   इसका मतलब की समयधारा…!

क्या हो गया है हमारे समाज को गांधीजी ने एसे आजाद भारत का सपना नहीं देखा था जहां कभी उनके चरखे को लेकर विवाद होता है, तो कभी उनके नोट पर फोटो को लेकर, तो कभी उनकी स्वच्छ भारत की छवि को लेकर, तो कभी उनके नाम पर किसी मूर्ति का अनावरण हो या कभी किसी सड़क का नाम उन्हें समर्पित कर दिया जाए …..?

गौर करने वाली बात यह है की कभी भी विवाद उनके काम या आचरण को लेकर नहीं होता और विवाद या अपना मतलब सिर्फ उनके नाम से होता है l आज के भारत में उनका नाम उनके काम से कही मीलों आगे है और शायद यह दूरियां और भी बढ़ेगी lयह नाम और काम का फासला और फैलता जायेगा और हम उस मुकाम पर पहुंच जायेंगे। जहां सिर्फ और सिर्फ गांधीजी का नाम ही रह जाएंगा l उनका आचरण उनके काम उनके आदर्श सिर्फ किताबों में रह जायेंगे l आज मुझे या मुझ जैसे लोगों को बहुत ही शर्म आती है कि कहां है हमारे बापू l और जब मैं उनकी तलाश करने निकलता हूं, तो वह मिलते है किसी चश्में की दुकान पर, तो कही सड़क के बीच उनका पुतला या फिर नोटों पर हर जगह वह है …

हाहाहा… सच में बापू तो हर जगह है और मैं निकला था उन्हें तलाश करने इतना भी दिमाग नहीं चला की जेब में हाथ डालते ही मुझे बापू मिल जाते है…. मैं मुर्ख उन्हें तलाश करने घर से निकल चला ….!

लेकिन क्या सच में मुझे बापू मिल गए है ….?

मुझे माफ़ कर देना आप सभी लोग अगर मैंने आपके अपने बापू को अपने पास रख लिया l बहुत जरुरत थी मुझे बापू की। कभी मैंने उसे तिजोरी में रखा, तो कभी बिस्तर के नीचे। बापू…..थोड़े से चंचल है कभी -कभी वह हफ्तों बाहर रहते है…! मुझे उनसे इतना प्यार है कि उन्हें मैं अपने पास संभालकर रखता हूं  और वह कुछ दिन कभी बाहर भी चले जातें है तो में चिंतित बीमार हो जाता हूं …!

शायद मोदीजी को यह बात अच्छी नहीं लगी इसीलिए उन्होंने बापू को वापस बैंक में जमा करने को कहा…

उनके पास जहां वह आराम से रहेंगे ….! और देखो सबकी शामत आ गयी ..!

मैं सोच रहा था कि बापू सिर्फ मेरे है पर यह क्या बापू तो सबके पास निकले किसी के पास ज्यादा तो किसी के पास कम…?

बापू के लिए इतनी लड़ाई आजाद भारत में हमने कभी नहीं देखी l बहुत सारे सवाल है और बहुत सारी बातें l मैं अगर यह लेख लिखने बैठूं तो शायद एक महीना भी कम हो क्योंकि हमने बापू को अमर तो कर दिया पर वह हर रोज किसी न किसी रूप में मर रहे है l अगर आपको लगता है की हमें बापू को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो सिर्फ उनके नाम को ही मत अपनाओ। उनके काम, उनके आचरण, उनके आदर्श को भी अपनाओ सही मायने में यही बापू के लिए सच्ची  श्रद्धांजलि होगी l

कुछ पंक्तिया है जरा गौर से पढ़िये

बापू तेरे नाम को करें हम सलाम

हां तूने ही कहा था जाते जाते ‘हे राम’

हमने समझ लिया बापू ने लिया खुदा का नाम

पर न समझे तूने क्यों कहा था ‘हे राम’

आजादी के लिए तूने कितना कष्ट उठाया

और हमने आजादी का बस जश्न मनाया

अहिंसा को तूने अपना शस्त्र बनाया

तेरे नाम का हमने वस्त्र सिलवाया

बापू तेरे नाम का बहुत बढ़ा है चमत्कार

आज भी हम करतें है तेरे नाम का वार

अपनी खुशियों को तूने कब का दिया था मार

बापू तूने आजाद भारत का सपना किया साकार

समयधारा की ओर से बापू को श्रद्धांजलि!

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