क्या पुरुष औरतों के सबसे बड़े दुश्मन है? नहीं..! तो फिर कौन है ….?

हमारे देश में हर साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। महिलाओं के सशक्तिकरण की बड़ीबड़ी बातें की जाती है, भाषण दिए जाते है, इतना ही नहीं देश,सरकार, पुलिस और विभिन्न संस्थानों ने महिलाओं की उन्नति, प्रगति और उनके अधिकारों का ढोलक भी पीटा। यहां सोचने वाली बात है कि असल में महिला दिवस क्या है और उसका सशक्तिकरण कैसे होना चाहिए। वैसे तो सदियों से औरतों के दमन के लिए पुरुषों को कोसा जाता रहा है, पर क्या सच में महिलाओं के दमन, उनके साथ होने वाले अनाचारअत्याचार के लिए मात्र पुरुष ही दोषी है? बिल्कुल नहीं।

दरअसल मेरी इस अवधारणा के पीछे हाल का एक केस है,जिसकी साक्षी मैं खुद रही हूं।देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में कार्यरत मेरी एक महिला सहकर्मी का मानसिक शोषण इस बात का गवाह है कि हर प्रकार के शोषण के लिए हम पुरुषों को आड़े हाथ नहीं ले सकते, क्योंकि एक पुरुष के अत्याचारों को बढ़ावा भी एक औरत ही देती है।

अगर आप सोच रहे हैं कि मैं महिला विरोधी हूं या पुरुषों के वर्चस्व की बात करने जा रही हूं तो आप बिल्कुल गलत है। आज मैं आपके साथ एक ऐसी सच्ची घटना के बारे में बात करने जा रही हूं जिसकी प्रत्यक्ष गवाह मैं रही हूं और इस घटना ने मेरे अंदर की महिला को झकझोर के रख दिया।

अवनी (बदला हुआ नाम) ने देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान में उम्मीदों और सपनों के साथ कदम रखा था। अपने काम के बल पर उसने वाहवाही तो बटोरी, लेकिन सिर्फ शब्दों में। कॉरपोरेट वर्ल्ड में महिलाओं से सिर्फ काम में ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जाती। यहां एक एक्स फैक्टर भी साथ में काम करता है, जो अवनी को नहीं पता था। कुछ ही महीनों में बेस्ट परफॉर्मर बनने के बाद भी उसे कोई उन्नति नहीं दी गई और ही उसके पैकेज में इजाफा हुआ,लेकिन अवनी को अपने काम से बेइंतहा प्यार था और वो काम करती रही। यहीं से शुरू हुआ उसका मानसिक शोषण, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। उसे काम करता देख ऑफिस के कुछ खास तबके के लोगों को उससे इर्ष्या होती कि बाकी लड़कियों की तरह यह हमें घास क्यों नहीं डालती, इतनी परफेक्ट क्यों है और वह मौका तलाशते रहे कि कैसे उसके रास्ते में कांटे बिछाएं जाएं और भी फिर एक दिन उसके ऑफिस के सहकर्मी ने सौम्य सभ्य अवनी के साथ पूरे डिपार्टमेंट के समक्ष अभद्र व्यवहार किया और आपत्तिजनक निजी कटाक्ष किए।

यह सब अवनी के लिए इतना अप्रत्याशित था कि वह समझ ही नहीं पाई कि ऐसा क्यों हो रहा है? जब उसने इसका विरोध किया तो मामले ने तूल पकड़ लिया और बात उस मीडिया संस्थान के उच्च अधिकारियों तक पहुंची। अवनी ने इस बाबत जब कंपनी की महिला एचआर से बात की, तो उन्होंने भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा। वर्क प्लेस पर किसी भी महिला के साथ अभद्र व्यवहार असहनीय और अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन अगली सुबह जब अवनी ऑफिस पहुंची तो नजारा पूरा बदला सा था। उसने जाकर अपनी महिला बॉस से बात की, तो वह पूर्वाग्रह से परिपूर्ण होकर उससे बोलीसब इशू तुम्हारे साथ क्यों होते है? इतना सुनकर अवनी के होश उड़ गए क्योंकि इतने सालों में वह तो कभी किसी के साथ लड़ी या ऊंची आवाज में बात तक नहीं की थी। खैर! बॉस ने मीटिंग शुरू की और उस खास तबके के प्रमुख लोग जो मैनेजमेंट का भी हिस्सा थे, उसमें शामिल हुए और इस मीटिंग में उस पुरुष सहकर्मी को बड़ी इज्जत के साथ बोला गया कि वह बाहर बैठे और अवनी के साथ शुरू हुआ आरोपों का शर्मनाक दौर। वह बोलती रही,चीखती रही कि मेरे साथ हुए अभद्र व्यवहार का पूरा डिपार्टमेंट गवाह है। कृपा किसी को भी बुलाकर पूछ लें,लेकिन उस खास तबके की महिला मैनेजर ने अवनी की बॉस को पहले ही पट्टी पढ़ा दी थी और अवनी के लिए किसी गवाह को बुलाया गया और ही उसके सबूत देखे गए। एक बंद कमरे में अवनी के साथ इस प्रकार व्यवहार हुआ जैसे किसी बलात्कार पीड़िता के साथ होता है।

एक परफॉर्मर, अपने काम के प्रति निष्ठावान उस लड़की को दोनों महिला अधिकारियों ने खूब लताड़ा और आरोपित किया। वह रोती रही और चीखती रही कि मेरा भी एक पक्ष है और पुख्ता सबूत है, आप लोग कृपा करके मेरी भी बात सुनिए कि मेरे साथ वास्तव में गलत हुआ,लेकिन उसकी एक सुनी गई।मीटिंग के ढकोसले के बाद अवनी से खानापूर्ति के लिए पूछा गया कि वह क्या चाहती हैतब तक अवनी समझ चुकी थी कि कुछ नहीं होने वाला,लेकिन वह देखना चाहती थी कि सारा महिला मैनेजमेंट किस हद तक जाता है उस अपराधी को बचाने के लिए और जल्द ही यह दिख भी गया।

जिस एचआर ने सबसे पहले अवनी को ढ़ांढस बंधाया था वही अवनी की बॉस और उस खास तबके से संबंधित महिला मैनेजर के समक्ष बोलीहमने सब पड़ताल कर ली है आपके साथ कुछ नहीं हुआ और जिसकी आप कंप्लेन कर रही है वह बहुत ही सभ्य व्यक्ति है।एचआर का यह दोगलापन देखकर अवनी ठगी सी रह गई, लेकिन खुद को संभालते हुए बोलीठीक है मेरे भी कुछ गवाह और सबूत है,यदि आप कहें तो मैं दिखाना चाहती हूं।इतना सुनते ही एचआर अवनी पर चिखकर बोलीदेखो बोल दिया सब ठीक है अगर तुम्हें ज्यादा परेशानी है तो तुम इस्तीफा दे दो।अब अवनी की हालत कांटे तो खून नहीं जैसी थी। वह समझ ही नहीं पा रही थी कि ऐसा उसके साथ क्यों हो रहा है। वह सही है, उसके पास पुख्ता सबूत है लेकिन फिर भी अपराधी को सजा देकर उसपर क्यों इस्तीफे का दवाब बनाया जा रहा है।

अवनी के साथ जो हुआ ऐसा अक्सर कॉरपोरेट वर्ल्ड और विशेष रूप से मीडिया में होता है,लेकिन यहां सोचने वाली बात यह है कि अवनी के साथ वास्तव में बुरा किया किसने? उसके सच का गला घोंटा किसने? क्या अवनी का दोषी वह पुरुष सहकर्मी है जिसने अभद्रता की? नहीं! उस पुरुष सहकर्मी ने जो भी किया वह उसकी फितरत थी,लेकिन उसकी अभद्रता और उसके अत्याचारों को पल्लवित किया मैनेजमेंट में उच्च पदों पर आसीन तीनों महिला अधिकारियों ने। जब तक इस प्रकार की महिलाएं किसी भी संस्थान में रहेंगी, तब तक कोई महिला कहीं सुरक्षित नहीं है। हर बात के लिए हम पुरुषों को दोष नही दे सकते। अपराधी पुरुषों को बचाने वाली और बढ़ावा देने वाली इसप्रकार की महिलाएं भी दोषी होती है। शायद इसलिए पुराने जमाने की एक कहावत आज तक कायम हैऔरत ही औरत की दुश्मन होती है

जब तक समाज में इसप्रकार की अत्याचारी औरतें उच्च पदों पर आसीन है, तब तक कोई मतलब नहीं है महिला दिवस जैसे दिनों को मनाने का। बात चाहे घर की हो या ऑफिस की। यदि कोई भी महिला विकृत मानसिकता और अत्याचारी पुरुषों की हरकतों को अपने स्वार्थ के चलते बढ़ावा देती है तो महिला सशक्तिकरण की बातें मात्र हास्यस्पद से ज्यादा कुछ नहीं लगती।

यहां यह बताना जरूरी है कि अवनी ने इसप्रकार की अपराधिक प्रवृति वाले महिला मैनेजमेंट से अकेले अपने दम पर लोहा लिया और उन्हें अपनी सच्चाई हिम्मत के आगे झुका ही दिया। अवनी ने अपने नाम को सार्थक करते हुए अपनी सच्चाई की आग के साथ उन सभी लोगों का सामना किया। असली महिला सशक्तिकरण की मिसाल अवनी जैसी महिलाएं हैं जो गलत के आगे घुटने नहीं टेकती और अपने सम्मान के लिए किसी भी जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने से कतराती नहीं है। समाज में जब तक अवनी जैसी लड़िकयां मौजूद है तब तक उम्मीद की किरण बरकरार है।

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