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अगर बीजेपी मुस्लिम विरोधी है तो क्या ओवैसी हितैषी है?

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले थे। बीजेपी ने 325 सीटों का जादुई आकंड़ा पाकर पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश में अपनी मोदी उर्फ योगी सरकार बना ली। इसके बाद यूपी में सीएम योगी का अवैध बूचड़खानों को बंद करने का एलान हुआ, जो आजकल मीडिया जगत की सुर्खियां बना हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा तो होना ही था क्योंकि बीजेपी की सरकार जो आ गई है और कुछ लोगों को यह कदम बहुत अच्छा भी लग रहा है। खैर, हमारे लेख का विषय यह नही है। इस पर हम अगली बार बात करेंगे।

यूपी में बीजेपी की जीत का सबसे ज्यादा श्रेय दलित और मुस्लिम वोटर्स को दिया गया।तो सवाल उठता है कि क्या सच में यकायक यूपी के मुस्लिम वर्ग को बीजेपी पर भरोसा हो गया? क्या सच में मुसलमानों ने इस बार सबसे ज्यादा बीजेपी को ही वोट दिया था? अगर हां, तो खुद को मुसलमानों के रहनुमा बताने वाले असदुद्दीन ओवैसी को मुसलमानों ने क्यों नहीं अपना पूर्ण बहुमत दिया? अगर सपा,बसपा, कांग्रेस ने हमेशा मुसलमानों का यूपी में केवल इस्तेमाल किया तो इस बार और हर बार मुसलमानों के लिए ओवैसी भी सबसे स्ट्रॉन्ग विकल्प के रूप में मौजूद रहा। अगर गहराई से इस सवाल का जवाब खोजा जाएं तो उत्तर मिलता है कि हां, इस बार मुसलमानों ने ओवैसी को भी लगभग 2,00000 लाख वोट दिए और यह वोट मुस्लिम बहुल इलाकों से मिला। यहां ये जानना खासा दिलचस्प है कि ये मुस्लिम बहुल इलाके 2017 से पहले तक सपा और बसपा के वोट बैंक हुआ करते थे, लेकिन साल 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में ओवैसी ने अपने 38 उम्मीदवार इन सीटों पर उतारें और इन सभी ने सपा व बसपा के मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण कर दिया। इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। अब ऐसा अनजाने में हुआ या जानबूझकर किया गया,यही आपको समझना है।

हमने ओवैसी के राजनीतिक सफर पर गौर किया कि ओवैसी ने जब और जहां कहीं से अपने उम्मीदवार राजनीतिक अखाड़े में उतारे तो मकसद केवल एक रहा  और वह था केवल मुस्लिम वोट काटना। मुसलमानों के लिए खुद उन्होंने कितना आज तक सोशल रिफॉर्म किया है। इसके लिए तो बहुत सी कहानियां उनके गढ़ हैदराबाद में फेमस ही है। कहा जाता है कि ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी का पुराने हैदराबाद में बेहद दबदबा है। ये दोनों भाई यहां बड़े होते जा रहे है लेकिन इनके बड़े रुतबे का मुसलमानों को कोई फायदा नहीं मिल रहा। इस पुराने शहर का हर रेहड़ी वाला, फिर चाहे वह केला बेचने वाला हो या कोई और सामान, उसे शहर में अपना सामान बेचने के लिए या फिर बिजनेस शुरू करने के लिए ओवैसी बंधुओं के एजेंटों से ही लोन लेना पड़ता है यानि अगर आपको अपना व्यापार वहां जमाना है तो एआईएमआईएम से ही आपको आर्थिक सहायता लेनी पड़ेगी।

इस बार यूपी विधानसभा 2017 के चुनावी नतीजों में जिस प्रकार मुस्लिम बहुल इलाकों में भी बीजेपी के जीतकर आने की तस्वीर दिखी, उसने अपने आप में बहुत से सवाल खड़े कर दिए और राजनीतिक विशलेषकों ने इसके अपने-अपने हिसाब से नतीजे निकाले। वहीं यूपी के कुछ मुस्लिम इलाकों से यह भी खबर सामने आई कि बहुत से मुसलमानों को लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है या उनके वोट तो बीजेपी को गए ही नहीं थे, फिर उनके इलाके में बीजेपी कैसे आ गई? तो जवाब साफ है कि मुसलमानों के वोट काटकर ओवैसी साहब ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को ही फायदा पहुंचाया।

खुद को कट्टरवादी मुसलमान के तौर पर पेश करने वाले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिम’ (AIMIM)जब भी किसी राज्य के चुनावों में खड़ी होती है तो सीधे-सीधे बीजेपी विरोधी पार्टियों के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाती है। अब यह इत्तेफाक तो नहीं हो सकता कि हमेशा भड़काऊ भाषण देकर, खुद को असली मुसलमान और उनका मददगार बताने वाले ओवैसी से जब यूपी के अवैध बूचड़खानों के प्रति की जाने वाली कार्रवाई के बाबत सवाल किया गया तो जवाब एकदम कूटनीतिक मिला कि ‘हालांकि सपा की गलती है कि उन्होंने अवैध बूचड़खानों को वैध क्यों नहीं किया और वर्तमान सरकार को एकदम से यह कदम न उठाकर थोड़ा टाइम दे देना चाहिए था।‘

हमेशा तल्ख भाषण देने वाले, जहर उगलने वाले ओवैसी का अवैध बूचड़खानों को बंद किए जाने पर इतना पॉलिटिकल जवाब देना सारी कहानी खुद में बयां करता है कि ओवैसी महज बीजेपी को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में सपोर्ट करने के लिए और बीजेपी विरोधियों के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने के लिए उतरते है। ये तो मीठा बनकर अपनी ही जमात के लोगों की तरक्की में सेंध लगाना हुआ।

ओवैसी हमेशा से भड़काऊ भाषण देने के लिए जाने जाते है। हमेशा से वह यह सुने गए है कि अखिलेश और मोदी एक ही सिक्के के दो रूप है और सभी हिंदू पार्टियों ने केवल मुसलमानों का चुनावों में इस्तेमाल ही किया है,लेकिन सच यह है कि ओवैसी खुद मुसलमानों को अपनी राजनीतक बिसात का मुहरा बनाकर सत्ता की रोटियां सेंक रहे है। इस बात का खुलासा उनके हालिया उस बयान से हो जाता है जोकि यूपी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने दिया कि ‘बीजेपी की यूपी में जीत उन लोगों के लिए सबक है जिन्होंने 70 साल तक मुसलमानों को धोखा दिया।‘ अब सोचिए… बीजेपी विरोधी और मुसलमानों के रहनुमा के तौर पर खुद को पेश करने वाले ओवैसी यकायक ऐसा बयान कैसे दे सकते है, जिसका प्रत्यक्ष अर्थ दिख रहा है कि वह बीजेपी को मुसलमानों का विरोधी नहीं मानते। अगर 70 साल तक यूपी में मुसलमानों का इस्तेमाल ही हुआ और अखिलेश व मोदी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तो जीत पर उनका बयान कुछ और ही होना चाहिए था यानि कुछ बीजेपी के विरोध में,लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ क्योंकि ओवैसी साहब का काम मुसलमानों की जिंदगी संवारना, उनके लिए तरक्की के रास्ते खोलना नहीं बल्कि भारतीय पॉलिटिक्स में अपना रुतबा बनाएं रखना है और वह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए ही चुनावों में उतरते है।

जिस प्रकार बीजेपी ने कट्टर हिंदुवादी वोटों का ध्रुवीकरण किया, ठीक उसी प्रकार ओवैसी कट्टर मुसलमानों के वोटों का ध्रुवीकरण करके बस वोट काटने का काम करते है और नतीजा मुस्लिम वोटर खुद को हमेशा की तरह ठगा महसूस करता है। कुछ ऐसा ही ओवैसी इस बार दिल्ली के एमसीडी चुनावों में अपने 50 कैंडिडेट उतारकर कर रहे है। हमेशा की तरह इस बार दिल्ली के एमसीडी चुनावो में मुस्लिम वोटों को काटा जाएंगा और उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष फायदा बीजेपी को ही मिलेगा।

इसलिए मुसलमानों को यह समझना होगा कि अपने वोट को पाखंडी लोगों को देकर खुद का भविष्य बर्बाद न करें। बल्कि ये बात हर भारतीय को समझनी होगी कि अपना वोट देते समय धर्म, जाति और भाई-भतीजावाद को दरकिनार करके इस आधार पर तय करें कि उक्त प्रत्याशी ने आज तक अपने निर्वाचन क्षेत्र में कितना और कैसा काम किया है। फिर चाहे बात कट्टरपंथी मुसलमान वोटर्स की हो या कट्टरपंथी हिंदु वोटर्स की।वह किसी समान धर्म या समान विचारधारा का ढ़ोंग करने वाले जनप्रतिनिधि को अपना वोट देकर खुद को ठगा महसूस नहीं करा सकते।

ओवैसी के विरोधी तो हमेशा से उनपर आरोप लगाते रहे है कि ‘वह बीजेपी के एक एजेंट है और उन्होंने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को मुसलमानों के वोट काटकर बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए खड़ा किया है। वर्ना अगर वह इतने ही मुसलमानों के हितैषी है तो क्यों नहीं किसी भी सेक्युलर पार्टी को जॉइन कर लेते।‘

खैर, ये राजनीति है और आरोप-प्रत्यारोप तो लगते ही रहते है लेकिन ओवैसी बंधुओं द्वारा हमेशा मुस्लिम वोटों को काटना और उसका फायदा सीधे तौर पर बीजेपी को होना, महज एक इत्तेफाक नहीं हो सकता। इस बार दिल्ली एमसीडी चुनावों को भी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी की साख का सवाल बना लिया है और फिर अचानक से ओवैसी साहब मीडिया में एलान कर देते है कि वह भी इस बार दिल्ली एमसीडी चुनावों में अपने 50 उम्मीदवार उतारने जा रही है।

इससे दिल्ली में भी यूपी विधानसभा चुनावों की रणनीति बनती दिख रही है जैसे- यूपी के मुसलमानों का वोट सपा-कांग्रेस और बसपा से काटकर ओवैसी ने अपने खाते में डाल लिया और उसका सीधा फायदा मुस्लिम बहुल इलाकों में भी बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के रूप में हुआ, ठीक उसी प्रकार असदुद्दीन ओवैसी बीजेपी द्वारा दिल्ली एमसीडी चुनावों में लाएं जा रहे है ताकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करके बीजेपी को एमसीडी चुनावो में जीत दिलाई जा सकें। यहां मुस्लिम वोटर्स को समझना होगा कि ओवैसी जैसे जन प्रतिनिधियों को वोट देने से अच्छा है कि वह ‘नोटा’ को वोट दें दे।

अब आप ही सोचिए अगर बीजेपी, मोदी, योगी मुसलमानों के विरोधी है तो महज मुसलमानों के वोट काटने के लिए राजनीति में उतरने वाले ओवैसी क्या सच में मुसलमानों के हितैषी है?

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