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जैन धर्म का पर्युषण महापर्व 2025 : जानें इसका महत्व, नियम और संवत्सरी प्रतिक्रमण की परंपरा
नई दिल्ली। इस संसार में हजारों धर्म हैं और प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। सभी धर्मों का मूल सार मानवता, शांति और विश्व कल्याण है। इन्हीं में से एक प्राचीनतम और महान धर्म है जैन धर्म, जिसका आधार है — अहिंसा, सत्य और आत्मसंयम।
जैन धर्म मानने वालों को हम जैनी कहते हैं। जैनी सदैव अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं और किसी भी प्राणी को कष्ट पहुँचाना पाप मानते हैं। उनके जीवन में आहार-विहार, दिनचर्या और आचरण का बहुत महत्व है। यही कारण है कि जैन समाज विश्व के सबसे शांतिप्रिय और भरोसेमंद समुदायों में गिना जाता है।
जैन धर्म और अहिंसा का संबंध
जैन धर्म का मूल स्तंभ है अहिंसा परमो धर्मः। जैनी मानते हैं कि जो व्यक्ति अहिंसा का पालन करता है, वह स्वभाव से शांत और सरल होता है। उसके भीतर छल, कपट और द्वेष की भावना नहीं रहती। यही कारण है कि जैन समाज को विश्व का सबसे शांति प्रिय और विश्वसनीय समुदाय माना जाता है।
जैन धर्म का सबसे बड़ा पर्व – पर्युषण महापर्व
जैन धर्म में कई पर्व और त्यौहार मनाए जाते हैं, लेकिन उनमें से सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण महापर्व। इसे आध्यात्मिक साधना का महापर्व भी कहा जाता है।
👉 श्वेतांबर जैन समाज में यह पर्व आठ दिन तक चलता है, जबकि दिगंबर समाज में इसे दस दिनों तक मनाया जाता है।
साल 2025 में पर्युषण महापर्व का शुभारंभ 20 अगस्त से हुआ है और इसका समापन 27 अगस्त 2025 को संवत्सरी प्रतिक्रमण के साथ होगा।
पर्युषण का अर्थ और महत्व
‘पर्युषण’ शब्द का अर्थ है – आत्मा के समीप रहना या आध्यात्मिक साधना में लीन होना।
इन दिनों में जैन धर्मावलंबी अपनी दिनचर्या में विशेष बदलाव करते हैं –
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अहिंसा और संयम का कठोर पालन
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व्रत और उपवास रखना
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मंदिर जाकर भजन-कीर्तन करना
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जैन साधुओं और साध्वियों के उपदेश सुनना
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आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि करना
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कहा जाता है कि इन आठ-दस दिनों की साधना आत्मा को पवित्र बनाती है और पापों का क्षय करती है।
उपवास और साधना का महत्व
पर्युषण महापर्व के दौरान जैन धर्मावलंबी व्रत और उपवास करते हैं। कोई केवल जल ग्रहण करता है, तो कोई ‘एकासन’ यानी दिन में एक बार भोजन करता है। कई श्रद्धालु तो पूरे आठ दिन उपवास करते हैं।
इसके पीछे विश्वास है कि – जब शरीर की इंद्रियों पर नियंत्रण किया जाता है, तब आत्मा की शक्ति बढ़ती है और व्यक्ति अपने कर्म बंधनों से मुक्त होता है।
संवत्सरी प्रतिक्रमण – पर्व का समापन
पर्युषण महापर्व का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है – संवत्सरी प्रतिक्रमण।
इस दिन जैन समाज के लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर प्रतिक्रमण पूजा करते हैं।
प्रतिक्रमण का अर्थ है – बीते वर्ष में किए गए पापों, भूलों और गलतियों पर आत्मचिंतन करना और क्षमा माँगना।
मिच्छामि दुक्कडम् का संदेश
संवत्सरी प्रतिक्रमण के बाद जैनी लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से कहते हैं –
“मिच्छामि दुक्कडम्”
इसका अर्थ है – यदि मेरे शब्दों, कर्मों या विचारों से आपको कोई कष्ट पहुँचा हो, तो मुझे क्षमा करें।
यह परंपरा जैन धर्म की महानता को दर्शाती है क्योंकि यह केवल क्षमा माँगने की नहीं बल्कि क्षमा करने की भी शिक्षा देती है।
क्यों माना जाता है पर्युषण इतना खास?
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यह पर्व आत्मशुद्धि और आत्मसंयम का अवसर है।
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इस दौरान लोग क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को त्यागने का प्रयास करते हैं।
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जैन साधु और साध्वियाँ प्रवचन के माध्यम से धर्म और नैतिकता की शिक्षा देते हैं।
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यह पर्व समाज में भाईचारा, शांति और क्षमा की भावना को बढ़ावा देता है।
जैन धर्म का संदेश – विश्व कल्याण
जैन धर्म केवल जैनी समाज के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक है। इसका मुख्य संदेश है –
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अहिंसा – किसी भी प्राणी को चोट न पहुँचाना।
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सत्य – हर परिस्थिति में सत्य का पालन करना।
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अपरिग्रह – अधिक भौतिक वस्तुओं की इच्छा न करना।
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क्षमा – सभी को क्षमा करना और क्षमा माँगना।
इन्हीं सिद्धांतों के कारण जैन धर्म को विश्व शांति का प्रतीक माना जाता है।
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पर्युषण 2025 : तारीख और विशेषताएँ
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शुरुआत: 20 अगस्त 2025
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समापन: 27 अगस्त 2025 (संवत्सरी प्रतिक्रमण)
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श्वेतांबर समाज: 8 दिन पर्युषण
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दिगंबर समाज: 10 दिन दशलक्षण पर्व
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मुख्य आयोजन: उपवास, प्रवचन, भजन-कीर्तन, सामूहिक प्रतिक्रमण, मिच्छामि दुक्कडम्
निष्कर्ष
जैन धर्म का पर्युषण महापर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और क्षमा की साधना है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ी ताकत है – अहिंसा, सत्य और क्षमा।
संवत्सरी प्रतिक्रमण के साथ जब पूरा जैन समाज मिच्छामि दुक्कडम् कहता है, तो यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि विश्व शांति और मानवता का संदेश है।