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क्या..? 21वीं सदी में आज भी राखी पर इन घरों में मनाया जाता है मातम..?

पहल राखी : पहल राखी को शोक के लिए मनाया जा रहा है...क्या यह उचित है

bharat ki purani parampara par sampadkiy Even today Rakhi celebrating in the mourning

नईं दिल्ली, 11अगस्त, (समयधारा) :  भारत विभिन्न सभ्यताओं से भरा हुआ देश l आज भी  देश में कई ऐसी परंपरा है,

जिसे अगर आप जान ले तो आपके रोंगटें खड़े हो जायेंगे l  राजस्थान में कई ऐसी परंपरा आज भी चल रही है l 

आज भी राखी पर बहुत से घरों में मनाया जाता है मातम..?

सुनकर ही कितना अजीब लगता है,राखी का त्यौहार जो साल में सिर्फ एक बार आता है,

जिस त्यौहार ने रिश्तों की अहमियत को भारतीय समाज में – भारत को एक अतुल्य भारत बनाने में मदद की

उस त्यौहार के दिन बहुत से घरों में मातम/शोक मनाया जाता है l

हम बात कर रहे है उत्तर भारत के बहुत से राज्यों में प्रचलित एक पुरानी प्रथा की खासकर राजस्थान की l

होता यूँ है कि राजस्थान में अगर किसी के घर में मौत हो जाएँ तो उस घर में शोक की राखी मनाई जाती हैl 

राखी के दिन घर में त्यैहारों वाली ख़ुशी नहीं होती उन घरों में शोक मनाया जाता है l यह प्रथा न जाने कितनी पीढ़ियों से चली आ रही है l

राजस्थान ही नहीं, अपितु पूरे भारत में न जाने कई जगह इस प्रथा का प्रचलन है l

क्या है यह पहल राखी ..? इस प्रथा का क्या मतलब है ..? चलिये कुछ संक्षेप में हम बताते है …

घर में किसी सदस्य की मृत्यु के बाद हम शोक करते है,उसके बाद शादी ,त्यौहार भी मनाते है,

जैसे ही राखी का त्यौहार आता है,फिर से परिवार शोकाकुल में लाया जाता है,

पहल राखी मनाकर। Even today Rakhi celebrating inthe mourning 

यदि नही मनाये तो भी समाज मे बातें होती है, इतनी उम्र कर गये, घर के बड़े थे।

एक राखी न मनाये तो क्या हो जाता? लेकिन राखी पर शोक त्योहार क्यों मनाये,

इस वजह से कितने भाई-बहन राखी का त्यौहार साथ में नही मनाते।

किसी के न होने का दुःख हमें जिंदगी भर रहता है,इसलिये इसमे बदलाव आना बहुत जरूरी है।

मृत्यु के बाद आने वाला पहला त्योहार ही पहल त्यौहार हो

जिंदगी बहुत छोटी है,पता नहीं अगले साल त्यौहार में रहे या न रहें। 

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इस प्रथा का शिकार मैं और मेरे घर-परिवार और मेरे समाज में बहुत से लोग हुए है l

इस प्रथा का सबसे विचित्र पर सबसे कटु सत्य जानकर तो आप सभी दंग रह जायेंगे …

अगर किसी के घर में राखी के दिन ही किसी की मौत हो जाती है तो

वहां तब तक राखी मनाई नहीं जाती जब तक उस घर में राखी के दिन ही कोई जन्म न लें ..!!!

भाई कोई मुझे यह तो समझाएं कि मृत्यु और जन्म हमारें हाथ में है क्या ? तो फिर यह नाटक क्यों ?

आज भी हमारे समाज में पहल राखी को शोक के लिए मनाया जा रहा है…क्या यह उचित है।

मेरे कुछ सवाल है आप लोगों से .. 

क्या यह त्यौहार हमने या आपने बनाये है ..? 

अगर हाँ, तो किसलिए बनाये है ..? और अगर नहीं तो ..? 

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त्यौहारों का मतलब क्या होता है …? खुशियां बांटना … तो दुःख क्यों ..? 

अगर मैं बात करने बैठूंगा तो समाज के जो ठेकेदार है, उनकी तलवारें खींच जायेंगी l

क्योंकि कोई उनके खिलाफ कुछ कहें या पुरानी प्रथाओं को तोड़ने की बात करें तो यह उनको सहन नहीं होता l

ऐसी  बात करना, मतलब समाज के खिलाफ बोलना होता है l 

जब राखी का त्यौहार या  जिस किसी ने इस त्यौहार की शुरूआत की थी तो क्या उसने कभी सपने में भी ऐसा सोचा होगा कि 

जिस त्यौहार की शुरुआत उसने अपने परिवार अपने समाज को जोड़ने के लिए की थी  वह त्यौहार किसी के घर में शोक या मातम लेकर आयेगा l  

मौत एक अटल सत्य है जो कभी बदला ही नहीं जा सकता l

जो इस संसार में आया है उसे एक न एक दिन इस संसार को छोड़ जाना है l बस किसी की ट्रेन लेट है तो कोई हवाई जहाज में जा रहा है l 

मुझे या किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि किसी के दुःख पर खुशियाँ मनाये या उनके घर जा कर मिठाईयां खाएं l

यह तो मानवता पर कुठाराघात होगा पर किसी के दुःख को कुरेदना … जख्म पर नमक छिड़कने जैसा होता है ..!! 

किसी ने कहा है कि अगर आप किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो किसी का बुरा भी मत करों l

मैं भी यही मानता हूँ … और शायद आप सभी … तो क्यों न इस राखी से एक नयी प्रथा एक ऐसे समाज का निर्माण किया जाएँ

जहां हम सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ ही बांटे जिस किसी के घर में मौत हुई हो तो वहां मातम का माहौल न बनायें न बनने दें l

इसकी शुरूआत  हमें हमारे घर से करनी है,यदि आप इस बदलाव को अपने घर से शुरू करेंगे तो आपके घर कोई शोक की राखी नहीं लायेगा।
परिवार को खुश देख कर जाने वाले की आत्मा को भी शांति मिलेगी। न शोक की राखी कहीं लेकर जाये और न शोक की राखी स्वीकार करें।

यह हमारा प्रयास और सुझाव है,उचित लगे तो आप भी जुड़े…l

अगर आप लोगों को ऐसी और कोई भी प्रथा पता हो, जिसमें बदलाव की जरुरत है तो आप हमें लिखे-ईमेल करें l

हमारा ईमेल आईडी है contact@samaydhara.com / dharmeshjain@samaydhara.com हम इस प्रथा पर जरुर लिखेंगे l 

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Dharmesh Jain

धर्मेश जैन एक स्वतंत्र लेखक है और साथ ही समयधारा के को-फाउंडर व सीईओ है। लेखन के प्रति गहन रुचि ने धर्मेश जैन को बिजनेस के साथ-साथ लेख लिखने की ओर प्रोत्साहित किया।

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