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गांधी जी के शब्द ‘हे राम’ पर विचार-क्या हम गांधी पर आज भी कर रहे है अत्याचार

गांधी के अंतिम शब्द 'हे राम' का मतलब सच में क्या है..? शायद यह..? या शायद नहीं..?, 150वीं गांधी जयंती पर उनके अंतिम शब्द 'हे राम' का विश्लेषण

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नई दिल्ली (समयधारा) : आज महात्मा गांधी के 150वीं जयंती पर मैं आपसे फिर कुछ कहना चाहता हूँ …!

अब आप सोच रहें होंगे की मैंने फिर शब्द क्यों लिखा..! जी हाँ मैं पहले भी लिख चूका हूँ और एक बार फिर गांधी पर लिख रहा हूँ l 

मैंने पहले जो लिखा था उसकी कुछ पंक्तियों को मैंने फिर लिखा है, 

तो  कुछ बदलते समाज व आज के दौर में मुझे कलम उठा फिर लिखना पढ़ रहा है l 

दोस्तों, बापू जी का जीवन हमें कई तरह से प्रेरणा देता है l गांधी के संदेश हमें जीवन की कई महत्वपूर्ण जगह पर राह दिखाते है l 

पर उनके अंतिम दो शब्द आज भी मेरी व आपकी जिंदगी को बदल कर चले गएँ l 

उन्होंने अंत में कहा था “हे राम”  शायद इसका अर्थ कोई समझ ही नहीं पाया l 

हे राम का अर्थ कई मायनों में कई लोगों ने कई तरह से बतलाया l अब आप जरा हमारी नजर से भी “हे राम” का मतलब जान ले l 

आज उनके 150वीं जयंती पर सिर्फ ‘हे राम’ पर हम चर्चा करेंगे l 

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सबसे पहले, उनके इन शब्दों का सीधा सा अर्थ निकलता है l भगवान राम का नाम…!

उन्होंने अपने अंत समय में भगवान राम को याद किया..? सच में गांधीजी ने भगवान राम को याद किया..?

या उन्होंने यह कहा ‘हे राम..!’ यह क्या हो गया…? शायद इसका मतलब नाथूराम गोडसे ने जब,

उन्हें गोलीयों से छलनी किया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ की कोई अपने ही देश में उन्हें इस तरह मार देगा ..!!

और इस वजह से उनके मुहं से निकला – “हे राम..!!”  अब जब मैंने इस तरफ सबका ध्यान खींचा तो सभी लोग हमारी इस बात पर सहमत दिखें l

अब दोस्तों थोड़ा और सोचते है l ‘हे राम..?’ कही उसका यह तो मतलब नहीं था की ‘हे राम‘ यह कैसा कलयुग आ गया l

जिस देश को मैंने(गांधी) अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया उस देश के लोगों की सोच उस देश के लोगों की मानसिकता बिगड़ गयी..!!

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बदल गयी..!!! ओह हो “हे राम..?” अब मेरे भारत का क्या होगा l

सही में ऐसा ही सोचा होगा क्योंकि भारत की आजादी में बापू के योगदान को कोई नकार नहीं सकता l

शायद उनका सबकुछ सिर्फ भारत की आजादी ही देखना था l

स्वत्रंत भारत एक खुबसूरत भारत की बुनियाद को हिलता देख उनके मुहं से निकल गया होगा ‘हे राम..?’

अब “हे राम” का मतलब यह भी हो सकता है की बापू कहना चाहते हो “हे राम” मेरे जाने के बाद भारत का ध्यान रखना,

देश को आजादी तो मिल गयी है, पर इनका ध्यान भगवान तुम्हें ही रखना है,

हाँ-हाँ भारत के भविष्य के लिए बापू ने यही कहा होगा “हे राम” 

बापू ने कभी ऐसा भारत तो नहीं चाहा था l  मेरे पुराने लेख में मैंने इस पर कुछ पंक्तिया लिखी थी l  

आज जिस समाज में हम जी रहे है वहां गांधीजी का स्थान कहां होता…?

क्या आधुनिक युग में भारत के राष्ट्रपिता का स्थान सही जगह है…?

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क्या वो स्वाभाविक मौत मरते या उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती…?

गांधीजी ने इसी(आज) भारत का ही सपना देखा था…?

क्या सच में हमें गांधीजी वाली आजादी मिल गयी है…?

बहुत सारे सवाल है और बहुत सारे जवाब…!

क्या हो गया है हमारे समाज को गांधीजी ने एसे आजाद भारत का सपना नहीं देखा था जहां कभी उनके चरखे को लेकर विवाद होता है,

तो कभी उनके नोट पर फोटो को लेकर, तो कभी उनकी स्वच्छ भारत की छवि को लेकर,

तो कभी उनके नाम पर किसी मूर्ति का अनावरण हो या कभी किसी सड़क का नाम उन्हें समर्पित कर दिया जाए…?

गौर करने वाली बात यह है की कभी भी विवाद उनके काम या आचरण को लेकर नहीं होता

और विवाद या अपना मतलब सिर्फ उनके नाम से होता है l आज के भारत में उनका नाम उनके काम से कही मीलों आगे है,

और शायद यह दूरियां और भी बढ़ेगी lयह नाम और काम का फासला और फैलता जायेगा और हम उस मुकाम पर पहुंच जायेंगे।

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जहां सिर्फ और सिर्फ गांधीजी का नाम ही रह जाएंगा l उनका आचरण उनके काम उनके आदर्श सिर्फ किताबों में रह जायेंगे l

आज मुझे या मुझ जैसे लोगों को बहुत ही शर्म आती है कि कहां है हमारे बापू l और जब मैं उनकी तलाश करने निकलता हूं,

तो वह मिलते है किसी चश्में की दुकान पर, तो कही सड़क के बीच उनका पुतला या फिर नोटों पर हर जगह वह है …

हाहाहा… सच में बापू तो हर जगह है और मैं निकला था उन्हें तलाश करने इतना भी दिमाग नहीं चला,

की जेब में हाथ डालते ही मुझे बापू मिल जाते है..!!! मैं मुर्ख उन्हें तलाश करने घर से निकल चला ….!

लेकिन क्या सच में मुझे बापू मिल गए है ….?

अब इन पंक्तियों से आपको समझ में तो आ ही गया होगा की मैं उस समय भी कितना तड़प रहा था,

और आज जब उनकी 150वीं जयंती है एक तरफ  सभी देशवासी खुशियाँ मना रहे है l

वही दूसरी तरफ मैं फिर से  दुखी हूँ, दुःख इस बात का नहीं है की गांधी की जयंती मना रहे है दुःख इस बात का है की

सिर्फ उनके नाम – उनकी पोशाकों को लोग अपना रहे है,  आज गांधी अगर कही फिर ज़िंदा होते तो वो फिर कहते “हे राम”…l 

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Dharmesh Jain

धर्मेश जैन एक स्वतंत्र लेखक है और साथ ही समयधारा के को-फाउंडर व सीईओ है। लेखन के प्रति गहन रुचि ने धर्मेश जैन को बिजनेस के साथ-साथ लेख लिखने की ओर प्रोत्साहित किया।

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