जब अपने ही हो जाए पराएं और लड़नी पड़े उनसे लड़ाई तो क्या करें?

नई दिल्ली,13फरवरी: भले ही इंसान पैदा अकेला होता है और मरता भी अकेला है,लेकिन इस सृष्टि में जन्म के साथ ही उसके कुछ रिश्ते बन जाते है। फिर वो रिश्ता माता-पिता से हो या भाई-बहन से। ये कुछ खून के रिश्ते है जिन्हें कोई भी इंसान अपनी मर्जी से या पसंद से नहीं चुनता बल्कि ये रिश्ते कुदरत की ओर से उसे जन्म से ही प्रदान किए जाते है। इसके बाद जैसे-जैसे आप बड़े होते है जाते है। एक समाज का हिस्सा बनने लगते है-दोस्तों, प्रेमी-प्रेमिका, पति और पत्नी के रूप में आपको दिल के रिश्ते मिलते है,जिन्हें आप अपनी  मर्जी से अपने दिल और दिमाग से खुद चुनते है और एक रिश्ता बनाते है। ऐसे में कई बार इन नए रिश्तों के कारण आपके खून के रिश्ते धुंधले पड़ने लगते है या फिर कुछ केसों में तो इन खून के रिश्तों की असलियत ही तब सामने आने लगती है।

 दोस्तों अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है कि जिन्हें आपने ताउम्र अपना मानकर अपने दिल में जगह दी वो ही रिश्ते अब आपको पराएं लगने लगे है तो इस बात पर गौर करें कि कल तक जो आपके अपने थे वो यकायक पराएं क्यों हो गए? क्या इसमें पूरी गलती उनकी है? क्या इसमें पूरी गलती आपकी है? कौनसा रिश्ता महत्वपूर्ण है जो खून का बना है? या जिसे आपने अपनी जिम्मेदारी पर दिल से बनाया है? हर किसी इंसान की जिंदगी में एक ऐसा वक्त आता है जब उसे सारे अपने पराएं लगने लगते है। हर रिश्ता केवल मतलबी और स्वार्थी लगने लगता है। जिन भाई-बहनों या पति और पत्नी पर आपने आंख मूंदकर भरोसा किया था, जिम्मेदारी निभाने के समय उनका बर्ताव गैरों से भी बदत्तर हो जाता है। अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है तो बिल्कुल निराश न हो। देखिए इस बात को कुछ इस तरह समझे। जब आप पैदा हुए तो मां-बाप,भाई-बहन के रूप में ईश्वर की ओर से आपको बिना मर्जी  के कुछ रिश्ते जन्मजात मिले। अब जब आपकी जिंदगी में कोई नया इंसान आया या आई तो यही रिश्ते अपना रंग बदलने लगे या फिर आपको कोई आर्थिक समस्या उत्पन्न हुई तो यही रिश्ते असली रंग दिखाने लगे। ऐसे में किसी भी आम इंसान का परेशान होना और टूट जाना स्वाभाविक है। लेकिन यह बात भी उतनी ही बड़ी सच है कि किसी भी रिश्ते से बढ़कर होता है-सही-गलत व धर्म और अधर्म की पहचान होना और उसी के अनुरूप आचरण करना।

हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण ने महाभारत के समय अर्जुन को भी यही ज्ञान दिया था कि खून के रिश्तों और धर्म यानि उचित मार्ग में से किसी एक को चुनना पड़े तो आप बेझिझक धर्म को चुनें क्योंकि गलत रास्ते पर अगर आपके खून के रिश्ते भी है तो वे सही नहीं हो जाते। ये रिश्ते आपको जन्म से भले ही मिले हो लेकिन आप नहीं जानते कि पिछले जन्म में इनमें से किसने आपकी हत्या की थी या आपने किसे दुख पहुंचाया था। इसलिए न्याय, धर्म और सत्य के लिए अगर लड़ाई अपनों से भी लड़नी पड़े तो लड़ों। फिर भले ही लोग आपको कहें कि आप स्वार्थी हो या आप गलत हो क्योंकि लोगों का काम ही कहना है और आपको केवल वहीं करना है जिससे आपके अंतिम समय में आप पाप के भागी न बनें।

अक्सर देखा गया है कि बचपन से जिन भाई-बहनों के साथ आप खेलें-कूदें, वहीं बड़े होकर स्वार्थवश प्रॉपर्टी के लालच, पैसों के लालच में आपके साथ रिश्तों की मर्यादा तोड़ देते है। इतना ही नहीं, बहुत से केसों में मां-बाप के साथ बेटे और बेटियां भी इसी अधर्म को अंजाम देते है और कुछ केसों में पत्नी अपने पति के साथ या फिर पति अपनी पत्नी के साथ स्वार्थवश गलत करता है। ऐसे में इंसान का विश्वास रिश्तों से उठने लगता है। उसे समझ ही नहीं आता कि खून के रिश्ते सच्चे है या  फिर दिल के। कभी-कभी उसे लगता है कि दोनों ही स्वार्थी है तो मैं क्यों इनके लिए ताउम्र जीता रहा/रही। अगर आपको भी ऐसा लगता है तो आप सबसे पहले इस बात को समझें कि आपको किसी भी रिश्ते से कोई उम्मीद नहीं रखनी।

ये सच है कि उम्मीद न रखना…कहना आसान है लेकिन अपनों के होते हुए,उनके प्रति सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए नाउम्मीदी के साथ जीना बहुत मुश्किल है,लेकिन यह बात मुश्किल भले ही लगें मगर नामुमकिन नहीं है। अगर आज तक आपने अपने बेटों और बेटियों के लिए सबकुछ किया और चाहा कि वे भी आपके लिए करें तो यकीनन ये गलत नहीं है,लेकिन वे आपके प्रति जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने बाकी रिश्तों को भूल जाए ये सच में आपका स्वार्थ है। माता-पिता का रिश्ता इस दुनिया में सबसे नि:स्वार्थ होता था..यहां ‘था’ शब्द इसलिए लगा रहे है कि आजकल के कलयुग में अब माता-पिता का रिश्ता भी स्वार्थ से भर गया है। वे भी इस उम्मीद में बच्चे को पालते-पोसते है कि बुढ़ापे में वो हमारा सहारा बनेगा। अगर आपका बच्चा आपका सहारा बनता है तो सच में आप बहुत भाग्यशाली है लेकिन कहीं आपका सहारा किसी और से जुड़कर आपको बेसहारा न कर दें…ये सोच अगर आपके अंदर पनपने लगी है तो यकीन मानिए आप सबसे बड़ा अधर्म कर रहे है और अगर आपके बच्चे जान चुके है कि आप स्वार्थ के चलते ऐसा कर रहे है तो उनका आपसे दूर हो जाना स्वाभाविक है।

रामायण में भी कैकेयी ने जब लालच के चलते राम को वनवास दिया तो उनके खून के बेटे भरत ने एक क्षण नहीं लगाया। कैकेयी से दूर होने में,इसलिए जो अपनी जिंदगी में इस तरह के अनुभव से गुजर रहे है और अपनों का स्वार्थ जानते हुए भी उनके साथ बने हुए है तो वे जाने-अनजाने अधर्म के साथ अपनी मर्जी से जुड़े हुए है।इसलिए इसका परिणाम भी वे खुद ही भुगतेंगे। आप तब ये नहीं कह सकते कि आपका इस्तेमाल हुआ है क्योंकि आपने अपनी मर्जी से अपना इस्तेमाल होने दिया है। ठीक ऐसे ही जिन माता-पिता ने आपको पाला-पोसा,उन्हें केवल संपत्ति के लालच में आप संभाल रहे है तो आपसे बड़ा दुष्ट कोई नही है और आपको इसका बुरा परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। कुदरत का नियम है जो आप बोतें है वहीं काटते है।

अब बात करते है भाई-बहनों की। जन्म से ही आप इनके साथ खेलें और कूदें और अच्छे-बुरे वक्त में साथ रहे,लेकिन फिर एक दिन ऐसा आया जब आपके भाई या बहन को आपके प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी या आपको उनके प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी और सबकुछ होते हुए भी आपने केवल व्यवहारिकता की दुहाई देकर उनसे पल्ला झाड़ लिया, तो आप गलत है।अब आप कहेंगे क्यों अभी तो आपने कहा कि किसी से उम्मीद न रखों फिर हम या हमारे भाई-बहन हमसे उम्मीद रखकर गलत नहीं कर रहे? तो इस बात को कुछ यूं समझें कि इन खून के रिश्तों के साथ आपको कुछ जिम्मेदारियां ईश्वर की ओर से दी गई है। आपका या आपके भाई-बहन का फर्ज है कि आप उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं। खासकर अगर आपके हालात ऐसे है कि आप उनकी परेशानियां दूर कर सकते है और आप जानबूझकर नहीं कर रहे। लेकिन अगर आप या आपके भाई-बहन की जिंदगी में और भी जिम्मेदारियां है। मसलन-उनके अपने बच्चे या पति व पत्नी तो आप या आपके भाई-बहन को उनसे कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि अब आप इतने बड़े हो चुके है कि आपने अपनी मर्जी से अपना एक परिवार खड़ा कर लिया है।जीवन के अच्छे-बुरे पल आपने देख लिए है तो अब भी अगर आप अपने कुंवारे भाई या बहन से उम्मीद रखते है तो आप गलत है। वहीं अगर आपके कुंवारे भाई-बहन आपकी शादी के बाद भी ये उम्मीद रखें कि आप उनका भरण-पोषण करें तो ये भी सरासर गलत है। दरअसल, जब आप कुंवारे होते है तो आप एक परिवार होते है और फिर जैसे ही शादीशुदा हो जाते है तो आपकी जिम्मेदारियां बंट जाती है। ऐसे में समझदारी इसी बात में होती है कि उम्मीदें कम रखी जाए और जिम्मेदारियां भी आपस में बांट ली जाए ताकि जो नया सदस्य आपके घर और आपके भाई या बहन से जुड़ा है उसे भी महसूस न हो कि आप खून के रिश्तों की दुहाई के नाम पर उनका इस्तेमाल कर रहे है और आपको भी न लगे कि आपके भाई-बहन शादी के बाद बदल गए है।

यहां ये समझना जरूरी है कि भाई-बहन अगर दिल से अपनी जिम्मेदारियां निभाते आ रहे है और अब यकायक उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया है तो यकीनन उनकी जिंदगी में कुछ ऐसा चल रहा है जो वे आपको बता नहीं सकते है तो ऐसे में उनसे न कुछ लेने की उम्मीद रखें और साथ ही न ही कुछ उन्हें देने की। जी हां, दरअसल,खून के रिश्तों में कर्तव्य और जिम्मेदारी की कोई कीमत नहीं होती। ये आपको नैतिक रूप से निभाने होते है,लेकिन अगर आपकी या आपके भाई-बहनों की नैतिकता ही खत्म हो गई है तो यकीन मानिए की कोई रिश्ता ही नहीं बचा है आपके और उनके बीच। ऐसे में आपके लिए जरूरी है कि आप वहीं करें जो सही है या धर्म जिसे सही कहता है और धर्म कहता है कि ‘गलत किसी के साथ करों नहीं और गलत को चुपचाप सहो भी नहीं’।

अगर आपने अपने भाई-बहन की जिंदगी में उनकी शादी होने के बाद भी कभी कोई दखल नहीं दिया या जब उनके बच्चे हुए तो आपने उनके प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियां निभाई लेकिन जब आपका वक्त आया तो उन्होंने अपनी मजबूरियां गिनाकर आपको बेसहारा छोड़ दिया तो समझ लीजिए आपका खून का रिश्ता वहीं खत्म हो गया।यहां आपको उनसे कोई उम्मीद नहीं रखनी और साथ ही अपना वक्त बदलने पर आपको उनके प्रति कोई जिम्मेदारी भी नहीं निभानी है क्योंकि अब वे आपके लिए अजनबी है और एक अजनबी से न तो आपको कोई लगाव होता है और न ही कोई शिकवा-शिकायत।अपनी नियति उन्होंने अपने कर्मों से खुद तय कर ली है,जिसे आप भी नहीं बदल सकते है। लेकिन फिर भी आप उन्हें माफ करके उनके साथ जुड़े रहना चाहते है तो नि:स्वार्थ होकर रहें और समझ लें कि अब जब आप दोबारा हर्ट होंगे तो जिम्मेदार आप खुद होंगे।

अगर आप किसी को भावनात्मक रूप से या रिश्तों की आड़ में इस्तेमाल कर रहे है तो ये सच है कि आप वहीं काटेंगे जो आपने बोया है। इसलिए अगर आप या आपके अपने अपनी जिम्मेदारियों से दूर हट गए है तो आप भी उन्हें अपनी जिंदगी में आएं एक मेहमान कलाकार की तरह भूल जाए और आगे बढ़े।

तस्वीर,साभार-गूगल सर्च

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करों फल की इच्छा न करों। आपने और उन्होंने जो भी कर्म करा भविष्य उसका परिणाम आपको और उन्हें देगा ही। फिर किसलिए रिश्तों से गिला-शिकवा करना। आप अपनों को खून का या दिल का या फिर अपना रिश्ता मानकर न जिएं बल्कि ये माने कि जब आप इस दुनिया में आएं है तो आपका सबसे पहला कर्तव्य है अपने जीवन के उद्देश्य को समझना,जिसके लिए ईश्वर ने आपको रचा है। आपको ईश्वर ने महज किसी का मां-बाप,भाई-बहन,पति या पत्नी बनने के लिए ही पैदा नहीं किया है। बतौर इंसान ये जन्म आपको मिला है ताकि आप खुद की पहचान बना सकें और खुद के द्वारा बनाएं गए रिश्तों को आत्मबल पर निभा सकें। इसके लिए अगर आप अपने ही मां-बाप, भाई-बहन या पति व पत्नी के साथ गलत करते है तो आपका अंत गलत ही होगा,लेकिन इन सभी के प्रति अगर आप नि:स्वार्थ होकर अपना कर्म करते है तो आप सही रास्ते पर है और इसका सुखद परिणाम भी मिलना तय है।

बेस्ट फ्रेंड,बिजनेस पार्टनर या फिर लाइफ पार्टनर….ये वो रिश्ते है, जिन्हें आपने अपनी मर्जी से खुद बनाया है और इसलिए इनके प्रति आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है लेकिन यहां भी भगवान कृष्ण की वही बात लागू होती है कि किसी भी रिश्ते से महत्वपूर्ण है ये देखना कि सही क्या है और गलत क्या है। अधर्म कहां और धर्म कहां है। अगर आपके दिल के रिश्ते भी गलत के साथ है तो उनसे दूर होने में एक क्षण न सोचें और अगर आपके दिल के रिश्ते सही है और खून के रिश्तों में स्वार्थ आ चुका है तो उनके प्रति भी आप उदासीन हो जाएं यानि न उनके साथ कुछ गलत करें और न ही उन्हें अपने साथ कुछ गलत करने का मौका दें।

रिश्तों की दुहाई देकर आजकल लोग रिश्तों का व्यापार करने लगे है और ज्यादातर लोग शर्म-लिहाज व लोक-लाज की परवाह करते हुए अपने साथ होते आ रहे गलत के प्रति आवाज बुलंद नहीं करते। कभी किसी अपने ने एक वक्त पर आपके साथ बहुत अच्छा किया था और आज बुरा कर रहा है तो बेहतर है कि आप उनसे दूर हो जाए। न उनके साथ अच्छा करें और न ही उनके साथ कुछ भी बुरा करें। एक अनजान शख्स की तरह उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें। अगर किसी दिन उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है तो ठीक है और अगर नहीं होता तो भी इसे उनकी नियति और ईश्वर की इच्छा मानकर अपना कर्म करते चले जाए।

याद रखिए कोई भी रिश्ता केवल तभी निभ सकता है जब उसमें स्वार्थ न हो। माता-पिता अगर आपको पैसा कमाने वाली मशीन मान बैठे है तो ये गलत है। आप अपने माता-पिता के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं निभा रहे लेकिन उनकी प्रॉपर्टी पर हक जता रहे है तो आपसे ज्यादा बुरा इंसान कोई नहीं है। आपने अपने भाई या बहन के प्रति हमेशा सारी जिम्मेदारियां निभाई और उन्होंने आपको ठेंगा दिखा दिया तो आप नाउम्मीद न हो क्योंकि ये उनके कर्म है और इनका परिणाम उन्हें भुगतना ही होगा लेकिन आपने अपनी जिम्मेदारियों की कीमत उनसे वसूलनी चाही-मसलन आपने उनपर, उनकी पढ़ाई या बिजनेस पर कितना खर्च किया और अब इसकी एवज में उन्हें भी आपके प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए…ये सोच रखना शर्मनाक है। जो आपने किया,वे आपका कर्म था और उसका सुखद फल भी मिलना तय है लेकिन जो आपने किया वो किसी स्वार्थवश किया तो उसका बुरा परिणाम भी आपको मिलना तय है।इसलिए गीता के अनुसार अपनी जिंदगी जिएं और अपने हालातों और परेशनियों को एक चैलेंज की तरह लें और उनसे लड़ते हुए अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े। फिर इस दौरान अगर गलत या अधर्म के लिए लड़ाई अपनो से ही लड़नी पड़े तो लड़ जाएं। अतीत की सुखद स्मृति के चलते और रिश्तों की दुहाई के नाम परअपना कर्म करने से पीछे न हटे और न ही गलत को रिश्तों की आड़ में चुपचाप सहें।

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