‘जैनम जयंती शासनम’ : ‘जैन धर्म’ के 8दिवसीय ‘महापर्व पर्यूषण’ की शुरुआत, जाने जैन धर्म के बारे में

18 अगस्त (समयधारा) : आज जैन धर्म के सबसे बड़े महापर्व ‘पर्यूषण’ की शुरुआत हुई है l यह पर्व 8 दिनों का जैन धर्म का महापर्व कहलाता है l इस पर्व में समस्त विश्व के सभी जैन भाई-बहन, पूरे साल भर में हुई जाने-अनजाने गलती की क्षमा याचना करते है l 

वे इस महापर्व के आखिरी दिन  उपवास रखते है और एक जगह सामूहिक रूप से बैठकर भगवान का ध्यान जिसें जैन धर्म में ‘महा-प्रतिकमण’ कहा जाता है l जैन धर्म के लोग कम से कम इस दिन उपवास या हो सके वो परिग्रह करते है l जैन धर्म का मूल सिंद्धांत ‘अहिंसा’ है l  

लोग नीचे दिए गए संदेश देकर एक दूसरें को बधाईयों देते है l 

1)  क्षमापना के महापर्व पर्यूषण की आराधना करने से पूर्व आप सबको अंत: करण पूर्वक मिच्छामी दुक्कडम।

कभी भी -कही भी और किसी भी प्रकार से अगर मैंने आपका दिल दुखाया हो तो मुझे क्षमा करें।   
2)  मिच्छामी दुक्कडम
 जरा  सा  मुस्करा  देना
         पर्युषण  से  पहले  पहले….
         हर  गम  को  भुला  देना
                 पर्युषण  से  पहले  पहले…
       ना  सोचो  किसने  दिल  दुखाया
           सब  को  माफ़  कर  देना
                 पर्युषण  से  पहले  पहले…
     क्या..?  पता  फिर  मौका  मिले  ना  मिले
        इसलिए  दिल  को  साफ  कर  लेना
                  पर्युषण से पहले पहले….
        कुछ  इस  तरह  मैंने  जिंदगी  को
                आसान  कर  दिया
          किसी  से  माफ़ी  मांगली  तो 
          किसी  को  माफ़  कर  दिया
            पर्युषण  से  पहले  पहले….
 
मिच्छामी दुक्कडम्
आखिर जैन धर्म क्या है …? इस धर्म का इतिहास क्या है …?  विकिपीडिया से जो जानकारी हमें मिली है वो इस प्रकार है l
जैन धर्म भारत  का एक प्राचीन धर्म है। ‘जैन धर्म’ का अर्थ है – ‘जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म’। ‘जैन’ कहते हैं उन्हें, जो ‘जिन’ के अनुयायी हों। ‘जिन’ शब्द बना है ‘जि’ धातु से। ‘जि’ माने-जीतना। ‘जिन’ माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया और विशिष्ट ज्ञान को पाकर सर्वज्ञ या पूर्णज्ञान प्राप्त किया उन आप्त पुरुष को जिनेश्वर या ‘जिन’ कहा जाता है’। जैन धर्म अर्थात ‘जिन’ भगवान्‌ का धर्म। अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता इश्वर को स्थान नहीं दिया गया है।

जैन ग्रंथो  के अनुसार इस काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव द्वारा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था। जैन धर्म की प्राचीनता प्रामाणिक करने वाले अनेक उल्लेख अजैन साहित्य और खासकर वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं।

 
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