‘पद्मावती’ पर विवाद असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की ‘घटिया’ कोशिश

नई दिल्ली, 22नवंबर:  इन दिनों संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ पर विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा। ऐसा लग रहा है मानों फिल्म न हो गई बल्कि पूरे देश पर एक राष्ट्रीय आपदा आ गई हो। आज जब हम 21वीं सदी में रहते है और पहले से ज्यादा साक्षर है तो क्या किसी भी फिल्म  को या मनोरंजन से जुड़ी चीजों को इतनी तवज्ज़ों देना शोभा देता है? करणी सेना हो या फिर राजपूत समाज, अगर वह इस फिल्म के विरोध में यह कहकर उतर रहे है कि इससे राजपूत समाज का अपमान होता है तो क्या कोई उनसे पूछेगा कि उन्हें क्यों लगता है कि गर्वशाली राजपूत समाज इतिहास के पन्नों पर इतना हल्का है कि मनोरंजन के उद्देश्य से बनाई गई कोई भी फिल्म उसे हल्का या धूमिल कर देगी?

हमारे देश में फिल्म ‘पद्मावती’ से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे है, जिनके लिए राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन कभी इतना प्रखर विरोध नहीं करते। फिर चाहे बात हो उस कथित बाबा राम रहीम की, जो हरियाणा में अपनी वासना की आग को बुझाने के लिए धर्म को बेच रहा था। तब क्यों किसी भी राजनीतिक दल ने विशेषरुप से हरियाणा और पंजाब सरकार ने यह बोला कि राम रहीम की करतूतें देश की धार्मिक आस्था, संस्कृति और देश की महिलाओं की अस्मिता के साथ बलात्कार है? भाजपाई राज्य हो या फिर कांग्रेसी राज्य किसी ने भी तब क्यों नहीं देश की महिलाओं के लिए और देश की धर्म व संस्कृति के लिए इतने विरोध-प्रदर्शन किए और न ही कोई सामाजिक संगठन यह कहकर सड़कों पर उतरा कि ऐसे तथाकथित ढ़ोंगी बाबा हमारे धर्म और हमारे इतिहास पर कलंक है और इनका पोषण करने वाले राजनीतिक दलों पर बैन लगना चाहिए।हालांकि आगजनी और तोड़फोड़ तब भी हुई लेकिन बलात्कारी राम रहीम के समर्थकों की ओर से।

फिल्म पद्मावती में दीपिका पादुकोण रानी पद्मिनी या चित्तौड़ की पद्मावती का किरदार निभा रही है (तस्वीर, साभार-गूगल )

हमारे देश की जनता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि फिल्मों में क्या और क्यों दिखाया जा रहा है। आम आदमी की जिंदगी में इतनी परेशानियां और चुनौतियां है कि वह फिल्में मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से ही देखता है, अगर ऐसा नहीं होता तो आजतक जिन फिल्मों ने देश की सच्चाई दिखाई है, वह ब्लॉक-बस्टर हिट हो चुकी होती और उनसे देश का मानस-पटल कब का बदल चुका होता, लेकिन देश की जनता को इस बात से जरूर फर्क पड़ता है कि जिन धार्मिक स्थलों पर उनकी बहू-बेटियां जा रही है, जिन तथाकथित बाबाओं को वह आस्था के नाम पर नमन कर रहे है वहीं उनके घर की इज्जत को तार-तार न करें।

इतना ही नहीं, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का रवैया भी इस फिल्म को लेकर बेहद चौंकाने वाला रहा है। सिर्फ एक समुदाय की ओर से मिलने वाले वोटों को देखकर सत्ता में रहते हुए भी सही को सही न कहना और गलत के साथ जाकर खड़ा हो जाना निहायत ही शर्मनाक है। देशभर में पद्मावती को लेकर जिस तरह विवाद खड़ा किया जा रहा है, कोई भी जागरूक नागरिक साफ समझ सकता है कि यह एक राजनीतिक स्टंट है ताकि देश के असल मुद्दों पर से ध्यान भटकाया जा सकें। ‘इतिहास’ को इतिहास कहते ही इसलिए है क्योंकि उसे लिखा जा चुका है और उसे बदला नहीं जा सकता। जो समुदाय विशेष और राजनीतिक दल इस विरोध की आग में ‘घी’ का काम कर रहे है वह चाहते है कि चुनावी बयार में जनता भूल जाएं कि देश में कितनी बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है, नोटबंदी से कितनों के रोजगार छिन गए, जीएसटी की मार ने देश की अर्थव्यवस्था को जमीन पर किस हद तक रौंदा है।

मध्यप्रदेश में किसानो की आत्महत्याओं का सिलसिला या व्यापंम घोटाला हो या दिल्ली में वायु प्रदूषण का मुद्दा हो या फिर देश में बच्चों और औरतों के साथ बढ़ते अपराध, किसी बाबा की काली करतूत हो या फिर देश के स्कूलों में हमारे बच्चों की जानमाल की हानि…इन मुद्दों पर आप कभी सत्तापक्ष और विपक्ष और साथ ही इन सामाजिक संगठनों को इतना प्रखर विरोध करते नहीं देखेंगे। तब ये लोग ऐसे शांत बैठे रहते है कि मानों ये देश के नुमाइंदे ही न हो और इनके ऑफिसों, घरों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर बैन लग चुका हो।

दरअसल गलती आम नागरिक की है क्योंकि हम इन राजनीतिक दलों और तथाकथित समाज के ठेकेदार बनने वाले संगठनों की सियासी चालों को समझ नहीं पाते और ये हमें जब जहां जिन मुद्दों पर भटकाना चाहते है तो हम भटक जाते है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज एक वीरांगना के चरित्र-चित्रण को लेकर जिस तरह का बवाल मचाया जा रहा है। क्या वर्तमान में जब किसी के घर की बेटी की इज्जत सरेराह लुटती है तब मचाया जाता है? तब क्यों नहीं ये राजनीतिक और सामाजिक दल आगे आकर ऐसे लोगों का बहिष्कार करते या फिर उनकी धरपकड़ के लिए इतना आक्रोश करते। दिल्ली में निर्भया कांड के लिए भी जो विरोध-प्रदर्शन हुआ था वो भी आम आदमी ने किया था न की किसी राजनीतिक,सामाजिक दल ने।

हमें चाहिए कि अगर हम इन दोहरे चरित्र वालों की मंशा को समझ नहीं पाते तो भी हमें इनके बयानों और विरोधों पर उसी तरह उदासीन हो जाना चाहिए,जिस प्रकार ये आम नागरिक की समस्याओं और समाधान पर उदासीन हो जाते है।

फिल्म इंडस्ट्री का उद्देश्य है मनोरंजन के लिए फिल्में बनाना। अगर हमें किसी बात को महत्व नहीं देना तो उसका सीधा तरीका होता है कि उसके बारे में बात करनी छोड़ दी जाएं लेकिन आएं दिन पद्मावती को लेकर जिस तरह के बयान और बवाल मचाएं जा रहे है,उनसे स्पष्ट हो रहा है कि ये महज एक घटिया राजनीतिक पैंतरेबाजी है ताकि देश के असल मुद्दों जैसे- बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार, गिरती अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की अनदेखी, रसोई गैस की बढ़ती कीमतों, डीजल-पेट्रोल और खाद्द पदार्थों के आसमान छूते भावों पर जनता अपने निर्वाचित नुमाइंदों से सवाल न कर सकें और रातों रात देश के न्यूज चैनलों की हेडलाइन आम नागरिक के हितों को उठाने वाले मुद्दों से हटकर महज एक फिल्म के विरोध-प्रदर्शन पर सिमट जाए।

यहां जावेद अख्तर का वह बयान भी सटीक बैठता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “फिल्में कभी इतिहास की सही जानकारी नहीं दे सकती। इतिहास की सही जानकारी लेनी है तो देश के प्रमुख इतिहासकारों की किताबों को पढ़ा जाए और फिल्मों को केवल मनोरंजन के उद्देश्य से ही देखा जाए। जो फिल्मों में दिखाया जाता है वह इतिहास नहीं है।“

जावेद अख्तर का यह बयान बिल्कुल ठीक है। हमारे देश का इतिहास इतना संपन्न और बलिष्ठ है कि उसे कोई भी फिल्म बदल नहीं सकती, इसलिए बिना फिल्म देखें, महज कल्पनाओं के आधार पर उसका विरोध यह कहकर करना कि ये किसी समुदाय विशेष का अपमान है, सरासर मुखौटा है ताकि देश और देश के नागरिक वर्तमान के असल मुद्दों को भूल जाए और गड़े मुर्दों पर ही केवल बतियाते रहे।

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