‘पद्मावत’ रिलीज: हमें क्या देखना चाहिए इसका निर्णय करेगा कौन?

नई दिल्ली: 25 जनवरी को फिल्म ‘पद्मावत’ उर्फ ‘पद्मावती’ कई महीनों से विरोध-प्रदर्शन,हिंसा और आलोचनाओं के बीच आखिरकार देश की सुप्रीम अदालत के आदेश के चलते रिलीज हो ही रही है। फिल्म अपने शूटिंग के समय से ही राजपूत समुदाय और करणी सेना की नाराजगी का सबब बनकर रह गई,जिसके चलते फिल्म बनने से प्रदर्शन तक सिर्फ और सिर्फ विरोध,धमकियां और हिंसा ही झेलती रही। इन सबके बीच सबसे ज्यादा हैरान और निराश करने वाला रवैया रहा मुख्यत बीजेपी नित राज्य सरकारों का। एक फिल्म जिसे देश की सुप्रीम कोर्ट ने खुद पूरे देश में रिलीज करने का आदेश दिया है। उस आदेश को केंद्र में भाजपा की सरकार होने के बावजूद मुख्य रूप से भाजपा नित राज्य सरकारों द्वारा ही अनदेखी करके किसी समुदाय मात्र को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानना और राज्य सरकारों द्वारा खुद को बेबस और लाचार दिखाना…सरासर भारतीय लोकतंत्र और देश की सर्वोच्च अदालत का अपमान व उसकी अवमानना है।

पद्मावती को सीबीएफसी ने 30 दिसंबर 2017 को कांटछांट के साथ हरी झंडी दी और साथ ही फिल्म का नाम भी बदलकर ‘पद्मावती’ से ‘पद्मावत’ कर दिया गया। प्रत्येक बिजनेस इंडस्ट्री के लिए उनकी अलग कानून व्यवस्था लागू करने वाली संस्था होती है। जैसे कि- भारतीय फिल्म उद्योग के लिए सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन जैसी प्रतिष्ठित संस्था है जो प्रत्येक फिल्म के लिए सेंसर बोर्ड का कार्य करती है और रिव्यू पैनल उक्त फिल्म के प्रत्येक आपत्तिजनक डायलॉग और सीन्स को देखकर ही फिल्म को यू/ए या फिर ए/बी कोई भी सर्टिफिकेट देता है। ऐसे में जब सेंसर बोर्ड की कैंची पद्मावत पर भी चल चुकी है और देश का कानून यानि सुप्रीम कोर्ट जोकि हमारे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका है, उसने भी आदेश दे दिया है कि इस फिल्म को पूरे देश में रिलीज किया जाए और राज्य सरकारें अगर कानून व्यवस्था खुद संभाल नहीं सकती तो इसके लिए उन्हें कोई अधिकार नहीं कि वे किसी फिल्म को ही बैन करने की मुहिम चलाए। तब राज्य सरकारों और करणी सेना द्वारा फिल्म को लेकर विरोध का स्वर मुखर करना सरासर देश की न्यायव्यवस्था की अस्मिता को ज़ार-ज़ार करने जैसा है।

ऐसा तो नहीं है कि हमारे देश में किसी फिल्म का विरोध पहली बार हुआ है। अक्सर ऐसा होता रहा है और शायद आगे भी होता रहेगा,लेकिन विरोध करने वालों से ये पूछा जाए जब उन्होंने ये फिल्म देखी ही नहीं तो वे किस आधार पर इसका विरोध कर रहे है और क्यों। केवल कल्पना के बादल उड़ाने से देश नहीं चल सकता और न ही किसी आम आदमी ने उन्हें अपना रहनुमा बनाया है कि जाइये आप फलां फिल्म का विरोध करिए। आज देश का माहौल कुछ शरारती तत्वों द्वारा ऐसा बनाया जा रहा है कि वे आम आदमी के सुकून से जुड़ी हर चीज में बस बवाल मचाना पसंद करते है। फिल्में मनोरंजन का सर्वोपरि साधन है और केवल कल्पना का साकार रुप। आम दर्शक रोजमर्रा की आपाधापी और ऊहापोह से भरी जिंदगी में सुकून के कुछ पल तलाशने सिनेमा हॉल की तरफ रुख करता है। सिनेमा हॉल के उन तीन , साढ़े तीन घंटे की अवधि में वे अपनी जिंदगी की परेशानियों को भूल कुछ पल मनोरंजन के चुरा लेना चाहता है तो ऐसे में किसे हक है कि वे आम आदमी से उसके कुछ भी देखने और खाने का हक छिने? हम क्या देखें और क्या नहीं इसका फैसला कोई भी राजनीतिक या सामाजिक संगठन नहीं कर सकता।

भारत एक प्रगतिशील देश है और आज का युवा इतना तो प्रगतिशील है कि उसे समझ आता है कल्पना क्या है और हकीकत क्या। तो ऐसे में कुछ संकीर्ण सामाजिक संगठनों को ये हक कौन दे देता है कि वे उनकी पसंद और नापसंद के भाग्यविधाता बने और देश की सुप्रीम कोर्ट का अपमान करते हुए खुद को देश की न्यायव्यवस्था से ऊपर दिखाए। इन्हें इतना अधिकार कौन दे रहा है कि ये देश के कानून को अपने पैर की जूती समझकर पूरे देश में अपने राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे है और इस शांतिप्रिय देश को अराजकता की बलि-वेदी चढ़ा रहे है।

इन सबके बीच सबसे ज्यादा शर्मनाक रवैया है उन राज्य सरकारों का है, जहां पद्मावत का पुरजोर विरोध हो रहा है क्योंकि ये राज्य सरकार कुछ सामाजिक संगठनों के आगे अपने राजनीतिक स्वार्थ और वोट खोने के डर के चलते झुक रही है और देश के उच्चतम न्यायालय का अपमान व आम आदमी के सुकून से खिलवाड़ कर रही है। देश में तोडफोड़,आगजनी और धारा 144 लागू होने के बावजूद भी इन अराजकतावादी तत्वों के हिंसक हौसलें बुलंद होना साफ संकेत है कि इस देश में हम आम लोग क्या देखें? और क्या नहीं? इसका फैसला भी अब हमसे छिनने की बेवजह साजिश केवल एक राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसे इस देश का कानून और नागरिक कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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