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दशहरे पर रावण दहन या मासूमों पर वज्रपात? किसे दें दोष?

जाने कितने शरीर कटे हुए पटरी पर बिखरे थे। तभी अमृता लहूलुहान दो हाथ थामे हुई लाशों को देखकर चीख पड़ी।

Amritsar train tragedy

कॉलेज के मैदान में एक कोने की बेंच पर बैठे कीरत और अमृता घंटी बजने की आवाज पर भी एक- दूसरे में खोएं हुए से वहीं बैठे थे।

“अमृता, अब चल भी, बायोलॉजी की क्लास शुरू होने वाली है।” मनरूप ने दूर से आवाज लगाई।

“अच्छा, कीरत, चलती हूँ अब।” अमृता उठने लगी।

“तेरी बायोलॉजी की टीचर को मुझसे क्या दुश्मनी है?अभी चार पल भी न गुजरे, जी भर के साथ बैठने भी नहीं देती तेरी बायोलॉजी की टीचर।” कीरत ने बुरा सा मुंह बनाया।

“कीरत जी, पहले अमृता के घर आकर उसका हाथ मांगना पड़ेगा उसके घरवालों से, फिर जितना जी चाहे बातें कर लेना।” मनरूप अमृता को साथ लेकर जाने लगी।

“अब जाने भी दे कीरत, तुझे भी तो अपना कॉमर्स का काम करना है।” कॉमर्स के नोट्स सम्भालता परमिंदर कीरत के पास आ गया था।

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     मनरूप ने परमिंदर की ओर निगाह उठाकर देखा तो परमिंदर झेंप सा गया। मुस्कुराती हुई मनरूप, अमृता को साथ लेकर चली गई।

“परमिंदर, यार,तू बोल भी दें न उससे अपने दिल की बात।अमृता से मैंने पूछ लिया है, मनरूप भी तुझे पसंद करती है लेकिन पहल तो तुझे ही करनी होगी।” कीरत परमिंदर को समझाने लगा।

“नवरात्र का व्रत पूरा हो जाने दे यार, इस बार नवमी वाले दिन पक्का उसे प्रपोज़ करूंगा।” परमिंदर ने हौले से कहा।

“अच्छा, तो इस बार तूने नवरात्र का व्रत रखा है उसकी “हाँ” सुनने के लिए” कीरत हंसते हुए बोला। आखिरकार नवमी का दिन आ ही गया। अगले दिन दशहरा था, इसलिए कॉलेज में काफी चहलपहल थी। कुछ को कॉलेज की कल्चरल कमेटी की तरफ से रामलीला के आयोजन की तैयारी करनी थी, तो कुछ रावण का पुतला बनवाने में जुटे थे।

 आज पढ़ाई कुछ खास नहीँ हो रही थी। कीरत और अमृता पार्क में टहल रहे थे।

“पता नहीं वो उसे बोल भी पाया होगा या नहीं।” कीरत की बात पर अमृता मुस्कुराकर बोली, “बोल भी दिया है और हां भी हो गई, वो देख।”

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सामने परमिंदर और मनसुख साथ में चले आ रहे थे। दोनों के चेहरों पर साफ नजर आ रहा था कि अभी कुछ ही देर पहले उन दोनों ने एकदूसरे से अपने प्यार का इज़हार कर दिया है।

“मुबारक हो, यार, आखिर इस बार दशहरा खूब धूमधाम से मनाएंगे। इस बार हम दो के बजाए चारों जो साथ में घूमने जाएंगे।” बेबाकी से बोलते हुए कीरत को अमृता ने कोहनी मारी।

    “मैं कल शाम को तुम लोगों के साथ नहीं जा पाऊंगी, घरवाले भीड़ वाली जगहों पर मुझे भेजने में डरते हैं।” मनसुख ने हिचकते हुए कहा, तो परमिंदर बोल पड़ा,”मेरे साथ रहकर भी डर लगेगा तुम्हें?”

मनसुख ने शरमा कर नज़रें झुका लीं। आखिरकार तय हुआ कि अमृता उसे अपने घर लाने के बहाने मेले में ले आएगी।

  दशहरे के मेले में सचमुच बहुत भीड़ थी। परमिंदर ने मजबूती से मनसुख का हाथ थाम रखा था।

“कीरत थोड़ा तेज चलो, मनसुख आगे है।”अमृता कीरत को खींचती हुई सी भीड़ में चलने लगी।

“अरे, चिंता मत कर,अब वो अकेली नही है, परमिंदर है उसके साथ। वो उसे भीड़ में अकेला नहीं छोड़ेगा।” कीरत की बात पर अमृता भी कुछ निश्चिन्त हो गई।

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“रावण दहन” शुरू हो गया था। खूब बम-पटाखों की आवाज़ें आ रही थीं। तभी अचानक भीड़ के रेले ने उन्हें पीछे धकेल दिया। वो जब तक कुछ समझ पाते, तब तक वहां चीख-पुकार गूंजने लगी। कोई रेलगाड़ी आ गई थी वहीं पर, जहाँ से वो रावण दहन देख रहे थे और न जाने कितने मासूमों को कुचलते हुए चलती चली गई थी।

अमृता और कीरत पागलों की तरह परमिंदर और मनसुख को ढूंढ रहे थे। उल्लास का वातावरण मातम में बदल गया था। जाने कितने शरीर कटे हुए पटरी पर बिखरे थे। तभी अमृता लहूलुहान दो हाथ थामे हुई लाशों को देखकर चीख पड़ी। आज न जाने ऐसी कितनी मासूम जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश हो गईं थीं।

 दशहरे के अवसर पर अमृतसर में चौड़ा फाटक के पास हुई रेल दुर्घटना पर सारा देश सकते में है।

समयधारा परिवार घायलों के प्रति गहरी संवेदना रखता है और मृतकों की आत्मा की शांति की प्रार्थना करता है।

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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