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बुलंदशहर विशेष – मॉबलिंचिंग का भुक्तभोगी

बुलंदशहर विशेष – मॉबलिंचिंग का भुक्तभोगी 

बीते हफ्ते देश की सियासत का पर्याय माने जाने वाला प्रदेश उत्तरप्रदेश फिर से सुर्ख़ियों में रहा |

इस बार सियासत की कुर्सी को बदलने को लेकर नहीं| बल्कि सुर्ख़ियों में था, गाय के मांस को लेकर भड़की हिंसा  जिसमे दो लोगों की मौत हो गयी |

एक भीड़ का हिस्सा मात्र बनकर रह गया सुमित था  और दूसरे थे पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह |

बुलंदशहर की ये घटना जिसमे एक पूरा भीड़ का झुण्ड पुलिस चौकी पर हमला करता है,

और पुलिस के साथ मुठभेड़ को अंजाम देता है | जिसमे अपनी ड्यूटी करते हुए पुलिस अफसर की जान भी चली जाती है|

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये खुलेआम गुंडागर्दी नहीं है ? और इसका जवाब यही है कि ये गुंडागर्दी ही नहीं ये खुले आम मॉब लिंचिंग है |

बुलंदशहर विशेष – मॉबलिंचिंग का भुक्तभोगी 

इस बार मॉब लिंचिंग के शिकार किसी और के पिता पुलिस अफसर सुबोध कुमार सिंह हुए हैं |

अगली बार कोई और हो सकता है | आखिर इस भीड़नुमा शिकारी को किसका सरंक्षण प्राप्त है |

जो हर बार भीड़ की शक्ल में आकर , धर्म का सहारा लेकर , किसी की  भी हत्या करके आगे बढ़ जाता है |

क्या ऐसे ही आज़ाद भारत की कल्पना सरदार पटेल और  गाँधी नें की थी |

या फिर जिस नए भारत की बात प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी करते हैं उसकी रूपरेखा इससे मिलती है |

निश्चित ही ऐसा नहीं होगा | फिर भी विश्व को अपनी पहचान बताने वाले लोकतंत्र में लगातार ऐसी घटनाये हो रहीं हैं |

बुलंदशहर विशेष – मॉबलिंचिंग का भुक्तभोगी 

इसकी जवाबदेही सिर्फ और सिर्फ सरकार की ही बनती है | क्यूंकि जनता नें अपनी सुरक्षा के लिए उसे चुना है |

ये घटना उत्तरप्रदेश की है तो निश्चित तौर पर प्रदेश की योगी सरकार की जवाबदेही बनती है |

कई महीनों से आपकी सरकार शहरों के नाम बदलने के मामले में सबसे आगे चल रही है,

और अगर विकास का पैमाना नाम बदलना होता तो आज उत्तरप्रदेश शिखर पर होता |

और उसी शिखर से देश की राजनीति को राह दिखा रहा होता | मगर ऐसा हो न सका और हालात किसी से छुपे हुए नहीं हैं |

अगर इस पूरे घटनाक्रम को आप गौर से देखेंगे तो सुनने समझने वाली बात बोली है ,

सुबोध कुमार सिंह के बेटे नें कि देश की व्यवस्था को बनाकर रखिये इसे धर्म की राजनीति के रूप में ना बाटिये |

मैंने अपने पिता को खोया है किसी और के पिता की जान इस धर्म की राजनीति में नहीं जानी चाहिए |

पर भारतीय राजनीति एक अलग ही दौर से गुज़र रही है | पार्टियों को सरकार बनाने से मतलब है |

उसके भले ही धर्म का सहारा लेना पड़े किसी को कोई गुरेज़ नहीं है |

क्यूंकि राजनीति अब समाज सरोकार के लिए कम और व्यक्तिगत सरोकार के लिए ज्यादा की जाती है |

सियासत की एक खासियत है , दंगे हो , फसाद हो , मॉब लिंचिंग हो ,

मरता सिर्फ आम इंसान ही है |

बुलंदशहर विशेष – मॉबलिंचिंग का भुक्तभोगी 

 

 

डिस्क्लेमर(अस्वीकरण): इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखिका के व्यक्तिगत है। लेख में व्यक्त किसी भी सूचना की सच्चाई,सटीकता,संपूर्णता और व्यावहारिकता के प्रति समयधारा उत्तरदायी नहीं है। इस लेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई है।लेख में प्रस्तुत कोई भी सूचना या तथ्य या व्यक्त विचारधारा समयधारा की नहीं है और समयधारा इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी या जवाबदेयी नहीं है।

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