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धर्म के नाम पर बवाल करने वालों, क्या इंसानियत से बड़ा धर्म कोई है..?

इसांनियत ही है सबसे बड़ा धर्म, फिर क्यूँ होता धर्म के नाम पर बवाल

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मैं किसी जात या धर्म विशेष की खिलाफत में नहीं हूँ, मेरे लिए हर जात व धर्म बराबर हैं।

जब लेकिन अपने धर्म का प्रचार करने वाले दरवाजे तक पहुंच जाते हैं।तब गुस्सा आता है।

इक तरफ अपने धर्म के अनुसार वे लोग यही शिक्षा देते रहते हैं कि कोई जात-पात व कोई धर्म अलग से नहीं वरन् इसांनियत ही  सबसे बड़ा धर्म है ।

दूसरी ओर यह भी कह जाते हैं कि फलां धर्म को अपनाओगे तो भव सागर पार तर जाओगे।

आज जब सुबह-सुबह ईसाई धर्म के प्रचार के लिए दो महिलाएं दरवाजे पर पहुंची तो मुझे पहले तो लगा, वे प्रदूषण को लेकर परेशान है।

वे शुरुआत ऐसे करते हैं कि इसांन खड़े रहने पर मजबूर हो जाता है,

धीरे-धीरे उन्होंने बताना शुरू किया कि इस प्रदूषण का कारण कौन है, हम सभी हैंं।पर क्या हम हल निकाल सकते हैं?

नहीं इन सबका हल सिर्फ ईश्वर निकाल सकता है। फिर असलियत पर आ गई। सिर्फ ईसा मसीह ही इस विनाश को रोक सकते हैं।

वे ही इस ग्लोबल वार्मिंग को रोक सकते हैं। फिर कहने लगी आपके पास कब वक्त है,

हम आपसे भविष्य में इस विषय पर बात करते रहना चाहते हैं।

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        इसी तरह आजकल ,’ओम शांति ओम’  का प्रचार भी जोरों पर है। शिव बाबा को बताते-बताते वे ब्रह्म बाबा जो
इस धर्म के रचियता है के गुणगान पर उतर आते हैं। उनके अनुसार तो बस अब प्रलय होने वाली है,
जो इस धर्म को अपनायेगा बस वही जीवित बचेगा। उनके अनुसार सब बस बहन-भाई है,
अगर ऐसा हो जाएगा तो समझ नहीं आता सृष्टि की रचना ही रूक जाएगी। हाँ उनके हिसाब से सच भी है जो हैं
उनका वक्त आने पर वे चल बसेगें, सृष्टि रचना वैसे रूक ही जाएगी फिर प्रलय अपने आप हो जाएगी।
मैनें मेडिटेशन के हिसाब से सात दिन के उनके प्रोग्राम को एटेंड किया।लेकिन उसमें सिर्फ हमें इस धर्म की स्थापना की बेसिक जानकारी ही देते रहे। लगता रहा मांइड वास करना चाहते हैं। जगह -जगह सेंटर खुल चुके है।
टीवी पर ‘पीस ऑफ मांइड’ के नाम से इक चैंनल है। मांउट आबू में में मेन सेंटर है।
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    इसी तरह बोद्ध, जैन,हिंदू, इस्लाम, सिख व सभी धर्म अपने गुणगान गाने में लगे हैं। समझ नहीं आता कि सब धर्म यही मानते हैं कि,
ईश्वर एक है तो फिर धर्म के नाम पर बवाल क्यूँ मचाते हैं,
कभी मंदिर की जगह मस्जिद तो कभी मस्जिद की जगह मंदिर क्यूँ यह हडकंप मचा रखा है?
मंदिर की जगह मस्जिद
मस्जिद की जगह मंदिर
यह तो सिर्फ इंसानी जुनून
फितरत व बेकार की जिद्द है…..
अपनी दो औलादों के इस झगड़े
में वरना वह बाप क्यूँ चुप है…..
सब धर्म मिलकर एक क्यूँ नहीं हो जाते और और क्यूँ नहीं सिर्फ इसांनियत का प्रचार करते?
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क्यूँ सब धर्म अपनी-अपनी शरण में आने को कहते हैं? नहीं शायद यह सुख, शांतिव समृद्धि तो महज दिखावा है ।
दरअसल बात कुछ और ही है। अगर इन सबका मकसद मानवीय भलाई है तो अपने -अपने धर्म की शरण में आने की क्यूँ कहते हैं?
सोसल वर्क के जरिए भी यह सब संभव हैं।लेकिन आजकल कुछ लोग एनजीओ के माध्यम से भी कमा रहे हैं।
पता नहीं इसांन की इस बदलती प्रकृति से ही यह विकार पैदा हो रहे हैं।
अपनी फैलाई अशांति से अब शांति की खोज में दर-दर भटक रहे हैं।जिसको जिस धर्म को अपना शांति मिले व धर्म अच्छा।
शायद यही सच्चाई है आज का मानव स्वार्थप्रस्थ होता जा रहा है।इसलिए शायद प्रकृति असंतुलित हो उठी है।
परेशान इसांन भी है पर बदलाव नहीं चाहता।अपनी आदतों के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा।
अगर ऐसा रहा तो वह दिन दूर नहीं जबयदस्ती जाने कितने धर्मों व समुदायों में लोग बंट जायेंगे।
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हाँ मैं ऐसे राष्ट्र की कल्पना करती हूँ

जहाँ क्षितिज ही बस सरहद हो!
न कोई जात-पात न कोई धर्म जहाँ
प्रेम मोहब्बत ही हर रिश्ते की हद हो
ऋतु गुप्ता
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Ritu Gupta

लेखिका रितु गुप्ता लोकप्रिय बुक राइटर है। लेखन में वर्षों का गहन अध्ययन और प्रत्येक मुद्दे पर बेबाक राय के लिए जानी जाती है और शुरुआत से समयधारा परिवार का हिस्सा रही है।

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