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हर त्यौहार मनाये बस श्रद्धा के साथ न कि स्टेटस सिंबल के साथ

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अपनी संस्कृति से जुड़े रहना

जोड़े रखता है घर-परिवार
बुजुर्गों के सपने सींचने से
फलफूलित होते हैं संस्कार।
यह बेहद गर्व की बात है कि हमारा देश ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ शायद इतने अधिक धर्म व जाति समुदाय के लोग रहने के बाद भी देश की संस्कृति को एकता के सुत्र में बाँध के रखे हुए हैं। सब एक साथ एक दूसरे के त्योंहार मनाते हैं। मुझे भी खुशी होती है कि मैं इस देश की नागरिक हूँ,पर कुछ त्योंहार जो आस्था के साथ जुड़े हैं जब वे अपना स्टैंडर्ड सिंबल बनाने हेतू प्रतियोगिता पर ऊतर आते हैं तो बहुत दुख होता है।उनमें से एक करवाचौथ भी है।
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महीने भर पहले से ही बस गृहणियों में होड़ शुरू हो जाती है।शोपिंग फिर पार्लर जैसे की पूरे साल की कसर अभी निकाल देंगी। ब्यूटीपार्लर इन दिनों खचाखच भरे होते हैं मानो पति का सारा पैसा लुटाने की ठान आई हों। वहाँ बैठ जो बात सुनने का तजुर्बा इस साल मैनें हासिल किया वह अपने आप में अनूठा है।खुद ही अपने उस दिन सजने -धजने के ऊपर सफाईयां पेश कर रही थी कि वे लोग क्यूँ तैयार होती हैं।सब अच्छे से अच्छे पार्लर सभी ब्रांडेड कास्मेटिकस प्रोडेक्ट्स को ही चुनती हैं।उनकी बातों से लगा कि वे पति महोदय के लिए कम लेडीज एक-दूसरे को दिखाने के लिए ज्यादा सजती हैंं।
मेहंदी लगाने वालों की तादाद मेंहदी लगवाने वालों से भी ज्यादा होती है।इन दिनों रेट भी काफी उँचे होते हैं।पर यहाँ भी तो जबरदस्त प्रतियोगिता होती है कि किसकी मेंहदी कितनी सुंदर है ?कैसी रची है ? जिसकी मेंहदी जितनी गहरी उतना गहरा उनका प्रेम। सब बातें निराधार हैं। सुबह तड़के उठकर सरगी खा फिर सज-धज कर करवे के साथ दिन में करवा चौथ मैया की पूजा कर रात को चाँद फिर पति देव के दर्शन करने के साथ व्रत की समाप्ति हो जाती है।यह व्रत पति की दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है।जो पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व देश के बहुत से हिस्से में रखा जाता है।
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कोई भी व्रत त्योंहार अंधविश्वास के बल पर नहीं आस्था के साथ मनाना चाहिए। हमारे देश विशेष कर राजस्थान  में कई  त्योंहार सावन मे ऐसे आते हैं जो मुझे आज तक समझ नहीं आये उनमें बछवारस व दूबड़ी सप्तमी प्रमुख हैं।पर अपनी पारिवारिक परम्परा को तोड़ने की शायद मैं भी हिम्मत कम कर पाती हूँ। करवा चौथ के चार दिन बाद आयेगी अहोई अष्टमी।इसमें दिवार पर गाय बछड़े व अहोई बना पुत्र कामना व उनकी दीर्घायु के लिए व्रत रखा जाताहै।जो शाम को तारों को देख समाप्त हो जाता है। मेरे दादाजी आर्य समाजी थे मुर्ति पूजा में उनका विश्वास नहीं था। सुबह चार बजे उठ माला फेर लेते थे। वे अक्सर लेडिज की करवा चौथ व सुबह चार बजे उठ खाने की परम्परा के खिलाफ कहते कि इसे गटक चौथ बोलना चाहिए।
अहोई अष्टमी को दादीजी को खुद ही लिप पोत पूजा करते देखते तो हँस कर अक्सर कहते….
‘खुद ही लिपे,खुद ही पोते
खुद ही माँडे अहोई
फिर उनसे बेटा पोता माँगे
बता जरा तू मुझे तेरी अक्ल
कहाँ खोई।’
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यह तो खैर सबकी अपनी-अपनी श्रद्धा व आस्था की भावना है। पर यह भी सच है कि वक्त बदल चुक है।अभी भी कई हिस्सों में सती पूजा जबरदस्त होती है।हमारा देश हर धर्म की कद्र करता है।इसलिए हम सभी सभ्य निवासियों की जिम्मेदारी बनती है कि देश की संस्कृति भी जिंदा रहे व अंधविश्वासों व जादू-टोनों जैसी वाहयात बातों का जड़ से खात्मा हो।
मैं नास्तिक नहीं हूँ,मैं भी व्रत रखती हूँ  वह अपनी संस्कृति  को अपना गर्व महसूस करती हूँ।पर शायद जो व्रत की महिमा है व आस्था के हिसाब से। मेरा सभी बहनों से निवेदन भी यही है कि देश की परम्परा को भेड़चाल में परिवर्तित न होने दे।वरन् उसकी श्रद्धा के हिसाब से अनुसरण करें। खूब सजे-धजे पर बस अपनी हैसियत में रह कर सिर्फ व सिर्फ श्रद्धा को ध्यान में रख कर।
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