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नेता जी! … देश का हित क्या दल-बदलने से हो जाता है सुरक्षित?

कल तक मैं इस पार्टी में था चूंकि मेरी विचारधारा इसके अनुसार थी लेकिन आज उस पार्टी में हूं चूंकि मेरी विचारधारा उस पार्टी के साथ है

Changing a party of politician is just a political advantage and loss

नई दिल्ली,28 मार्च : भाईयों-बहनों….आप इस बात को समझिये मेरे लिए पार्टी से बड़ी है मेरी विचारधारा और अपनी विचारधारा के लिए मैं पार्टी भी बदल सकता हूं। कल तक इसमें था और आज उसमें हूं। क्योंकि ये लड़ाई पार्टी की नहीं बल्कि विचारधारा की है। कल तक मैं इस पार्टी में था चूंकि मेरी विचारधारा इसके अनुसार थी लेकिन आज उस पार्टी में हूं चूंकि मेरी विचारधारा उस पार्टी के साथ है…

कुछ इसी तरह की भाषणबाजी आजकल आप सुन रहे होंगे,खासकर हमारे दल-बदलू नेताओं के मुंह से।

2019 के लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चुनावी बिगुल बज चुका है। सत्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव 11अप्रैल से 19 मई के बीच होगें।परिणाम 23 मई को सुनाये जायेंगे। इसके साथ ही शुरु हो गये हैं सारे राजनीतिक दांवपेच

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सीटों की अदला-बदली,कौनसा प्रत्याशी कहाँ से चुनाव लड़ेगा, कितनी सीट होंगी इत्यादि, पर इसके साथ-साथ हम यह कैसे भूल गये कि हमारे नेतागण सिर्फ देशभक्ति के लिए ही थोड़े चुनाव लड़ते हैं,उनको भी तो अपना घर चलाना है वो लोग भी सियासी फायदे के पूरे हकदार हैं,जहाँ उनको जीत मिलती नजर आयी वहीं से और उसी पार्टी के पक्षधर हो जाते हैं।

जिस पार्टी के लिए जान छिड़कते थे अचानक वह उनके लिए एक बेकार विचारधारा वाली पार्टी साबित हो जाती है।जबकि उसके पीछे के कारण कुछ और ही होते हैं जैसे पसंदीदा सीट न मिलना,पार्टी में दर किनार कर देना व सियासी फायदे व नुकसान आदि।

सत्रहवीं लोक सभा के गठन के लिए भारतीय आम  चुनाव 2019 से पहले दल बदलने वाले नामों पर एक नजर डाले तो बस यह छोटी सी लिस्ट सामने आयी है—-

उत्तर प्रदेश की प्रयागराज सीट से बीजेपी सांसद श्यामाचरण गुप्ता समाजवादी पार्टी (एसपी) से जुड़ गए हैं

जेडीएस के कद्दावर नेता दानिश अली बीएसपी का हिस्सा बन चुके हैं

टॉम वडक्कन कांग्रेस का हाथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए हैें

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बीजू जनता दल (बीजेडी) के पूर्व सांसद बैजयंत जय पांडा बीजेपी में शामिल हो चुके हैं

ओडिशा की नबरंगपुर सीट से बीजेडी सांसद बलभद्र मांझी बीजेपी से जुड़े चुके हैं

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र विधानसभा में नेता विपक्ष राधाकृष्णन विखे पाटिल के बेटे सुजय विखे पाटिल बीजेपी में शामिल हो गए हैं

टीएमसी सांसद अनुपम हाजरा बीजेपी में शामिल हो चुके हैं

यूपी के बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है

बीजेडी नेता और राज्यसभा सांसद प्रशांत नंदा के बेटे ऋषभ नंदा हुए BJP में शामिल हो गए हैं

इंडियन नेशनल लोक दल विधायक रणबीर गंगवा बीजेपी में शामिल हो चुके हैं

तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) सांसद एसपीवाई रेड्डी पवन कल्याण की जन सेना पार्टी में शामिल हुए हैं

त्रिपुरा बीजेपी उपाध्यक्ष सुबल भौमिक कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं

अरुणाचल प्रदेश में 8 मंत्री/विधायक नेशनल पीपुल्स पार्टी में शामिल हो चुके हैं

दिल्ली में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के नेता चंद्र प्रकाश मिश्रा बीजेपी में शामिल हो चुके हैं

महाराष्ट्र में एनसीपी के पूर्व सांसद रंजीत सिंह मोहिते पाटिल बीजेपी में शामिल हुए हैं

बीजेपी सांसद भुवन चंद्र खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं

गोवा में सुधीर कांडोलकर ने छोड़ा बीजेपी का साथ, थामा कांग्रेस का हाथ।

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उनकी यह बचकानी हरकतें देख जहन में एक ही बात आती है क्या ऐसे लोगों के कंधे देश की सुख व समृद्धि के भार उठाने योग्य हैं,जो अपनी बातों व वादों पर अटल नहीं है।यह तो वही बात है कि घर का भेदी लंका ढ़ाहे। वैसे भी सभी एक ही देश की सेवा के लिए जनता के द्वारा चुने जाने वाले प्रत्याशी है और जब देश एक ही है तो पार्टियों का फेर बदल तो सिर्फ अपना खुद का लालच भर है।

“कहने को तो खुदा तुम हमारे

लेकिन क्या किया

सिवाए वचनों के तुमने हमें

और क्या -क्या दिया?

पलड़ा जिधर भारी दिखा उसी ओर हो लिए

बन वफादार जो जाना उसी का भेद खोल दिया

करना तो दूर वरन् फैला चहूँ दिश फिर भ्रष्टाचार

आपस में तो भीड़ाया अराजकता को भी फैला दिया।

सदा दो रूप रहे तुम्हारे

आज कुछ तो कल कुछ

असली तो और भी बुरा हो शायद!

अबकी बार आये तो वचन दे जाओगे

फिर आओगे तो फिर दे जाओगे

तुम ठहरे चालबाजक उस भोलीभाली

जनता को अपने चंगुल में फंसा जाओगे!

पर ऐसा तुम इक या दो बार ही तो कर पाओगे

फिर जान तुम्हारा हाल पहले से ही गिर जाओगे।

क्यूंकि धोखा इक बार खाने पर इसां संभल जाता है

असलियत जाने पर नजरों में उनकी गिर जाओगे।”

और तो और जब चुनाव प्रचार के वक्त वही नेता जो देश के विकास व नवयुवकों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं पैसों व दारू के बलबूते पर वोट माँगने गांव-गांव व शहर-शहर पहुंच जाते हैं। यह कोई झूठ नहीं वरन् एक बहुत बड़ा सत्य है।

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हजारों वादे कर जनता को लुभाने वाले नेतागण जीतने के बाद एक आध वादा पूरा कर सिर्फ अपनी जेब गर्म करते नजर आते हैं। अनेक योजनाएं कब नियोजित की जाती है और पूरा करते-करते वर्षों बीत जाते हैं। ऐसे नेता फिर अपने फायदे के लिए दल भी बदल ले यह उनके लिए कौनसी बुरी बात है?

हमारे परमप्रिय नेतागण! आप लोगों से हाथ जोड़कर गुजारिश है कि आप आपसी रंजिश के आड़े देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ मत करें। जिस देश की रक्षा का वास्ता दे चुनावी मैदान में उतरते हैं। उसका कुछ लिहाज करना सीखें। यह देश हम सबका है।

सिर्फ नाम, पैसा व शोहरत के लिए आप लोगों का कोई हक नहीं बनता कि देश की इज्जत दांव पर पर लगा दें। कुर्सी का लालच ठीक नहीं है। बदलती सोच व विचारधारा तो एक बस बहाना भर है क्योंकि अगर देश के हित के लिए सत्ता में आना है तो किसी पार्टी में हो क्या फर्क पड़ता है ? इसां जब खुद सुपथ पर है तो वह गलतियां करेगा ही क्यों?

आप अपने कुर्सी के लालच को इतना मत बढ़ने दें कि देश के हित की अनदेखी हो जाए।

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“आज देश में कुर्सी पाने की

लोगों में होड़ सी लगी है

जबकि देश में इसी झगड़े

वश तोड़-फोड़ लगी है

कुर्सी का इतना शौक है तो

पहले घर की कुर्सी पर बैठ कर देखो ना!

वहाँ तो बस कुछ ही तो जन है

पर वहाँ कहाँ लगता भला तुम्हारा मन है

जब इक घर को नहीं संभाल पाते

तो फिर इस देश पर शासन क्यूँ चाहते हो?

शासन हाथ आयेगा या न आयेगा पर…

देश का ढांचा जरूर बिगड़ जायेगा।

इक तरफ तुम्हें पैसों की लगी है

दूसरी तरफ भविष्य की सोच देश

की आँख तक न लगी है।

ऐसा कर देश की तो नींद मत खराब करो

चाहे तुम पैसों के लिए रातों रात जगा करो।

समझ नहीं आता कि

देश तुम्हारा है,शासन तुम्हें करना चाहिए

फिर खूनखराबा करके क्या करना है?

शायद वो गुलामी भूल गये!

उससे कहीं अच्छा है अब

क्या अधिकार थे तुम्हें तब?

सिर तुम्हारा इसीलिए चढ़ गया है

कुर्सी पाने का लालच तभी बढ़ गया है।

शायद हमारे वो शहीद इसीलिए आजादी

दिलवा कर गये थे

ताकि खूब हिंसा भड़के

देशवासी खत्म हो जाये लड़- मर के

तब तो तुम्हें भी आजादी की लगी थी

अब आजाद हो तब लालच और भी बढ़ गये

आज नेतागण कुर्सी के लालच में सड़ते ही गये।”

अब सवाल उठता है कि देश की जनता कब ये समझेगी कि जो अपनी पार्टी का नहीं हुआ वो देश का भला क्या होगा? और यदि सच में दल-बदलना केवल विचारधारा की लड़ाई है तो पूरे पांच साल क्यों लग जाते है इन दल-बदलूं नेताओं को अपनी विचारधारा समझने में? पार्टी अगर पथ से भटक गई है तो इसका पता केवल चुनाव की आहट होते ही क्यों लगता है इन दल-बदलूं नेताओं को?

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जवाब आप और हम सब जानते है-सत्ता की मलाई। 

जिस वर्ष जिसकी चढ़ेगी कढ़ाई खायेगा केवल वहीं सत्ता की मलाई!

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