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बस्ते का वजन कम करने के लिए उचित टाइमटेबल का हो निर्धारण

मैं यही सोचती रह जाती हूँ कि यह स्कूल के तीसरे माला तक कैसे लेकर चढ़ता होगा। भारी भरकम बैग को देखकर लगता है कि पता नहीं क्या ठूंसा हुआ है इसके अंदर?

reduce weight of school bag- मेरा बेटा जब सुबह स्कूल तैयार हो कर जाने लगता है तो मेरा दिल करता है कि बस तक मैं बैग उठा कर ले चलूँ पर… यह मेरे लिए उठा कर ले चलना तो दूर खड़े-खड़े उठाना ही नामुमकिन है।

मैं यही सोचती रह जाती हूँ कि यह स्कूल के तीसरे माला तक कैसे लेकर चढ़ता होगा। भारी भरकम बैग को देखकर लगता है कि पता नहीं क्या ठूंसा हुआ है इसके अंदर?

यह कहने पर कि टाइमटेबल के हिसाब से क्यूँ नहीं लगाते तो जवाब मिलता है कि टाइमटेबल के हिसाब से ही बैग लगा है… तो मुझे टीचर्स व मैनेजमेंट के ऊपर गुस्सा आ कर रह जाता है।

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लेकिन अब केन्द्र सरकार ने कक्षा के हिसाब से बस्तों का वजन तय किया है उससे थोड़ी उम्मीद जगी है।यह सर्कुलर 22 नवंबर को जारी किया गया था ।

इसके मुताबिक पहली व दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के बस्ते का वजन डेढ़ किलोग्राम,तीसरी से पाँचवी कक्षा के लिए 2 से 3 किलोग्राम, छटी से आठवीं के लिए चार किलोग्राम,इसी तरह कक्षा आठवीं से नौवीं के लिए साढ़े चार किलोग्राम व दसवीं से बारहवीं के बच्चों के बस्ते का वजन पाँच किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए।

लेकिन सरकार का यह सराहनीय कदम कितना सफल होता है।यह स्कूल द्वारा निर्धारित टाइमटेबल पर ज्यादा निर्भर करता है। टाइमटेबल ऐसा होना चाहिए कि बच्चों का बस्ता हल्का ही रहे।

बच्चों को घर से कम से कम किताब-कापी ढोनी पड़े या फिर बच्चों को क्लास रूम में ही अलमारी और इतना स्पेस मिलना चाहिए कि वे प्रैक्टिस व गृहकार्य जरूरी किताब ही घर ले कर जाये।

स्कूल में ही ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिस होनी चाहिए। गृहकार्य जरूरत से ज्यादा नहीं मिलना चाहिए। स्मार्ट क्लासेज भी बैग के वजन को कम करने का नायाब तरीका है।

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टाइमटेबल ऐसा होना चाहिए कि मानसिक विकास के साथ-साथ शारिरिक विकास के लिए जरुरी खेलकूद भी जरूरी हो। इससे बस्ते पर भी भार कम होगा।

पढ़ाई तो हम लोग भी करते थे। मगर इतना वजन नहीं होता था। इसका इक कारण यह भी है कि आजकल एक ही विषय की कई लेखकों की किताबें बता देते हैं।

इससे बच्चे के ऊपर मानसिक प्रेशर बनता है। उसके लिए भी अब सरकार ने पाँचवी कक्षा तक कुछ विषयों के लिए सिर्फ एनसीआरटी की किताबें जरूरी कर दी गई हैं।

इससे बच्चों के स्कूल बैग के साथ थोड़ा मानसिक वजन भी कम होगा। वजन उठाते-उठाते ही बच्चा इतना थक जाता है कि घर आकर निढ़ाल हो जाता है।

लेकिन अब उम्मीद जगी है कि स्कूल वाले इस फैसले का दिल से स्वागत करेंगे। वैसे भी बच्चों का सर्वांगीण विकास होना जरूरी है।

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