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Independence Day 2018 Special: भारत की आज़ादी के 72 साल: महिलाओं के लिए बेमिसाल

पिछले दो-तीन दशकों से नारी की दशा में बदलाव आने लगा है, अब किसी गीता की माँ उसे चुप रहकर अपमान के घूंट पीने पर मजबूर नहीं करती...

“क्या बात कर रही है लल्ली? किसी के सामने बोल भी मत देना वरना बड़ी बदनामी हो जाएगी।” आँखें फाड़े गीता की माँ उसे ऐसे देख रही थी, जैसे वो कोई भयंकर अपराध कर के आई हो।

दरअसल बात बस इतनी थी कि किशोरावस्था से युवावस्था की ओर कदम रखती गीता के शराबी मौसा ने उसे मौका पाकर जबरन दबोच लिया था और कुछ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी। गीता उसको धक्का देकर किसी तरह खुद को बचाकर वापस आई थी।

“लल्ली, आगे से तू मौसा के सामने मत पड़ना, कहीं फिर से उसने कुछ करने की कोशिश की तो हमारी बिरादरी में नाक कट जाएगी। अरे वो तो मर्द है, उसे कोई कुछ नहीं कहेगा, बदनामी तो हम औरतों को झेलनी पड़ती है।”

डरी-सहमी गीता के कानों में पड़ते माँ के ये वाक्य उसे दहशत में डाल देते हैं। वो किसी अंजान पुरुष की परछाईं से भी डरने लगती है। पुरुषों के सामने कुछ भी बोलने में उसे घबराहट होने लगती है।

सीधे-सीधे ये कहा जाए कि पुरुष को सामने देखकर उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है। खुद को दोयम दर्जे का मानकर ही जीने की उसकी आदत पड़ जाती है।

अब उसे बुरा नहीं लगता अगर माँ कहे कि पढ़ाई करने के लिए बेटा बाहर जाएगा और बेटी घर पर रहकर घर के कामों में माँ का हाथ बंटाएगी। उसे पता होता है कि घी चुपड़ी रोटी भाई को और सूखी रोटी उसे अपने लिए रखनी है।

कूदना-फाँदना भाई का हक़ है, उसका नहीं, क्योंकि वो मर्द नहीं है, वो एक औरत है और उसका उठाया गया कोई भी कदम उसके खानदान की इज्ज़त दांव पर लगा देगा।

ये है 4-5 दशकों पहले भारत में रहने वाली आम औरत की तस्वीर। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो आम भारतीय नारी खुद को पुरुषों से कमतर मानकर ही जीती थी।

उसे कम उम्र में ही शादी करके इस सीख के साथ मायके से विदा किया जाता था कि बेटी अब हमारी इज्ज़त तुम्हारे हाथ में है। उस घर को ही अब अपना समझना। तू अब हमारे लिए पराई हो गई। जिस घर मे तेरी डोली जा रही है, उस घर से तेरी अर्थी ही उठनी चाहिए।

बस इसी बात को गांठ बांधे बेटी ससुराल में रमने की कोशिश करती थी। कोई मारपीट-ज्यादती करे तो मुंह सिल लेती थी, क्योंकि उसे पता होता था कि ये उसके परिवार की इज्ज़त का सवाल है।

चार पाँच दशकों पहले तक नारी को मर्यादा के नाम पर ज़्यादतियों के खिलाफ आवाज़ न उठाने की सीख दी जाती थी। नारी चुपचाप प्रताड़ित होती रहती थी और इसे अपनी नियति मानकर जीती थी।

ये वो दौर था जब बेटी का पैदा होना अपशगुन समझा जाता था। कई परिवारों में तो बेटी को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता था। घर की चारदीवारी के अंदर नारी दबी-कुचली जाती थी।

शिक्षा का नितांत अभाव था। नारी अपने हर कदम के लिए पुरुषों की सहमति का इंतज़ार करती थी। विधवा स्त्री का जीवन नरक बन जाता था।

नारियों की इस दुर्दशा को देखते हुए भारतीय कानून व्यवस्था द्वारा नारियों के हित में कुछ नए नियम-कानून बनाए गए। घर के अंदर महिलाओं को सम्मानजनक स्थिति दिलाने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम बनाया गया।

घर संभालने वाली गृहणी को आर्थिक मजबूती देने के लिए भी कुछ नए नियम-कानून विचाराधीन हैं। बलात्कार के विरुद्ध सख्त सज़ा का प्रावधान बनाया गया।

हाल ही में 12 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार करने वाले के खिलाफ फांसी की सज़ा का भी प्रावधान बनाया गया है। इन सब बातों से नारी का आत्मविश्वास बढ्ने लगा है।     

पिछले दो-तीन दशकों से नारी की दशा में बदलाव आने लगा है। अब किसी गीता की माँ उसे चुप रहकर अपमान के घूंट पीने पर मजबूर नहीं करती, बल्कि अब माएँ खुद आगे बढ़कर बेटी के साथ हुए अपराध की शिकायत करती हैं।

आंकड़े बताते हैं कि कुछ वर्षों से महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सच्चाई ये है कि अब महिला पहले से अधिक निडर हुई है और मर्यादा के नाम पर खुद को जीवन भर अपमानित महसूस करने के बजाय अपराधी को सारी दुनिया के सामने लाकर उसे भी सज़ा दिलाने के लिए कृतसंकल्प हुई है।

अब नारी के प्रति वो अपराध जो कभी उजागर भी नहीं होते थे, दुनिया के सामने आने लगे हैं।  

आज़ादी के 72 सालों में महिला लगातार आगे बढ़ रही है। अब वह अनेक क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर चलने लगी है।

आत्मविश्वासी महिलाओं की इस उपलब्धि का पुरुषवर्ग ने भी स्वागत करना शुरू कर दिया है, लेकिन आबादी का कुछ प्रतिशत आज भी महिलाओं के आगे बढ्ने से कुंठित है।

यही वर्ग आज भी नारी के प्रति अपनी कुंठा निकालने के लिए उसे विभिन्न प्रकार से अपमानित करने की कोशिश करता है।

अब कोई कितना भी रोकने का प्रयास करे, भारतीय नारी के कदम तो अब उन्नति की दिशा में बढ्ने ही लगे हैं।

अब व्यवसायिक ,राजनीतिक, खेल जगत, सेना हर क्षेत्र में नारी अपनी सफलता का परचम लहराने लगी है। आगे आने वाला समय भारतीय स्त्री को उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर ले जाएगा।

 

 

 

 

 

 

डिस्क्लेमर(अस्वीकरण): इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखिका के व्यक्तिगत है। लेख में व्यक्त किसी भी सूचना की सच्चाई,सटीकता,संपूर्णता और व्यावहारिकता के प्रति समयधारा उत्तरदायी नहीं है। इस लेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई है।लेख में प्रस्तुत कोई भी सूचना या तथ्य या व्यक्त विचारधारा समयधारा की नहीं है और समयधारा इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी या जवाबदेयी नहीं है।

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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