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“करेले को मलाई कोफ्ता बोलने से वो मलाई कोफ्ता बन जाएगा क्या?”

उसे तो सिर्फ "कर्ज़न रोड" का ही नया नाम "कस्तूरबा गांधी मार्ग" पता चला है। दिल्ली घूमने में अभी न जाने ऐसी परेशानियों का कितना सामना करना पड़ेगा

Change the names of roads- “अरे, ठहर जा सुमित, बड़ा तेज़ भागता है। सड़क है ये, देखकर चल।”, कहते हुए दादाजी उसके पीछे भागते-भागते हांफने लग जाते थे, लेकिन सुमित अपना बस्ता दादाजी को थमाकर पलक झपकते ही घर की ओर दौड़ लगा देता।

ट्रेन में बैठा हुआ सुमित बचपन की यादों में खोया हुआ बैठे-बैठे ही मुस्करा रहा था। सामने बैठी उसकी पत्नी सरिता ने जब आंखों-आंखों में उससे यूं मुस्कुराने का कारण पूछा, तो वो अपनी यादों का पिटारा खोलकर ही बैठ गया।

“कैसे सड़क के दूसरी ओर बैठने वाले खोमचे वाले को वो अपनी बोतल के पानी से भिगो देता था, और कैसे वो हंसते हुए,”अरे बबुआ, हम तो सबेरे ही नहा चुके, तुम तो दुबारा नहलाय दियो।” कहकर नकली गुस्सा दिखाया करता था।

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“कैसे सड़क पर आने-जाने वाले वाहनों के बीच वह दौड़कर सड़क पार कर लेता था और दूसरे किनारे पर खड़े दादाजी रोकते ही रह जाते थे। सब कुछ कितना अच्छा लगता था तब।

सरिता के साथ बच्चे भी मज़े लेकर उसकी बातें सुन रहे थे। हालांकि हैदराबाद से दिल्ली तक रेलगाड़ी के लंबे सफर से सभी काफी थके थे, लेकिन उसकी बातों से बच्चों में एक नया उत्साह जाग रहा था।

स्टेशन पहुंचते ही वहाँ का व्यवस्थित प्लेटफॉर्म देखकर रुपेश को गर्व हुआ। अब प्लेटफार्म पर काफी सफाई थी, और इधर-उधर घूमते हुए भिखारी भी नहीं नज़र आ रहे थे।

हाँ, प्लेटफॉर्म पर आनेजाने वाले लोगों की भीड़ ज़रूर काफी ज्यादा हो गई थी।

स्टेशन से बाहर उतरकर उसने कर्ज़न रोड जाने के लिए सवारी ढूंढने की कोशिश की तो यह जानकर हैरान हो गया कि कर्ज़न रोड का नाम कोई जानता ही नहीं था। गर्मी और थकान से सब बेहाल थे और इतना सारा सामान… सुमित खुद से ज्यादा अपने बच्चों की हालत देखकर परेशान था।

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“आप तो बोल रहे थे कि कर्ज़न रोड पास ही है, लेकिन यहां के लोग तो कर्ज़न रोड जानते तक नही।” सरिता खींझकर बोली।

सुमित भी हैरान था। आखिर एक बूढ़ा सा दिखने वाला टैक्सी वाला उन्हें कर्ज़न रोड ले जाने को तैयार हुआ। जब उसने 500 रुपये बताए तो सुमित को गुस्सा आ गया, “बाबा , इतनी सी दूरी के 500 रुपये, जरा सोचसमझ कर बोलो।”

“तो फिर कोई और ही सवारी ढूंढ लो।” कहकर ऑटो वाला चलता बना।

सुमित को परिवार और बच्चों समेत कड़ी धूप में खड़े खड़े एक घंटा होने को आया, लेकिन कर्ज़न रोड पहुंचने का कोई साधन नहीं मिला। अकेला होता, तो पैदल ही चल देता, लेकिन पत्नी,बच्चे और इतना सारा सामान…

वो परिवार को वहीं रुकने को बोलकर आगे जाकर ऑटो रिक्शा ढूंढने लगा। ऑटो रिक्शा वाले तो बहुत थे, लेकिन कर्ज़न रोड का नाम सुनकर सब अनजानी सी जगह समझने लगते थे। बड़ी मुश्किल से एक ऑटो वाला मिला, जिसने कर्ज़न रोड ले चलने के लिए हामी भरी। इस बार ऑटोवाले के 600 रुपये मांगने पर भी वो चुपचाप उसमें बैठ गया।

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रास्ते में ऑटोवाले ने उसे बताया कि गत वर्षों में दिल्ली की अनेक सड़कों के नाम बदल दिए गए हैं। कर्ज़न रोड का भी नाम बदलकर कस्तूरबा गांधी मार्ग रख दिया गया है।

“ओह! तो इस वजह से उसे सवारी नहीं मिल पा रही थी।”

उसने सरिता की ओर देखा। थकान के साथ-साथ  उसकी आँखों में रोष भी साफ नज़र आ रहा था। बेटी का मुंह सूख रहा था और नन्हा बेटा तो सरिता की गोद में सिर रखकर सो गया था।

बरसों पहले दिल्ली से हैदराबाद शिफ्ट हो जाने के बाद सुमित को आज ऑफिस के काम से दिल्ली आने का मौका मिला तो वह पत्नी और बच्चों को भी यह बोलकर ले आया कि यहां उसका पुश्तैनी घर है जिसे किराए पर दिया गया है। उन लोगों से मिलना भी हो जाएगा और इसी बहाने बच्चों को दिल्ली घूमने का मौका भी मिल जाएगा, लेकिन दिल्ली में कदम रखते ही उसे यह समझ में आ गया था कि अब दिल्ली पहले जैसा नहीं रहा।

उसे तो सिर्फ “कर्ज़न रोड” का ही नया नाम “कस्तूरबा गांधी मार्ग” पता चला है। दिल्ली घूमने में अभी न जाने ऐसी परेशानियों का कितना सामना करना पड़ेगा।

रास्ते में सड़कों की बिगड़ी हालत और गरीबों की बस्तियां देखकर सुमित का दिल भर आया।

तभी सरिता ने उससे पूछा, “करेले को मलाई कोफ्ता बोलने से वो मलाई कोफ्ता बन जाएगा क्या?”

इतनी थकी हुई हालत में भी उसे हंसी आ गई। वो सोच में पड़ गया कि सड़कों के नाम बदलना ज्यादा जरूरी है कि आम नागरिक को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना?

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डिस्क्लेमर(अस्वीकरण): इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखिका के व्यक्तिगत है। लेख में व्यक्त किसी भी सूचना की सच्चाई,सटीकता,संपूर्णता और व्यावहारिकता के प्रति समयधारा उत्तरदायी नहीं है। इस लेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई है।लेख में प्रस्तुत कोई भी सूचना या तथ्य या व्यक्त विचारधारा समयधारा की नहीं है और समयधारा इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी या जवाबदेयी नहीं है।

 

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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