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केरल बाढ़: ये हसीन वादियाँ, ये खुला आसमान

बर्बादी के उस खौफनाक मंजर में हजारों लोग ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे।

केरल “कितनी सुंदर जगह है ना! जी करता है कि यहीं कहीं किसी पहाड़ी पर अपना आशियाना हो और हमारी ज़िंदगी स्वर्ग सी बन जाये।” 

खुशी से चहकती ऐसी आवाज़ें नललप्पा दिन भर सुनता रहता था। केरल की पेरियार नदी पर बना धनुषाकार इडुक्की बांध है ही इतना सुंदर।

समूचे एशिया मे यह अपने आप में अनूठा है। धनुष के आकार में बने होने के कारण इसे इडुक्की आर्क बांध कहा जाता है।

ये बांध कुरुवनमाला और कुरुथिमाला पहाड़ियों के बीच इतनी खूबसूरती से बनाया गया है कि ये जगह पूरे साल ही

सैलानियों के आकर्षण का केंद्र हुआ करती है। इसी पेरियार नदी के किनारे रहने वाला नललप्पा सैलानियों के लिए गाइड का काम करता था।

सितंबर-अक्टूबर आते-आते यहाँ सैलानियों की इतनी भीड़ लग जाती थी कि वह अपने पैसे गिनते-गिनते थक जाता था।

साधारण सा परिवार था उसका। नललप्पा, उसकी बूढ़ी माँ, उसकी बीवी ईश्वरी और एक छोटा बच्चा अजिंक्य।

गृहस्थी  के नाम पर कुछ ज़रूरत भर के सामान। नललप्पा इन सबसे ही बेहद संतुष्ट था।

सुबह आँख खुलते ही वो पहाड़ी पर बने अपने मकान के बाहर रखी पुरानी आरामकुर्सी पर आकर बैठ जाता था

और कुछ पलों तक प्रकृति के इस अप्रतिम सौन्दर्य को निहारता रहता था। रंगबिरंगे पंछियों की चहचहाहट और कलकल बहती नदी का मधुर स्वर उसे मंत्रमुग्ध सा कर देता था।

जब अंदर से उसका छोटा सा बच्चा अजिंक्य उसे “बाबा” कहकर पुकारता था, तब उसकी तंद्रा भंग होती थी।

नललप्पा नेकदिल और खुशमिजाज़ व्यक्ति था। उसके लिए ये छोटा सा घर ही उसकी दुनिया था।

इस बार नललप्पा ने अजिंक्य को स्कूल भेजने की भी व्यवस्था कर ली थी। स्कूल तो घर से काफी दूर था,

लेकिन उसके एक पुराने मित्र शिवा उस स्कूल मे अध्यापक थे, इसलिए शिवा के साथ बच्चे को स्कूल भेज दिया करता था।

बच्चा कुछ पढ़ लिख जाए, नललप्पा की सिर्फ यही इच्छा थी क्योंकि पूरी ज़िंदगी से संतुष्ट रहते हुए भी उसे अपने अनपढ़ रह जाने का मलाल हमेशा रहा था।

अपने बच्चे के माध्यम से अपने जीवन की ये कमीभी अब वो पूरा कर रहा था। वो बहुत खुश था।

अपने अध्यापक मित्र शिवा के प्रति भी वह आश्वस्त था। रोज़ साथ में आते-जाते नन्हा अजिंक्य भी शिवा से घुल मिल गया था।

कभी-कभी मौसम खराब होता, तो अजिंक्य को शिवा अपने घर पर ही रख लेता था। नललप्पा और उसकी पत्नी को कोई ऐतराज भी ना था।

उनके लिए तो उनके बच्चे को पढ़ाने वाला शिवा भगवान का ही रूप था। शिवा को भी कोई संतान ना थी,

इसलिए वे अजिंक्य को बड़े प्यार से अपने पास रखता। एक दिन मौसम खराब था, तो शिवा ने अजिंक्य को अपनेपास ही रख लिया।

रात भर बारिश हो रही थी।अगले दिन सुबह घर से निकलते ही उसके होश उड़ गए।

आस-पास की ज़्यादातर जगहें पानी मे डूबी हुई थीं और लगातार बारिश हो रही थी। आसपास के लोग अपने ज़रूरी सामानो को किसी तरह कंधों पर लाद कर पानी के बीच से किनारों की ओर पहुँचने की कोशिश कर रहे थे।

जीवनदाता जल विकराल रूप धारण किए हुए था। वो किसी तरह अपनी पत्नी और अजिंक्य को लेकर बाढ़ के पानी से बचने के लिए अनेकों लोगों के साथ उस ओर चल पड़ा, जहां उसे किनारा नज़र आ रहा था।

ना जाने कितने मकान बाढ़ के पानी मे पूरी तरह डूबे हुए थे। जिस जगह नललप्पा का घर था वो जगह तो पूरी तरह से तहस- नहस हो गई थी। ना जाने कितने लोग डूबकर और ना जाने कितने मलबे के ढेर मे दब गए थे।

शिवा ने किसी तरह शरणार्थियों के कैंप मे शरण ली। अगले दिन स्थिति और भी भयावह हो गई थी। बारिश लगातार होती ही जा रही थी।

लाखों लोग बेघर हो गए थे। शिवा को अपने मित्र नललप्पा की चिंता थी और बाढ़ के रौद्र रूप को देखते हुए, मन आशंकित भी था।

अजिंक्य को बुखार हो गया था। शिवा समझ नहीं पा रहा था कि नन्हें बच्चे को लेकर वो कहाँ जाए।

नललप्पा और उसके परिवार की कोई जानकारी उसे नहीं मिल पा रही थी। बिना माँ-बाप के इस छोटे से बच्चे की देखभाल वो कैसे और कब तक कर पाएगा? अभी तोउसे खुद का ही उजड़ा हुआ आशियाना फिर से बसाना है।

सेना और सरकार की तरफ से मदद और बचाव कार्य जारी था।बर्बादी के उस खौफनाक मंजर में हजारों लोग ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे।

वो हसीन वादियाँ न जाने कहाँ खो गयी थीं, अब तो चारों ओर बस तबाही के मंज़र ही नज़र आ रहे थे। 

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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