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मध्य प्रदेश चुनाव : क्या कांग्रेस पार्टी को खुद कांग्रेस ही हराती है

नई दिल्ली, 30 अक्टूबर : मौजूदा दौर की सियासत में अगर नज़र डाली जाए तो देश में सियासी सरगर्मियां बढ़ गयीं हैं |

दोनों ही प्रमुख पार्टियों नें अपनी कमर कस ली है,और किसी भी तरह सत्ता के शिखर पर पहुंचना चाहतीं हैं |

बीजेपी तो फिर भी काफी हद तक अपनी पैरेंट आर्गेनाइजेशन आरएसएस की तरह

एक निश्चित विचारधारा के साथ आगे बढ़ रही है | लेकिन कांग्रेस के अन्दर खासकर

दो प्रमुख राज्य मध्यप्रदेश और राजस्थान में सबकुछ सही नज़र नहीं आता |

बटी बटी नज़र आती है सरकार (कांग्रेस) –

मध्यप्रदेश के अन्दर तो एक कहावत भी चलती है|जो कि कांग्रेस की छोटी छोटी इकाइयों में भी प्रसिद्ध है कि

कांग्रेस को कोई और नहीं कांग्रेस खुद हराती है | ऐसी कहावत चले भी क्यूँ न ,

क्यूंकि अगर आप मध्यप्रदेश की सियासत को करीब से देखेंगें तो आपको कांग्रेस पार्टी एक नहीं कई धड़ों में बटी हुई नज़र आएगी |

विन्ध्य क्षेत्र का एक धड़ा जहाँ से कांग्रेस के पूर्व कद्दावर नेता अर्जुन सिंह के सुपुत्र और वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह आते हैं |

राघवगढ़ से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जो अपनी अलग ही धुन में चल रहें हैं |

कभी नर्मदा यात्रा के लिए निकल जाते हैं, तो कभी चुनावी सभा में भाषण देने ही नहीं आते |

ग्वालियर राज परिवार से आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपना एक अलग ही जनता का समावेश है |

जहाँ से बीच बीच में अबकी बार सिंधिया सरकार के नारे आते रहते हैं |

वहीँ सिंधिया भी अपने हाव भाव से मुख्यमंत्री वाली हवा को और तेज़ कर ही देतें हैं |

वहीँ अपनी केंद्र की राजनीति के लिए मशहूर , पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के ख़ास रह चुकें कमलनाथ को प्रदेश का ज़िम्मा देकर,

कांग्रेस नें खुद ही एक नए धड़े को जन्म दे दिया था |

साथ ही साथ मुख्यमंत्री के एक और दावेदार को जनता के सामने लाकर खड़ा कर दिया था |

वहीँ मध्यप्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के भी पार्टी से तल्खिये रिश्तें चल रहें हैं |

कहीं न कहीं अध्यक्ष पद से हटाने से उनकी भी पार्टी से नाराज़गी चल रही है |

जो कि चुनावी रैलियों में साफ़-साफ़ नज़र आ जाती है |

एक अनार सौ बिमार जैसी कहानी –

मुख्यमंत्री का पद तो एक ही है ,वो किसी एक को ही मिलेगा | पर उसके दावेदार पार्टी के अन्दर कई नज़र आते हैं |

कोई बड़ा नेता भले ही खुलकर इस बात को स्वीकार ना करे पर सबकी महत्वकांछा  तो इसी ओर इशारा करती है |

बकौल कांग्रेस, मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा ना करना कांग्रेस की चुनावी रणनीति हो सकती है |

पर कहीं ये रणनीति कांग्रेस पर ही भारी ना पड़ जाए |

क्यूंकि आप जनता को संशय में रखकर अपने भीतरी घात नहीं छुपा सकते |

लोकतंत्र में जनता अपने जनप्रतिनिधि के चेहरे पर ही वोट देती है ,

सत्ताधारी पार्टी की सत्ताविरोधी लहर भी ख़त्म हो सकती है ,

अगर आप इसी तरह अलग थलग संशय में दिखने वाले आर्गेनाइजेशन के तौर पर चुनाव लड़े |

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