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पितृपक्ष अमावस्या विशेष : क्या सचमुच आत्माएं भोजन करती हैं?

मेरे पिताजी, जिनके लिए मैं उनके कलेजे का टुकड़ा थी, आत्मा के रूप में मेरे भाइयों के हाथों से खाना खाने आएंगे लेकिन मेरे हाथों से नहीं?

Pitru Amavasya Shradh 2019endspecial

आदरणीय पिता जी,

             जब भी माँ भाई को लेकर पक्षपात करती थीं, आप फौरन मेरे पक्ष में खड़े हो जाते थे। आपने मुझे सिखाया कि बेटा और बेटी दोनों को ही समान आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार है।

जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मुझे दूसरे शहर भेजने की बात हुई थी तो माँ ने तो साफ मना कर दिया था, लेकिन आप ही तो थे, जिन्होंने मेरी ज़िद के आगे माँ को झुका लिया था।

ये आपका दिया हुआ आत्मबल ही था कि मैंने अपने होस्टल में लड़कियों के साथ मिलकर गलत बातों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया था।

अगर मुझे पता होता कि आप मेरे होस्टल जाने के बाद हम सबको छोड़कर इस दुनिया से चले जाएंगे, तो मैं कभी होस्टल में आकर रहने की ज़िद नहीं करती।

आज भी विश्वास नहीं होता कि कैसे पलक झपकते ही सब कुछ खत्म हो गया। डॉक्टर ने हार्ट अटैक का केस बताया था। मैं रोए जा रही थी। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, आप भला कैसे मुझे छोड़कर जा सकते थे। मेरे प्यारे पिताजी, उस दिन आपका चेहरा कितना शांत था। मेरे हर सवाल का प्यार से जवाब देने वाले मेरे पिताजी उस दिन कितने खामोश थे।

मैं आपसे लिपटकर फूटफूटकर रोए जा रही थी लेकिन मुझे कुछ रिश्तेदारों ने आपसे अलग कर दिया। कुछ रिश्तेदार आपको उठाकर ले चले। मैं पीछे पीछे भागने लगी, तो कुछ चाचियों, मामियों ने मुझे ज़बरदस्ती पकड़कर रोक लिया।

मैं आपको आखिरी बार जी भर कर देखना चाहती थी, आपसे लिपटकर खूब रोना चाहती थी लेकिन “लड़की थोड़े न शमशान घाट तक जाएगी।” बोलकर कई लोगों ने हाँ में हाँ मिलाते हुए मुझे ज़बरदस्ती पकड़कर रोक लिया। मैंने बहुत जोर लगाया, लेकिन फिर मुझे कुछ याद नहीं। काफी देर बाद मेरी आँखें खुलीं, कुछ लोग मुझे घेरे हुए थे।

शायद मैं बेहोश हो गई थी। मुझे धुंधला सा याद है, मुझे आखिरी समय आपके साथ जाने से रोकने वाले लोग भाई को सबसे आगे साथ में ले जा रहे थे। आपने तो कभी भाई और मुझमें कोई फर्क नहीं किया, फिर इस अंतिम समय में यह पक्षपात क्यों? मेरा दिल डूबने लगा था।

मुझे विश्वास हो चला था कि हर वक़्त मुझे बराबरी का दर्जा देने वाले पिताजी ने आज मेरा साथ छोड़ दिया। मुझे अब इस दुनिया के साथ जीना था, जहाँ लड़कियों को लड़कों के बराबर कहने की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन समझा कम ही जाता है।

कैसी विडंबना थी कि उस मृत्यु वाले घर में खाना पकाना बहुओं के लिए तो वर्जित था, क्योंकि उन्हें मृतक की आत्मा की शांति के लिए शोक मनाना था, लेकिन मैं अपने ही पिता की मृत्यु का शोक नहीं मना सकती थी, क्योंकि मैं तो बेटी थी।

“बेटी”-समाज के नियमानुसार “पराया धन”, जो किसी और कुल की बहू बनकर उस परिवार के मृतकों के लिए शोक मना सकती थी लेकिन खुद अपने ही पिता की मृत्यु का शोक नहीं मना सकती थी।

उस दिन से मैं फिर से खुद को दोयम मानकर जीने लगी थी। होस्टल की फीस भरी जा चुकी थी इसलिए मैं कुछ दिन बाद होस्टल वापस आ गई थी, लेकिन अब मैंने खुद के अधिकारों के लिए लड़ना छोड़ दिया था।

              कुछ माह बाद पितृपक्ष (Pitru Paksha)  थे। होस्टल में मेरे साथ पढ़ने वाली एक लड़की से मुझे पता चला कि पितृपक्ष के समय हमारे पूर्वज विभिन्न रूपों में हमारे आसपास आते हैं, इसलिए उनके लिए उनके परिवार वाले तरह तरह के पकवान बनाते हैं।

चाची से मुझे पता चला कि मेरे घर भी ऐसा किया जाएगा। मैं यह सोचकर कुछ उत्साहित थी कि क्या सचमुच अपने पिताजी के किसी रूप से मैं अभी भी मिल सकती हूं? मैं होस्टल से छुट्टी लेकर घर गई थी। मामियाँ, चाचियां तरह तरह के पकवान बना रही थीं। मेरा बनाया हुआ हलवा पिताजी को बहुत पसंद था।

मैं सोच रही थी कि आज तो मैं पिताजी के लिए उनकी पसंद का हलवा बनाऊंगी। तब तक कुछ धोती कुर्ता पहने हुए तिलकधारी पंडित घर में दाखिल हुए और मुझे रसोई में पैर रखने से भी मना कर दिया।

मेरे कारण पूछने पर उन्होंने बड़े प्यार से जवाब दिया कि बेटी, तू तो पराई अमानत है। तेरे पिताजी की आत्मा अब तेरे हाथ का भोजन नहीं ग्रहण कर सकती।

       मेरे पिताजी, जिनके लिए मैं उनके कलेजे का टुकड़ा थी, आत्मा के रूप में मेरे भाइयों के हाथों से खाना खाने आएंगे लेकिन मेरे हाथों से नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है?

   अचानक मुझे एहसास होने लगा कि मेरे हर सवाल का जवाब देने वाले मेरे पिताजी आप किसी अदृश्य रूप में मुझसे कह रहे हों कि क्यों बेटी, क्या तुमने बराबरी के हक की लड़ाई में हार मान ली?

मैं तो खुद इन रस्मो का विरोधी था, तुम क्यों इन रस्मों के जाल में फंसकर उदास हो गईं? मैं और किसी रूप में नहीं बल्कि तुम्हारे हृदय रूप में तुम्हारे पास हूँ।

जब भी तुम किसी भूखे को भोजन कराओगी, मेरी आत्मा को तृप्ति मिलेगी। जब भी तुम किसी जरूरतमंद की मदद करोगी, मुझे सुकून मिलेगा।

मैं होस्टल वापस लौट चली, क्योंकि अब मैं जान गई थी कि भोजन से तृप्ति शरीर को ही मिल सकती है, आत्मा को नहीं।

मैंने उसी दिन प्रतिज्ञा की कि अब मैं पितृपक्ष (Pitru Paksha) में किसी आत्मा के लिए तर्पण (Tarpan) नहीं करूंगी, बल्कि जीवित ज़रूरतमंद लोगों की मदद करके आपकी आत्मा को सुकून पहुँचाऊंगी।

आपकी लाडली बेटी

भावना गौड़

 

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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