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“ए भाई…. जरा देखके चलो, और… देखकर अनदेखा मत करो”

क्यों लोग इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि किसी मौत के मुंह में जाते हुए व्यक्ति की भी मदद नहीं करते?" रोहन खुद को संभाल नहीं पा रहा था

Protection of Good Samaritans laws– रोहन कुछ डरता हुआ सा कॉलेज में प्रवेश कर रहा था कि पीछे से श्रीकांत ने उसकी पीठ पर धौल जमाया,

“अरे रोहन, तूने भी यही कॉलेज जॉइन किया है?” पीछे श्रीकांत को देखकर रोहन को कुछ सुकून मिला। 

“श्रीकांत, अच्छा हुआ कि तू मिल गया, वरना नए कॉलेज में पहले दिन थोड़ा तो डर लगता ही है।” रोहन की बात पर श्रीकांत बेबाकी से हंस पड़ा, “डर किस बात का यार, मेरा बड़ा भाई इसी कॉलेज में पढ़ता है। मज़ाल है जो मुझे कोई तंग करे।” 

श्रीकांत की बात पर रोहन खामोश हो गया, तब तक उनकी क्लास नज़र आ गई और दोनों अंदर चले गए।

क्लास में ज्यादातर नए लोग ही थे। तब तक सीनियर्स का समूह अंदर आ गया और जूनियर्स की रैगिंग करने लगा।

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पिछले वर्षों रैगिंग की वजह से हुई कुछ दुर्घटनाओं के कारण कॉलेजों में रैगिंग पर रोक लगा दी गई थी लेकिन सामान्य मेलमिलाप तो किया ही जा सकता था।

सीनियर्स ने इसे रैगिंग न कहकर “जनरल इंट्रोडक्शन” कहा और जूनियर्स को बारी-बारी से खड़ा करके कोई गाना गाने या डांस करने को कहा। रोहन आगे ही बैठा था, इसलिए जल्दी ही उसका नम्बर आ गया।

“हूँ, तो आपका नाम रोहन कुमार है।” उसके नाम बताने पर एक सीनियर ने बड़ी गंभीरता से कहा। तब तक एक दूसरे सीनियर ने उसे कोई “पार्टी सांग” सुनाने को कहा।

रोहन खामोश हो कर खड़ा हो गया। श्रीकांत ने उसकी मदद करने की कोशिश की और उसकी ओर देखकर फुसफुसाया, “अभी तो पार्टी शुरू हुई है— गा दे।”, लेकिन रोहन ने कुछ भी नहीं बोला।

उसी समय अध्यापक क्लास में आ गए और सीनियर्स वापस चले गए।

कॉलेज के बाद साथ में वापस आते समय बस में बैठकर श्रीकांत ने रोहन से पूछा, “क्या बात है यार, इस कॉलेज में तू कुछ ज्यादा ही डरा हुआ है?”

“श्रीकांत, तुझे याद है ना, जब हम पुराने स्कूल में थे, और तू एक बार मेरे घर आया था।” रोहन ने पूछा।

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“हाँ, याद है, सबसे मिला था तेरे घर में, अंकल,आंटी, तेरे बड़े भैया।” श्रीकांत ने कहा तो रोहन की आंखें नम हो गईं।

“क्या हुआ रोहन?” श्रीकांत के आत्मीयता से बोलने पर रोहन किसी तरह खुद को संयत करते हुए बोला, “मेरे बड़े भैया की “रोड एक्सीडेंट” में मौत हो गई।”

“क्या?” हैरानी से श्रीकांत का मुंह खुला का खुला रह गया। अब उसे समझ आ गया था कि क्यों रोहन इतना उदास सा है।

“हिम्मत रखो रोहन” श्रीकांत बस इतना ही बोल पाया। लेकिन श्रीकांत ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था, इसलिए रोहन फफक पड़ा, “जानते हो श्रीकांत, मेरा भाई एक्सीडेंट के बाद 4 घंटे तक सड़क पर पड़ा रहा, लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया।

क्यों लोग इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि किसी मौत के मुंह में जाते हुए व्यक्ति की भी मदद नहीं करते?” रोहन खुद को संभाल नहीं पा रहा था।

श्रीकांत ने उसे समझाते हुए कहा,” सड़क हादसों में घायलों की मदद करने की कोशिश में कई बार सीधा  सादा आदमी भी पुलिस द्वारा परेशान किया जाता है। खुद मेरे चाचा एक बार ऐसे ही घायल की मदद करने के कारण पुलिस वालों की बार बार की पूछताछ से परेशान हो चुके हैं।” 

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बस में पीछे से आवाज आई, “कौन था वह पुलिसवाला, जिसने तुम्हारे चाचा को तंग किया था?”

दोनों ने पीछे मुड़कर देखा तो एक रौबदार व्यक्ति नज़र आया। “जी, कोई नहीं” कहकर श्रीकांत ने बात टालने की कोशिश की। तब उस व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं “आर. के. दत्ता” इस इलाके का जेलर रह चुका हूं और पिछले माह ही रिटायर हुआ हूँ। फिर उस व्यक्ति ने उन दोनों को समझाते हुए कहा,”बच्चों, क्या तुम्हें मालूम है कि 2016 में सड़क दुर्घटना में घायल लोगों की मदद करने से सम्बंधित कुछ नए कानून बनाए गए हैं?”

दोनों ने न में सर हिलाया, तो उन्होंने बताया कि नए कानून के अनुसार घायल की मदद करने वाले व्यक्ति को अपनी पहचान बताना जरूरी नहीं होगा और यदि वह स्वेच्छा से अपनी पहचान पुलिस को बताकर पुलिस की मदद करने की कोशिश करता है तो इस बात के लिए पुलिस उससे उस व्यक्ति की सुविधानुसार जगह पर ही पूछताछ कर सकती है और वो भी सिर्फ एक बार। 

उनकी बात बस में बैठे सभी लोग ध्यान से सुनने लगे। उन्होंने आगे कहा, “इसलिए एक ज़िम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाते हुए सड़क दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति की मदद ज़रूर करनी चाहिए।”

“जी, अंकल, मुझे कभी सड़क दुर्घटना में घायल कोई व्यक्ति मिला तो मैं उसकी मदद अवश्य करूंगा।” रोहन की दर्द भरी आवाज पर सभी ने सम्मिलित रूप से कहा, “हम अब कभी सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अनदेखा नहीं करेंगे और जल्दी से जल्दी उसकी मदद करेंगे।”

सभी लोगों की आत्मीयता पूर्ण आवाज सुनकर रोहन का मन कुछ हल्का हुआ। आर. के. दत्ता जी ने कहा, “शायद आप सभी के सहयोग से अब किसी रोहन के भाई को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके।”

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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