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समलैंगिक संबंधों को खुलेआम मान्यता देने में अभी लगेगा वक्त

आरएसएस वालों ने भी कहा कि इन संबंधों को तो मान्यता दे सकते हैं पर विवाह को नहीं...

homosexual relations and marriage- कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने समलैंगिकता को अपराध मानने वाली धारा 377 को 6 सितंबर को खत्म करते हुए चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा जी ने फैसला सुना दिया कि होमोसेक्सुअलिटी कोई अपराध नहीं है वरन् LGBT समुदाय को भी समान अधिकार है ।

सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से यौन प्राथमिकता बायोलोजिकल व नेचुरल है। दो व्यस्कों की आपसी सहमति से यह संबंध अब से कोई अपराध नहीं माना जाएगा, लेकिन बिना असहमति के यह संबंध अपराध ही बने रहेंगे। तब 10 साल कठोर सजा का प्रावधान है।

इसमें निजता की अहमियत है इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन है।अभी तक जो समुदाय समलैंगिकता के विरोध की वजह से डर के साये में जीने को विवश था मानो उनके सपनों को उड़ान मिल गयी है।उनमें खुशी की लहर फैली हुई है। विभिन्न सोशल मीडिया साइट्स पर आकर वे लोग अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं।

उनकी इस उंमग व खुशी को देखकर लगता है कि हौंसले बुलंद हो तो कभी हार नहीं होती।उसके बाद से ही देशभर से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कुछ पक्ष में कुछ विपक्ष में।

जो लोग पक्ष में हैं उनके हिसाब से इस तरह के यौन संबंधों में आपसी सहमति से कोई बुराई नहीं है। यह किसी मानसिक विकार का कारण नहीं हैं बल्कि नेचुरल है। अगर एक ही सेक्स के दो लोग एक-दूसरे से प्यार करते हैं तो इसमें क्या बुराई है? उनका मानना है इसकी वजह से जो लोग लिंग परिवर्तन करवाते हैं उसमें कमी आयेगी।

यौन संबंधों से फैलने वाली अनेक बड़ी बीमारियों व जनसंख्या की बढ़ोत्तरी में भी कुछ फर्क पड़ेगा। उन लोगों का मत है कि इन संबंधों से राजनैतिक,आर्थिक व सामाजिक रूप से कोई  दुष्प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि ये पूर्ण तौर से निजी हैं।

इसलिए उनको समान अधिकार मिलना चाहिए।प्राचीन भारत की संस्कृति में भी इन संबंधों को मान्यता थी खुजराहों में इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं।

          लेकिन जो लोग विरोध में खड़े हैं उनके अनुसार यह हमारी संस्कृति व परम्पराओं के खिलाफ हैं।उन लोगों में आक्रोश है कि हमारी संस्कृति ऐसे संबंधों को कभी मान्यता नहीं दे सकती। उनके हिसाब से यह नेचुरल नहीं है। यह एक मानसिक विकार है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर चर्चा कर इसका सामाधान करना चाहिए।

आरएसएस वालों ने भी कहा कि इन संबंधों को तो मान्यता दे सकते हैं पर विवाह को नहीं।विभिन्न राजनीतिक दलों की भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ रही, किंतु खुल कर इसका समर्थन करते लोग कम नजर आये।

इन सब बातों को मध्यनजर रखते हुए अब जहन में एक ही सवाल उठता है कि कोर्ट ने तो अपना फैसला सुना दिया मगर हमारा समाज खुले तौर से इन संबंधों को कभी स्वीकार भी कर पाएगा या नहीं?

इस तरह के संबंध अब भी चोरी छुपे ही तो नहीं चलेंगे? हमें अपने को मानसिक रूप से तैयार करने में हो सकता है कुछ वक्त लगे लेकिन बच्चों की खुशी व समाज में उनकी छवि खराब न हो इसके लिए मंजूरी देनी ही होगी।

क्योंकि अगर परिवार साथ हो तो बाहर के लोग उंगली नहीं उठा पाते। जहाँ तक समाज में चर्चा का सवाल है जब यह संबंध खुलेआम होने लगेंगे तो सबका मुँह अपने आप बंद हो जाएगा।

तब यह एक सामन्य बात होगी बशर्तें कि उनमें घिनौनापन न हो। आपसी सहमति हो और वे रिश्ते भी गरिमामयी हो।

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