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teachers day special: गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।

गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।

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हमारे देश में गुरू-शिष्य की परम्परा प्राचीन काल से है। उस वक्त बतौर शिक्षक गुरूकुल होते थे और ऋषि-मुनि होते थे।

राजा-महाराजा या फिर आम आदमी सब उन्हीं से शिक्षा ग्रहण करते थे।क्षत्रिय युद्ध में पारंगता भी उन्हीं से हासिल करते। बतौर फीस बस गुरू दक्षिणा होती थी।

लेकिन वक्त बहुत बदल गया है। शिक्षा का माध्यम व तौर तरीके आधुनिक होते जा रहे हैं।

आधारभूत शिक्षा के अलावा पाठ्यक्रम जरूरत के हिसाब से आये दिन बदलता जा रहा है।

शिक्षा को डिग्रियों में परिवर्तित कर दिया गया है।

जो भी हो भले ही कंप्यूटर का युग है। फिर भी शिक्षकों की महत्ता कभी कम नहीं हुई बल्कि बढ़ी है। क्यूंकि प्रैक्टिकल नॉलेज सिर्फ एक शिक्षक (teacher) से ही मिलती है।

हमारे देश में वे सदैव सम्मानीय रहे हैं। उन्हीं के सम्मान में हमेशा 5 सितंबर को संपूर्ण देश में ‘शिक्षक-दिवस’  (Teachers Day) मनाया जाता है।

इस दिन हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वे बेहद प्रिय शिक्षक रहे हैं।

अपने जीवन के 40 साल उन्होंने शिक्षण (education) को बेहद लग्नता से दिये। उन्हीं के सम्मान में 5 सितंबर 1962 को ‘शिक्षक-दिवस’ घोषित (Sep 5th Teachers Day) किया गया

तभी से यह प्रथा शिक्षकों के सम्मान में चालू है।

हर वर्ष महाविद्यालयों, विद्यालयों में इस दिन ‘शिक्षक-दिवस’  (Teachers Day) मनाया जाता है,

शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। छात्र व छात्राएं अपने अध्यापकों के सम्मान में रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन भी करते हैं।

          लेकिन अब मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव शेयर करना चाहूंगी। मेरी प्राथमिक शिक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक की शिक्षा सरकारी संस्थानों से रही।

उस वक्त स्कूलों में अध्यापक और स्टूडेंट्स का पढ़ाई को लेकर रवैया बेहद पॉजिटिव नहीं (teacher quality) था।

अध्यापकगण अपनी वार्तालापों में मस्त व बच्चे अपनी अलग खिचड़ी पका रहे होते थे।

सौ में से कोई दो-तीन बच्चे पढ़ाई के प्रति सजग रहते,बाकि कानाफूसी में और अध्यापकगण

चाय पकौड़े, नमकीन व बिस्कुटों को खाने में मस्त रहते थे।

बीच-बीच में डंडे की चोट से चुप कराते रहते थे। हालांकि कुछ अध्यापकगण शिक्षण को

लेकर भी सजग थे पर वो बाकी की नजर में खटकने लगते।

जब बारी परीक्षा की आती थी तो सभी के होश उड़े रहते थे।

अध्यापकगण को रिजल्ट तो स्टूडेंट्स को पैरेंट्स का भय सता जाता।

तब दोनों ओर से मारामारी मचती थी। बच्चों को सुपथ पर चलाने वाले उन्हें नकल करने पर मजबूर कर देते।

लेकिन अब शायद सरकारी शिक्षण संस्थानों में संभवत: सुधार हुआ है।

मैं यह सोचकर खुश थी। लेकिन मैं एक साल पहले अपनी एक दोस्त से मिली जो 11वीं व 12वीं को पढ़ाती है।

उसने बताया वही हाल है। बस उन्नीस-बीस का फर्क है। अभी हाल में श्रावण मास में तीज

फेस्टिवल की फोटो मेरी एक अध्यापिका ने व्हाट्सएप स्टेट्स पर डाली।

फोटो में दिख रहा था कि मेहंदी लगाने वाले को स्कूल में बुला रखा था। जहां पूरा लेडीज स्टाफ मौजूद था।

सबने मेहंदी लगवा रखी थी। मुझे यह देख बहुत धक्का लगा कि बच्चों के भविष्य के साथ यह लोग कैसा खिलवाड़ करते हैं?

        ट्यूशन व कोचिंग सेंटर चलाने के लालच में भी शिक्षकों की मानसिकता में गिरावट आई है।

बड़े पब्लिक स्कूलों के अध्यापकगण तक भी स्कूल के बाद अपना ट्यूशन लेने में व्यस्त रहते हैं।

एक तो अच्छी शिक्षा के चक्कर में अभिभावक मंहगे से मंहगे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं।

उसके बाद भी उन्हें बच्चों को ट्यूशन पर भेजने को मजबूर होना पढ़ता है। मध्यवर्गीय परिवार पिसकर रह जाते हैं।

आजकल स्कूलों में भी एक्स्ट्रा फीस ले एक्स्ट्रा क्लासेज लगाई जाती है।

स्कूल वालों को सिर्फ रिजल्ट की चिंता है। बच्चों के भविष्य की चिंता के लिए अभिभावक बैठे तो हैं, काफी हैं।

स्मार्ट क्लास का चलन बच्चों को लेखन क्षमता से दूर किये जा रहा है।वक्त को बचाने के चक्कर में कहीं न कहीं

हम उन्हें मेहनती बनने से रोक रहे हैं। मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट ने पहले से ही बच्चों को शारीरिक खेलों से दूर कर दिया है।

इसलिए विद्यालयों में जरूर इस बात पर गौर करना चाहिए। शिक्षण व्यवस्था में इस बात को लेकर

जरूर सुधार होने चाहिए। बच्चे के लालन-पालन में जितना अभिभावकों का योगदान होता है,

उससे कहीं ज्यादा शिक्षकों का उनका भविष्य सुरक्षित करने में होता है।

            एक वक्त था जब गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा में अंगूठा माँगा तो तुरंत

बगैर ना…नूकुर के एकलव्य ने अपना अँगूठा काट उनके हाथ पर रख दिया था

और एक वक्त आज है जब स्टूडेंटस उनकी कद्र करना ही भूल से गये हैं।

अभी थोड़े वक्त पहले आईपीयू (IPU) के एक कॉलेज में बच्चों ने शरारत की और अपनी

एक प्रोफेसर को कमरे में अकेली बैठी देख चुपके से बाहर से कुंडी लगा दी।

बाद में शोर मचाकर उन्होंने दरवाजा खुलवाया। हालांकि सीसीटीवी कैमरा से बच्चे पकड़े गये,

पर भविष्य की सोच उन्हें सस्पैंड नहीं किया गया।

ऐसी अनेक शर्मनाक घटनाएं हर शिक्षण संस्थाओं में देखने को मिल जाती है।

यह सब घटनाएं एक शिक्षक व छात्र के बीच जो मर्यादित भावनात्मक अटैचमेंट है

उसको ठेस पहुंचाती है और इसका असर शिक्षण गतिविधियों पर होता है।

रैगिंग के दौरान भी स्टूडेंट्स शिक्षकों के कायदे कानून की अवहेलना कर जाते हैं।

यह सब आधुनिक परिवेश व गलत संस्कारों का नतीजा है।

कबीरदासजी का यह दोहा जो सबने स्कूल के वक्त जरूर पढ़ा  होगा…..

“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥”

उन्हीं का एक और दोहा…….

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष। गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।

हमारी संस्कृति में गुरु का दर्जा भगवान से ऊँचा है।वे हमें हर अंधकार से रोशनी की ओर ले जाते हैं।

असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं।वे ही सिर्फ़ हमारी मुक्ति का एकमात्र रास्ता हैं।

 “सभी शिक्षकगण को शिक्षक दिवस की ढ़ेरों शुभकामनाएं “

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