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इलाहाबाद बना प्रयागराज…पर क्या बदले हालात? बदले बदले से सरकार नजर आते है

गरीबी और बेरोजगारी की समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है, लेकिन पिछले दिनों जगहों की मूलभूत आवश्यकताओं की ओर ध्यान न देते हुए नाम बदलने की आवश्यकता को सर्वोपरि समझा जा रहा है

Name changing politics- जब देश अनेक घोटालों और आतंकवाद से ग्रस्त था, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी की आग में जनता झुलस रही थी, तो नई सरकार के नए और लुभावने  वादों से जनता को कुछ वर्षों पहले नई उम्मीदें जगी थीं।

  नई सरकार ने आते ही नोटबन्दी का ऐतिहासिक फैसला करके जनता को भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाने का आश्वासन दिया था।  सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश में आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम कसने को लेकर भी जनता कुछ आश्वस्त हुई थी,  लेकिन पिछले दिनों नाम बदलने की राजनीति देखकर जनता असमंजस में है।

     देश में पहले से ही अनेक प्रकार की समस्याएं विकराल रूप में खड़ी हैं। अनेक बीमारियों डेंगू,मलेरिया और चिकनगुनिया का प्रकोप पहले से ही फैला हुआ है, अब ईबोला, स्वाइन फ्लू, निपाह वायरस जैसी नई नई बीमारियों से भी आम जनता परेशान है।

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आज भी देश में अनेक लोग पोलियो, एड्स, कैंसर  जैसी  बीमारियों से लड़ रहे हैं। बिजली, पानी , सड़कों पर गड्ढे जैसी अनेक समस्याओं से आम नागरिक त्रस्त है। बारिश में जलभराव और गंदगी के ढेर तो जनता के लिए आम बात हो गई है।

बढ़ते प्रदूषण के कारण हृदयाघात, फेफड़ों की बीमारी और श्वाश रोगों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है, लेकिन इन सब बातों को नजरअंदाज करते हुए पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक शहरों और सड़कों के नाम बदलने का दौर चल रहा है। हालिया वर्षों में देश की अनेक बड़ी जगहों के नए नामकरण हो चुके हैं।

बनारस का नाम वाराणसी, गुड़गांव का नाम गुरुग्राम, इलाहाबाद का नाम प्रयागराज, मुगलसराय का नाम बदलकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय किया जा चुका है। इनके अलावा और भी अनेक नाम हैं जिन्हें सरकारी तौर पर बदलने का प्रयास किया जा रहा है।

शहरों के साथ साथ अनेक मार्ग, और मोहल्ले भी अब परिवर्तित नाम से जाने जाते हैं। सरकार का कहना है कि कुछ प्रचिलित नाम क्रूर शासकों के नाम पर होने के कारण उनमें बदलाव ज़रूरी है।

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अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप रोड और औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम रोड इसी तर्ज पर किया गया है। अनेक प्रचिलित जगहों को अब नया नाम देने का जुनून सा चल पड़ा है। देश के विकास के नाम पर जनता  का पैसा जगहों के नाम बदलने पर अंधाधुंध खर्च किया जा रहा है।

Why government focus on name changing politics rather than infrastructure like Allahabad turns Prayagraj
औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम रख दिया गया

एक तरफ बढ़ती आबादी के कारण लोगों को रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं, उस पर आरक्षण के कारण प्रतिभा नहीं बल्कि जाति और धर्म को प्रधानता दी जा रही है। योग्य व्यक्तियों की प्रतिभा कुंठित होती जा रही है।

गरीबी और बेरोजगारी की समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है, लेकिन पिछले दिनों जगहों की मूलभूत आवश्यकताओं की ओर ध्यान न देते हुए नाम बदलने की आवश्यकता को सर्वोपरि समझा जा रहा है।

अरसे से औरंगजेब रोड पर रहने वाले लोगों के लिए औरंगजेब रोड किसी क्रूर शासक की रोड नहीं बल्कि किसी के घर परिवार की पहचान है। ऐसे में जगह का नाम बदलना लोगों के लिए बड़ा ही असुविधाजनक हो गया है।

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इलाहाबाद में अरसे से रह रहे लोग नाम बदले जाने से खुश नहीं हैं, उनके लिए यह उनकी पहचान बदल जाने जैसा ही है। आम जनता को प्रयागराज जैसे ऐतिहासिक नाम से कुछ खास लेना देना नहीं है।

Why government focus on name changing politics rather than infrastructure like Allahabad turns Prayagraj
इलाहाबाद का नाम अब प्रयागराज हो गया है

आम नागरिक अनेक समस्याओं से घिरा रहता है,नाम बदलने से मूल समस्याओं पर तो कोई असर पड़ता नहीं, बल्कि बदले हुए नाम बड़ी दुविधा को जन्म देते हैं। आजकल की पीढ़ी तो इंटरनेट के माध्यम से ऐसे बदलाव की जानकारी रख भी सकती है लेकिन जो इलाहाबाद को ही अपनी जन्मभूमि मानकर उम्र के कई पड़ाव पार कर चुके हैं, उनके लिए ये बदला हुआ नाम व्यर्थ के दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि जो समस्याएं वो अपने आसपास देखते आए हैं, उनके समाधान की कुछ खास कोशिशें उन्हें नज़र नहीं आईं।

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यदि किसी का सिर दर्द हो, और उससे बोला जाए कि सिर को दांत बोलकर बात करो, तो सिर को दांत बोलने के चक्कर में वो असली बात भूल जाएगा। यहाँ समझने वाली बात यह है कि असली मुद्दा दर्द का है, सर को दांत बोलकर विषय से भटकाने की कोशिश की जा रही है।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, अशिक्षा की समस्या, महिलाओं की सुरक्षा की समस्या, पीने के स्वच्छ पानी की समस्या, बढ़ते आतंकवाद, नक्सलवाद की समस्या… गिनने बैठें तो ऐसी अनेक समस्याएं सुरसा के मुंह जैसे विशाल रूप में उपस्थित हैं, जिनका निराकरण जगहों के नाम बदले जाने से ज्यादा जरूरी है। क्या विकास के नाम पर जनता सर को दांत कहने के ही चक्रव्यूह में उलझी रहे?

आम नागरिक ने तो सरकार से बहुत क्रांतिकारी उन्नति की उम्मीद की थी लेकिन वो बेचारा नाम बदलने की राजनीति में फंसकर हैरान होकर इसी सोच में पड़ा है कि क्यों बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं।    

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Bhavana Gaur

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है और लेखन में गहन रुचि रखती है।

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