Home slider ब्लॉग्स विचारों का झरोखा

फर्क है प्यार और विश्वास में

एक ने मजबूती से हाथ थामा है और दूसरे की पकड़ ढीली है तो समझ लें विश्वास की डोर ढ़ीली है(Representational image)

हमेशा कहा जाता है कि जहां प्यार है वहां विश्वास है और जहां विश्वास है, उसमें प्यार निहित ही है,लेकिन 35 वर्षीय सुधा के संबंध को देखने के बाद लगता है कि जरूरी नहीं जहां प्यार हो, वहां विश्वास भी हो। सुधा एक मल्टी नेशनल कंपनी में बतौर पीआर मैनेजर काम करती है और अमित जोकि पेशे से एडवोकेट है, सुधा से बेइंतहा प्यार करता है। दोनों की शादी को 5 साल पूरे हो चुके है,लेकिन सुधा को आज भी इस बात की टीस है कि अमित उससे प्यार तो बेइंतहा करता है लेकिन विश्वास नहीं करता। जब उसने यह बात मुझे बताई तो थोड़ा सा अटपटा लगा क्योंकि सभी की तरह मुझे भी इस बात पर यकीन था कि प्यार तभी होता है जब विश्वास हो और बिना विश्वास प्यार कैसा। इसलिए मैनें फौरन सुधा से पूछा- क्या अमित तुमपर शक करता है? सुधा ने कहा- नहीं! वह मेरे चरित्र पर कभी सपने में भी शक नहीं कर सकते।

फिर मैनें पूछा- अरे फिर क्यों कह रही हो कि वह तुमपर विश्वास नहीं करता। सुधा की आंखों में थोड़ी नमी आ गई और वह बोली- अमित बहुत साफ दिल के इंसान है, मुझसे बेइंतहा प्यार करते है,लेकिन दुख सिर्फ इतना है कि जब मैं उन्हें कुछ कहती हूं तो वह सुनते है लेकिन करते सिर्फ अपने मन की है। मैनें पूछा- तो क्या वह हमेशा अपनी मनमानी करते है? सुधा बोली- नहीं! उन्हें तो शायद इस बात का एहसास तक नहीं कि वह जाने-अनजाने हमेशा मेरी बातों को, मेरे विचारों को इग्नोर कर देते है। तब मैने तपाक से बोला- अरे तो गलती तुम्हारी है। तुम उन्हें एहसास करवाओं। खुलकर इस बारे में बात करो। सुधा ने एक फीकी मुस्कान होठों पर लाकर कहा- तुम्हें क्या लगता है कि मैनें उनसे इस बारे में बात नहीं की होगी? मैनें बहुत बार समझाया कि जब हम किसी के साथ रिलेशन में होते है। उससे प्यार करते है तो उस रिश्ते से जुड़ी हर बात में दोनों का ओपिनियन बहुत जरूरी होता है। अगर दोनों में से किसी एक को भी बार-बार यह एहसास हो रहा है कि रिश्ता बराबरी का नहीं है तो जरूर उस रिश्ते में कुछ कमी आ रही है,जिसे दूर करना जरूरी है। मैनें पूछा मुझे खुलकर बताओं क्योंकि एक ओर तुम कह रही हो अमित बेइंतहा प्यार करता है, तुम्हारे ऊपर शक नहीं करता और दूसरी ओर बोल रही हो कि विश्वास नहीं करता।ये विरोधाभास क्यों और कैसे?

तब सुधा ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा- अमित और मेरी शादी को आज 5 साल हो चुके है। मैनें अमित को इसलिए पसंद किया था क्योंकि उसने उस वक्त मेरा विश्वास किया और साथ दिया था जब पूरी दुनिया मेरे खिलाफ थी,लेकिन फिर समय के साथ शादी से पहले भी जब हमारा रिश्ता परवान चढ़ता गया, तो मैने महसूस किया कि अमित मुझसे हर बात में सलाह-मशवरा तो लेते है,लेकिन करते सिर्फ अपने मन की है। मैनें उनसे इस बारे में बात की तो वह बोले- ऐसा कुछ नहीं है। तुम बस जरूरत से ज्यादा सोचती हो वर्ना मैं तुम्हे और तुम्हारी बातों को सबसे ज्यादा महत्व देता हूं। तब मैं बातों को याद दिलाती तो हमारे बीच बहस हो जाती, इसलिए रिश्ते को कड़वाहट से दूर रखने के लिए मैनें इन बातों को इग्नोर करना शुरू कर दिया,लेकिन अब जबकि शादी को 5 साल हो चुके है। तब भी हर बात में मैं यही अनुभव कर रही हूं कि अमित और मेरे बीच अगर ये रिश्ता और प्यार टीका है तो केवल मेरे अटूट विश्वास के कारण और मेरे लगातार समझौता करते रहने के कारण।

बहुत से ऐसे मौके आएं है जहां अमित ने हम दोनों की ओर से निर्णय लिए, तब मुझे बुरा तो लगा लेकिन सोचा कि वह कभी गलत तो निर्णय लेंगे नहीं और फिर नतीजा ये मिला कि उनके वह निर्णय गलत भी  साबित हुए। मैनें तब भी अमित को कभी नीचा नहीं दिखाया क्योंकि प्यार का रिश्ता बराबरी का होता है। बस उन्हें समझाया कि काश, आप मेरी सुन लेते।तब उन्होंने भी स्वीकार किया कि हां, तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी,लेकिन उस गलती को मानने से क्या फायदा जिसका एहसास तक आपको नही हो। बहुत बार हम कुछ ऐसा करते जाते है जिसके लिए हमें खुद एहसास तक नहीं होता और हमारा पार्टनर अगर हमें एहसास करवाता है तो हमारा अहंकार उसे कभी स्वीकार नहीं करता और  जहां अहंकार हो वहां प्यार हो ही नहीं सकता और अगर हुआ भी तो कुछ देर के लिए टिकता है।

सुधा ने कहा- हम दोनों जब भी हमारी फैमिली, रिश्तेदारों या फिर हमारे प्रोफेशनल वर्ल्ड के लिए साथ मिलकर कोई निर्णय लेते तो अमित हमेशा, हर बात मुझसे डिस्कस तो करते,लेकिन अंतत: हर बार, हर जगह चलाते केवल अपनी, वही करते जो उन्हें ठीक लगता और मेरे पूछने पर मुझे कारण ये देते की मौके की नजाकत और वक्त की जरूरत को समझकर उन्हें जो ठीक लगा वह उन्होंने किया। तब मेरा उनसे एक ही सवाल होता कि अगर आपको लगता है कि आप सही निर्णय लेते हो तो मुझसे पूछते भी क्यों हो क्योंकि मुझे दुख ये नहीं होता कि निर्णय आपने लिए। दुख ये होता है कि आपकी पत्नी होने के कारण, एक पढ़ी-लिखी महिला होने के कारण अगर मैं अपनी राय आपको दे रही हूं और वह भी आपके पूछने पर,तो आप उस राय को मानते क्यों नहीं और अगर आपको इतना विश्वास है कि आप सही निर्णय लेते हो,तो मुझसे पूछते ही क्यों हो क्योंकि तब ज्यादा दुख होता है कि आप हर बार अपने पार्टनर से पूछो, लेकिन करो केवल वही जो आपको ठीक लगता है तो आप ही बताओं कहां है विश्वास ? और जहां विश्वास नहीं वहां प्यार कितने दिन टिक सकता है।जिस रिश्ते में बराबरी नहीं, आपकी बातों, आपकी राय का कोई महत्व ही नहीं, क्या सच में वहां प्यार है? सुधा की बातों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया।

ये सच है कि बहुत से लोग एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते है,लेकिन फिर भी वह जिंदगी साथ नहीं गुजार पाते या फिर समझौते का रिश्ता जीते है,जबकि ऐसा भी नहीं कि उनके बीच कोई तीसरा आ गया हो। सुधा जैसे लोगों से बात करने से एक बात समझ आ गई कि जरूरी नहीं जहां प्यार है,वहां विश्वास है। अमित सुधा से बेइंतहा प्यार करने के बावजूद भी ये नहीं समझ पाया कि सुधा उसका प्यार, उसकी लाइफ-पार्टनर है, इस दुनिया में उससे ज्यादा सही-गलत के बारे में अमित को कोई नहीं बता सकता,इसलिए अगर अमित को सुधा कोई राय देती है या अमित के पूछने पर कोई रास्ता सुझाती है तो वह उसपर चले। कम से कम जिस तरह उसके गलत निर्णयों को भी उसकी पत्नी ने सिरमाथे पर लिया, ठीक उसी तरह वह उसकी बातों को केवल सुनकर अनसुना न करें बल्कि अमल में लाएं। विश्वास ऐसे मौकों पर ही दिखता है।जब आपका पार्टनर आपको कुछ कहें तो आप केवल उसकी बातों को सुने नहीं बल्कि उन्हें अमल में भी लाएं। अच्छा हो या बुरा, प्यार और रिश्ता केवल विश्वास की डोर पर ही टिकता है और अगर आपको लगता है कि आप प्यार करते है इसलिए विश्वास भी करते है, तो इसका एहसास आपके पार्टनर को खुद-ब-खुद हो जाएगा। इसके लिए उन्हें एहसास दिलाएं कि आपका रिश्ता बराबरी का है। आप केवल उनकी बातों को सुनकर हां मे हां नहीं मिलाएं, बल्कि उसके अनुसार चलकर उन्हें विश्वास दिलाएं कि आपको उनकी बातों, उनकी सलाहों और उनकी दूरदर्शिता पर पूरा विश्वास है।प्यार में विश्वास और बराबरी बहुत जरूरी है। आप उनपर विश्वास करते है, उनकी समझ पर विश्वास करते है, ये बात आपके पार्टनर को केवल आपकी बातों में नहीं बल्कि व्यवहार में दिखनी चाहिए। जब उन्होंने हर बार आपके लिए गए निर्णयों को चाहे वह गलत या सही साबित हुए स्वीकार किया तो आपको भी अपने पार्टनर की राय, उनकी समझ को तवज्जों देनी चाहिए।

अगर साथ होकर भी, सब डिस्कस करने के बाद भी एक रिश्ते में केवल किसी एक की ही चलती है, तो वह रिश्ता महज कुछ दिन ही चल पाता है।इस बात को जितना जल्दी समझ लेंगे, आपके दम तोड़ते रिश्ते में वापिस ताजगी आ जाएगी क्योंकि प्यार और विश्वास में फर्क होता है और जहां विश्वास और प्यार साथ नहीं,वहां रिश्ता केवल नाम का रहता है और समझौते की बलि चढ़ जाता है।

रीना आर्य

About the author

समय धारा

Add Comment

Click here to post a comment