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कोहिनूर हीरा रहस्मय जटिल इतिहास का प्रतिक, सच जो कोई नहीं जान पाया

नई दिल्ली, 12 दिसम्बर:  इतिहासकार और लेखक विलियम डैलरिंपल का कहना है कि कोहिनूर हीरा ब्रिटिश शासक को उपहास्वरूप नहीं दिया गया था, बल्कि वे जबरन इसे भारत से ले गए थे।

डैलरिंपल ने पत्रकार अनिता आनंद के साथ मिलकर इस बहुमूल्य चर्चित रत्न पर एक नई किताब लिखी है। इस हीरे का एक जटिल इतिहास है और यह सदियों से रहस्य का विषय व पहेली बना हुआ है।

डैलरिंपल ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि ‘टावर ऑफ लंदन’ में रखा गया सर्वाधिक प्रसिद्ध हीरा ‘औपनिवेशिक काल की लूटों का प्रतीक है।’

साल 1989 से भारत में आते-जाते रहने वाले स्कॉटिश इतिहासकार कहते हैं कि उन्होंने ‘इस प्रशंसित शाही ट्रॉफी के इतिहास पर लगी धुंध को सफलतापूर्वक हटाकर अफसानों से सच्चाई को निकाल लिया है।’

उन्होंने कहा, “इस रत्न को ले जाने के बारे में कोई संदेह नहीं रह गया है। यह कहना बिल्कुल बकवास है कि महाराजा रंजीत सिंह ने इसे उपहार स्वरूप दिया था।”

‘कोहिनूर: द स्टोरी आफ वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड’ की सह लेखिका एवं ब्रिटिश रेडियो व टीवी पत्रकार अनिता आनंद ने भी डैलरिंपल से सहमति जताई। जगरनॉट प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है।

उन्होंने कहा, “हम इस बकवास पर आपत्ति जताते हैं कि लोग समझते हैं कि महाराजा रंजीत सिंह ने इसे उपहार में दिया था। इसे उपहार में नहीं दिया गया था। महाराजा इस हीरे को ले जाए जाने से पहले ही मर चुके थे।”

अनिता ने कहा कि दरअसल वह महाराजा रंजीत सिंह के दस वर्षीय पुत्र दलीप सिंह थे जिनके कब्जे से 29 मार्च, 1849 को कोहिनूर छीना गया था।

उन्होंने कहा, “वह एक डरे हुए बालक थे। वह ब्रिटिश दबाव के आगे झुक गए।”

उन्होंने इस टिप्पणी को पुस्तक में नए ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के साथ स्थापित किया है और यहा काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस साल के शुरू में भारत ने इस रत्न पर फिर से दावा किया है। इस दावे के बाद कोहिनूर ने मीडिया में फिर से खूब सुर्खियां बटोरी थीं।

हालांकि, सरकार ने गत 16 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि महाराजा रंजीत सिंह ने हीरा पूरी आजादी के साथ अंग्रेजों को दिया था। ब्रिटिश शासकों ने न तो इसे चुराया था और न ही वे इसे जबरन छीन कर ले गए थे।

दिल्ली के बाहरी इलाके में महरौली स्थित एक फार्म हाउस में डैलरिंपल ने आईएएनएस से कहा, “यह एक गैर ऐतिहासिक बयान है, आश्चर्यजनक ढंग से गैर ऐतिहासिक।”

पुस्तक ने एक गरमागरम बहस को फिर से हवा दी है कि क्या हीरा अंतत: भारत वापस लाया भी जाना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और यहां तक की तालिबान भी इसे अपना बता रहे हैं।

कोहिनूर मुगलों, ईरानियों, अफगानियों और सिखों के हाथों से गुजरा। इसका उद्गम आजतक एक रहस्य बना हुआ है।

अनिता आनंद कहती हैं कि भारत से जिस तरह कोहिनूर ले जाया गया, उसे लेकर ब्रिटिश असहज महसूस कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “इस तरह की भावना थी कि यह अनैतिक है। उन्हें अपराध बोध हुआ। महारानी को इतना दोषपूर्ण लगा कि उन्होंने इसे नहीं पहना।”

लेकिन, हीरे को अब कहां जाना चाहिए? क्योंकि, इसे लंदन में रखने पर ब्रिटिश सरकार अड़ी हुई है और भारत इस बात पर कायम है कि वह कोहिनूर को वापस लाने की कोशिश करेगा।

डैलरिंपल ने कहा, “हमने कोई पक्ष नहीं लिया है और न ही ले रहे हैं। हम बहुपरतीय हीरे की तरह बहुपरतीय कहानी कहने की कोशिश कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “आप जानते हैं कि भारतीय इसे वापस लाना चाहते हैं और ब्रिटेन वापस लौटाना नहीं चाहता है। ईरानी, अफगानिस्तानी और यह सच है कि तालिबान भी इसे वापस लाना चाहते हैं। सिख वापस लाना चाहते हैं और स्वर्ण मंदिर में रखना चाहते हैं।”

डैलरिंपल ने कहा कि उनके पास एक सुझाव है। वह यह कि वाघा सीमा पर भारत और पाकिस्तान मिलकर संग्रहालय बनाएं (जिसमें इस हीरे को रखा जाए) और जिससे अंतत: दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हो सके।

–आईएएनएस

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समय धारा

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