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शायरी : साहिल पे बैठे यूं सोचता हूँ आज कौन ज्यादा मजबूर है..?

ये किनारा जो चल नही सकता, या वो लहर जो ठहर नहीं सकती...!!

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(a) साहिल पे बैठे
यूं सोचता हूँ आज
कौन ज्यादा मजबूर है..?
ये किनारा
जो चल नही सकता,
या वो लहर
जो ठहर नहीं सकती…!!

(b) सहम सी गयी ख्वाहीशेँ….

जरूरतों ने शायद उनसे….
ऊँची आवाज मे बात की होगी।

(c) दो हिस्सों में बंटी हुई है,
यह उम्र सारी।

‘अभी’ उम्र नहीं तुम्हारी,
‘अब’ उम्र नहीं तुम्हारी।

(d) बड़े..चुपके से भेजा था 

उन्होंने गुलाब हमारे लिए 

कमबख्त खुशबू ने 

सारे शहर में 

हंगामा मचा दिया l 

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(इनपुट सोशल मीडिया से )

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