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रिश्तों की शायरी : न सुलझे जो कभी हमसे तो, तुम सुलझा लेना

(1) हिसाब” बराबर करने का…बड़ा “शौक” रखते हो न…”तुम”…..
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देखो मैंने “याद” किया है तुम्हे…लो अब “तुम्हारी” बारी…….

(2) न सुलझे जो कभी हमसे तो, तुम सुलझा लेना।

तुम्हारे हाथ में भी रिश्ते का एक सिरा होगा ।।

रिश्तों को निभानें में…

भावनाएँ होनी, चाहिए विवशता नहीं….

“मंज़र” धुंधला हो सकता है, “मंज़िल” नहीं…

“दौर” बुरा हो सकता है, “ज़िंदगी” नहीं…

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