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आज भी यहां पांच दिन बिना कपड़ों के रहती है महिलाएं, देखें तस्वीरें

नई दिल्ली, 23 जुलाई : हम सभी जानते है की हमारा देश भारत संस्कृति और परम्पराओं के मामले में सर्वोपरि है l इसीलिए भारत को संस्कृति और परम्परा की जड़ भी कहा जाता है l जहां आज हमारा देश दिन-प्रतिदिन तरक्की कर रहा है और एक नया मुक़ाम हासिल करने में लगा हुआ हैl वहीं दुनियाभर में ना जाने कितने ऐसे रीति-रिवाज़ और परम्पराएं है,जो अपने आप में ही रोचक और बेमिसाल है ।

भारत में भी इस तरह की संस्कृतियां और रिवाज़ आज भी घर किए हुए है,  जिनकी मिसालें दुनियाभर में आज भी दी जाती है l जहां एक तरफ हम भारत को खुशहाल देश बनाने में लगे हुए है तो वहीं दूसरी ओर, कुछ ऐसे लोग भी है, जो परम्पराओं के नाम पर ढ़कोसला कर रहे है। वे आज भी पिछड़े ही रहना चाहते है l वह अपना पूरा जीवन अन्धविश्वास में ही व्यतीत करना चाहते है l वैसे तो यहां के हर स्थान से कोई न कोई ऐसी अनोखी परम्परा जुड़ी हुई है, इसलिए आज हम आपको ऐसी ही एक परम्परा से अवगत कराना चाहते है , जिसके बारे में सुनने मात्र से ही आपके होश उड़ जायेगें ।

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जी हां! आज हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की। वैसे तो हिमाचल की प्राकृतिक सुन्दरता के दीदार के लिए न जाने लोग कितनी दूर-दूर से आते है, लेकिन शायद ही आपको यह बात पता हो कि इस सुन्दरता के पीछे कई ऐसे राज़ और कई ऐसी परम्पराएं दफन है,जिनकी आपको खबर तक नहीं है l यह प्रदेश सुन्दरता का तो धनी है ही, परंतु अन्धविश्वास का भी आदी है l हिमाचल प्रदेश की मणिकर्ण घाटी में स्थित एक गांव है, जिसे ‘पीणी’ के नाम से जाना जाता है । इस गांव की अपनी ही एक अलग अजीबोग़रीब परम्परा है l सदियों से चली आ रही इस परम्परा में खासकर विवाहित महिलाओं को बहुत कुछ झेलना पड़ता है उन्हें साल के 5 दिन बिना कपड़ों के रहना पड़ता है l इस अवस्था के दौरान महिलाओं को कई और कड़े नियमों का पालन भी करता पड़ता है ।

छायाकृति (साभार-गूगल)
छायाकृति (साभार-गूगल)

वे किसी से भी कोई बातचीत नहीं कर सकती। यहां तक की अपने पति से भी नहीं। उनको ऐसा करने की सख्त मनाई होती है l शादीशुदा जोड़ों को साल के 5 दिन अनजानों की तरह अपना जीवन गुजारना पड़ता है l महिलाएं इन दिनों अपना जीवन एकांत यानि अकेले रह कर बिताती है और तो और पुरूषों को भी इन 5 दिनों तक मदिरा (शराब) तक को हाथ लगाने की सख्त मनाई होती है l लोगों का मानना है कि यदि कोई इस परम्परा का उल्लंघन करता है यानि इसे निभाने से मना करता है, तो उसके कारण पूरे गांव को भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है ।

छायाकृति (साभार-गूगल)
छायाकृति (साभार-गूगल)

गौरतलब है कि यदि अगर कोई स्त्री इस परम्परा को करने से मना करती है, तो उसके परिवार के साथ जरुर कोई न कोई अनर्थ होता है l इसी डर से कोई महिला इस परम्परा को करने से मना नहीं करती l इस गांव की मान्यता के अनुसार इस परम्परा को भाद्रव सक्रांति यानि (सावन) के महीने में करना अनिवार्य है,क्योंकि यहां के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि वह सावन का ही महीना था, जब उनका गांव पीणी राक्षसों की चपेट में था l राक्षसों ने पूरे गांव में हाहाकार मचा रखा था। तब पीणी वासियों की सहायता के लिए स्वयं लहुआ गुणों के देवता उनकी मदद के लिए धरती पर आएं थे l जिन्होंने पीणी वासियों को राक्षसों के चंगुल से बाहर निकाला और उनको सुरक्षित किया था l इसीलिए इस सावन के महीने को ‘काला महीना’ भी कहा जाता है और तो और लोगों का यह भी मानना है कि इस सावन के महीने में देवताओं का आगमन होता है और वह ऐसे में यदि विवाहित जोड़ों को आपस में बातचीत या हंसी मज़ाक करते देख लेंगे तो वह श्राप दे देंगे l जिसके कारण गांव को फिर से किसी बड़ी परेशानी से गुजरना पड़ सकता है l इसी वजह से शादीशुदा जोड़े आज भी इस परम्परा को निभाते है l

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