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740 मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटियों ने 16 वर्षो में दी सिर्फ 177 पीएचडी डिग्रियां

नई दिल्ली, 30 नवंबर:   भारत के 740 मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में से मात्र 66 विश्वविद्यालयों ने पिछले 16 वर्षो में उद्यमिता (एंटरप्रिन्योरशिप) में पीएचडी की डिग्री दी। जहां सामाजिक विज्ञान (सोशल साइंस) में पिछले 16 वर्षो में 20,271 डॉक्टोरल स्टडीज किए गए, वही उद्यमिता (एंटरप्रिन्योरशिप) में केवल 177 पीएचडी डिग्रियां दी गई। महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों ने पिछले 16 वर्षो में उद्यमिता में 25 पीएचडी डिग्रियां दी, जिसके बाद क्रमश: 18, 15 और 12 पीएचडी की डिग्रियों के साथ कर्नाटक, मध्य प्रदेश और तेलंगाना का स्थान रहा। ‘स्टडी ऑफ एंटरप्रिन्योरियल रिसर्च एंड डॉक्टोरल डिस्र्टेशस इन इंडियन यूनिवर्सिटीज’ नामक शोध अध्ययन में ये तथ्य उभरकर सामने आए।

उद्यमिता शिक्षा, शोध, प्रशिक्षण एवं संस्थान निर्माण के लिए स्वीकृत राष्ट्रीय संस्थान, एंटरप्रिन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्युट ऑफ इंडिया (ईडीआईआई) के गणपति बट्ठिनी और डॉ. कविता सक्सेना द्वारा यह अध्ययन किया गया।

इस अध्ययन का उद्देश्य पिछले 16 वर्षो में उद्यमिता शोध की दशा एवं दिशा की पहचान करना था, ताकि सामाजिक विज्ञान की तुलना में उद्यमिता शोध के परिमाणात्मक वृद्धि को जाना जा सके। उद्यमिता में डॉक्टोरल डिग्री देने वाले विश्वविद्यालयों के योगदान को समझा जा सके और राज्यवार, लिंगानुसार और भाषाई आधार पर उद्यमिता में शोध की प्रवृत्ति का पता लगाया जा सके। इस अध्ययन के आंकड़ों का प्राथमिक स्रोत एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2000 से 2015 तक की अवधि के आधिकारिक प्रकाशन से हासिल किया गया।

शोध की प्रवृत्ति के बारे में, ईडीआईआई की एसोसिएट फैकल्टी, डॉ. कविता सक्सेना ने कहा, “उद्यमिता का अध्ययन क्षेत्र धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है और अब विद्यार्थी शिक्षा के औचित्यानुचित्य की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि, उद्यमिता शोध एवं डॉक्टोरल शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। इस अध्ययन में भारतीय विश्वविद्यालयों में पिछले 16 वर्षो में उद्यमिता शोध में वृद्धि एवं विकास को रेखांकित किया गया है।”

डॉ. सक्सेना ने आगे कहा, “हालांकि वर्तमान अध्ययन में महिला उद्यमिता को शोध के सबसे पसंदीदा क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है, लेकिन ऐसे अन्य क्षेत्रों की पहचान के लिए आगे शोध किया जा सकता है, जिनमें भारतीय विश्वविद्यालयों में डॉक्टोरल शोध निबंध पूरे किए जा सकते हैं। चूंकि देश उद्यमिता अभियान के लिए तैयार है, इसलिए राज्य-स्तरीय नीतियों का अध्ययन किया जा सकता है।”

उन्होंने कहा, “विभिन्न राज्यों में किए गए या किए जा रहे पीएचडी शोध निबंधों की संख्या एवं उनके प्रकार के साथ उन नीतियों की तुलना कर शोध के निहितार्थो का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।”

इन 177 डॉक्टोरल थिसिस में से, 104 पुरुष शोधकर्ताओं द्वारा किए गए और 73 महिला शोधकर्ताओं द्वारा किए गए। शोध की सबसे पसंदीदा भाषा अंग्रेजी रही, 167 पीएचडी थिसिस अंग्रेजी में किए गए और बाकी 10 हिंदी में किए गए।

इस अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि भारतीय विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे पीएचडी प्रोग्राम्स की उपलब्धता बढ़ाएं और वे उद्यमिता में प्रणालीगत शिक्षा, प्रशिक्षण एवं शोध उपलब्ध कराने पर ध्यान दें। डॉक्टोरल शोध से जुड़े विभाग मौजूदा कॉर्पोरेट एवं व्यावसायिक घरानों वाले उद्यमों के साथ संपर्क स्थापित कर सकते हैं, ताकि प्रमाण-आधारित शोध के अवसर तलाशे जा सकें।

उद्यमिता के क्षेत्र में विकसित ज्ञान और इसके व्यावहारिक उपयोग के बीच के अंतर को दूर करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। चूंकि उद्यमिता के क्षेत्र में विशेषज्ञों/पीएचडी गाइड्स का अभाव है, इसलिए उद्यमिता के स्कॉलर्स के लिए सहयोगपूर्ण इंडस्ट्री-एकेडेमिया में इंटर्नशिप सहायता का प्रबंध किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं और उन स्टार्ट-अप्स से जोड़ने के लिए उद्यमिता में डॉक्टोरल प्रोग्राम्स को बढ़ावा दिया जा सकता है, जो व्यावसायिक अवसरों की पहचान के लिए बाजार शोध करने, व्यवसाय की योजना तैयार करने और उद्यम शुरू करने हेतु अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के चिह्नांकन में रूचि रखते हैं।

–आईएएनएस

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समय धारा

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