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अनुराग ठाकुर का बयान उन्ही पर पड़ा भारी, कोर्ट ने ‘स्पष्ट तौर पर और बिना शर्त” माफी मांगने को कहा

नई दिल्ली, 8 जुलाई :  सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर से उनके उस बयान पर माफी मांगने को कहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अदालत का आदेश देश में क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था में सरकारी दखल देना है। अदालत ने ठाकुर से अपने उस बयान पर ‘स्पष्ट तौर पर और बिना शर्त” माफी मांगने को कहा है। 

न्यायामूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायामूर्ति ए.एम खानविल्कर और न्यायामूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने ठाकुर से अगली तारीख में कोर्ट में पेश होने को कहा है। 

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई आगामी शुक्रवार को रखी है। 

अदालत ने ठाकुर से स्पष्ट और बिना शर्त माफी मांगने को इसलिए कहा है क्योंकि पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष ने पहले जो मांफी मांगी थी उसकी भाषा स्पष्ट नहीं थी। 

ठाकुर की तरफ से अदालत में दलील दे रहे वरिष्ठ वकील पी.एस. पाटवालिया ने कहा कि पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष ने पहले ही माफी नामा दाखिल कर दिया है। इसके जवाब में पीठ ने कहा, “आपको एक पेज का हलफनामा और बिना शर्त का माफीनामा दाखिल करना है। उन्हें (ठाकुर) को यहां होना चाहिए।”

पाटवालिया ने ठाकुर की तरफ से आए माफीनामे को पढ़ा जिसको सुनने के बाद पीठ ने कहा, “माफीनामे की भाषा एक दम स्पष्ट होनी चाहिए। पहले वाले माफीनामे में शर्त जैसी भाषा है।”

पीठ के मूड को समझते हुए ठाकुर के वकील ने कहा, “पीठ जो कहना चाह रही है उसे मैं साफ तौर से समझ रहा हूं। मैं इस संदेश को उन तक पहुंचा दूंगा। मैं उनसे कहूंगा कि यह इस तरीके से होना चाहिए, यह न हो इसका कोई कारण नहीं।”

पाटवालिया ने अदालत में कहा, “मैंने कभी भी कुछ गलत नहीं किया है। यह मामला जारी रहेगा। मैं सर्वजनिक जीवन में हूं। पहले कुछ गलतफहमी हुई। आईसीसी की बागडोर सम्भाल रहे शशांक मनोहर जब बीसीसीआई अध्यक्ष थे, तब मैंने उनसे सीएजी की बोर्ड में मौजूदगी पर स्थिति साफ करने को कहा था, जिस पर उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष रहते हुए कहा था कि बोर्ड में सीएजी की मौजूदगी सरकारी दखल के समान है।”

पीठ ने कहा, “आप माफीनामा लाइए और तब ही मामला खत्म होगा।”

अदालत ने अपने दो जनवरी 2017 के आदेश में ठाकुर और बीसीसीआई के तत्कालीन सचिव अजय शिर्के को पदों से हटा दिया था और पूछा था कि इनके खिलाफ झूठी गवाही देने और अदालत की अवमानना का मामला दर्ज क्यों न हो।

इन दोनों अधिकारी अदालत की आंखों की किरकिरी तब बने थे जब इन्होंने अदालत में यह नहीं बताया था कि इन्होंने आईसीसी को पत्र लिखकर यह कहने को कहा था कि लोढ़ा समिति की सीएजी की बोर्ड में मौजूदगी की सिफारिश बीसीसीआई में सरकारी दखल होगी।

–आईएएनएस

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