
Lesser Known Contributors to Indian Constitution : भारतीय संविधान के कम-ज्ञात शिल्पकार: भूमिका, योगदान और उपेक्षा के कारण
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह देश की विविधता, संघर्ष, आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक चेतना का लिखित रूप है। सामान्यतः जब संविधान की चर्चा होती है, तो कुछ गिने-चुने नाम—जैसे डॉ. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल—ही प्रमुखता से सामने आते हैं। निस्संदेह उनका योगदान ऐतिहासिक और केंद्रीय है, लेकिन यह मान लेना कि संविधान केवल इन्हीं व्यक्तियों की देन है, सच्चाई को अधूरा बना देता है।
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वास्तव में, संविधान निर्माण एक सामूहिक, बौद्धिक और बहुस्तरीय प्रक्रिया थी, जिसमें कई ऐसे लोग शामिल थे जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किए। दुर्भाग्यवश, इन योगदानकर्ताओं को वह पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे।
यह लेख उन्हीं कम-ज्ञात लेकिन निर्णायक योगदानकर्ताओं की भूमिका, उनके योगदान और उनके उपेक्षित रह जाने के कारणों पर प्रकाश डालता है।
1. बी. एन. राव — संविधान के मौन वास्तुकार
बी. एन. राव को भारत का संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था। उनका योगदान इतना व्यापक था कि कई विद्वान उन्हें “संविधान का तकनीकी वास्तुकार” कहते हैं।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने विश्व के प्रमुख संविधानों—अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन—का तुलनात्मक अध्ययन किया।
- संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत प्रारंभिक मसौदा ढांचा उन्हीं की देखरेख में तैयार हुआ।
- मौलिक अधिकारों, संघीय ढांचे और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े कई प्रावधानों का प्रारूप उन्होंने ही सुझाया।
उपेक्षा के कारण
- वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि एक विशेषज्ञ अधिकारी थे।
- उनका कार्य तकनीकी और परामर्शात्मक था, जो सार्वजनिक बहसों से दूर रहा।
- राजनीतिक इतिहास अक्सर विचारों से अधिक व्यक्तित्वों को याद रखता है।
2. अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर — संवैधानिक नैतिकता के रक्षक
अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर संविधान सभा के सबसे प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं में से एक थे।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने मौलिक अधिकारों को कानूनी रूप से सुदृढ़ बनाने में अहम भूमिका निभाई।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता और “Rule of Law” की अवधारणा पर उनके भाषण अत्यंत प्रभावशाली थे।
- वे मानते थे कि संविधान केवल सत्ता का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नैतिक अनुशासन का साधन है।
उपेक्षा के कारण
- वे किसी जनांदोलन के नेता नहीं थे।
- उनके योगदान का स्वरूप बौद्धिक और विधिक था, जो जनप्रिय नारों में नहीं बदल सका।
3. के. एम. मुंशी — सांस्कृतिक आत्मा के संवाहक
के. एम. मुंशी एक लेखक, शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी भूमिका अक्सर राजनीतिक नेताओं की छाया में दब जाती है।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने सांस्कृतिक अधिकारों, भाषा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेदों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) के विचार को संविधान में स्थान दिलाने के लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किया।
- उनका मानना था कि आधुनिक भारत की जड़ें उसकी सांस्कृतिक विविधता में हैं।
उपेक्षा के कारण
- उनके विचार कई बार विवादास्पद माने गए।
- स्वतंत्रता के बाद की राजनीति में उनका प्रभाव सीमित हो गया।

4. बेगम ऐज़ाज़ रसूल — अल्पसंख्यक दृष्टिकोण की सशक्त आवाज़
बेगम ऐज़ाज़ रसूल संविधान सभा की उन गिनी-चुनी मुस्लिम महिला सदस्यों में से थीं जिन्होंने खुलकर अपनी बात रखी।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) का विरोध किया।
- उनका तर्क था कि अलगाव नहीं, बल्कि समान नागरिकता ही सच्चा लोकतंत्र है।
- यह दृष्टिकोण उस समय साहसिक था, खासकर विभाजन की पृष्ठभूमि में।
उपेक्षा के कारण
- वे किसी बड़े राजनीतिक दल की प्रमुख नेता नहीं थीं।
- महिला और अल्पसंख्यक होने के कारण ऐतिहासिक लेखन में उन्हें सीमित स्थान मिला।
5. एच. वी. कामथ — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रहरी (Budget 2026)
एच. वी. कामथ संविधान सभा के सबसे सक्रिय वक्ताओं में से थे।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों पर बार-बार प्रश्न उठाए।
- आपातकालीन शक्तियों और राज्य की असीमित सत्ता को लेकर उन्होंने चेतावनी दी।
- वे संविधान को “सत्ताधारी नहीं, नागरिक-केंद्रित” बनाना चाहते थे।
उपेक्षा के कारण
- उनके कई सुझाव स्वीकार नहीं किए गए।
- इतिहास अक्सर “जीतने वाले विचारों” को याद रखता है, विरोधी स्वरों को नहीं।
6. दुर्गाबाई देशमुख — सामाजिक न्याय की संवैधानिक आवाज़
दुर्गाबाई देशमुख एक समाजसेविका थीं, जिनकी संवैधानिक दृष्टि सामाजिक अनुभव से निकली थी।
भूमिका और योगदान
- उन्होंने महिलाओं, बच्चों और वंचित वर्गों के अधिकारों पर जोर दिया।
- सामाजिक कल्याण को केवल नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी मानने की वकालत की।
- बाद में उन्होंने योजना आयोग और सामाजिक संस्थानों में भी महत्वपूर्ण कार्य किया।
उपेक्षा के कारण
- उनका कार्य सामाजिक क्षेत्र में फैला हुआ था, केवल संविधान तक सीमित नहीं।
- महिलाओं के योगदान को लंबे समय तक “पूरक भूमिका” मानकर कम आंका गया।
ये लोग क्यों अक्सर भुला दिए जाते हैं?
इन सभी योगदानकर्ताओं की उपेक्षा के पीछे कुछ सामान्य कारण हैं:
- नायक-केंद्रित इतिहास लेखन – इतिहास अक्सर कुछ बड़े चेहरों के इर्द-गिर्द लिखा जाता है।
- तकनीकी और बौद्धिक योगदान की अदृश्यता – मसौदा लेखन, कानूनी बहसें और सलाहकारी भूमिकाएँ कम नाटकीय लगती हैं।
- राजनीतिक शक्ति का अभाव – जिनके पास स्वतंत्रता के बाद सत्ता नहीं रही, वे स्मृति से बाहर होते गए।
- लिंग और अल्पसंख्यक पूर्वाग्रह – महिलाओं और अल्पसंख्यकों को लंबे समय तक सीमित स्थान मिला।
Lesser Known Contributors to Indian Constitution
स्मृति का विस्तार आवश्यक है (Lesser Known Contributors to Indian Constitution)
भारतीय संविधान किसी एक व्यक्ति या विचारधारा की रचना नहीं है। यह सामूहिक बुद्धिमत्ता, असहमति, संवाद और समझौते का परिणाम है। कम-ज्ञात योगदानकर्ताओं को याद करना केवल ऐतिहासिक न्याय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना को गहराई देना भी है।
जब हम संविधान को पढ़ते हैं, तो हमें उसके शब्दों के पीछे खड़े उन शांत शिल्पकारों को भी देखना चाहिए—जिनकी कलम, तर्क और साहस ने भारत को एक संवैधानिक गणराज्य बनाया।
भारतीय संविधान के कम-ज्ञात योगदानकर्ता कौन थे?
बी. एन. राव, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, के. एम. मुंशी, बेगम ऐज़ाज़ रसूल, एच. वी. कामथ और दुर्गाबाई देशमुख प्रमुख कम-ज्ञात योगदानकर्ता थे।
बी. एन. राव को संविधान का वास्तुकार क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने संविधान का प्रारंभिक ढांचा और मसौदा तैयार करने में मुख्य भूमिका निभाई।
कम-ज्ञात योगदानकर्ताओं को क्यों नजरअंदाज किया गया?
तकनीकी भूमिका, राजनीतिक शक्ति का अभाव और इतिहास लेखन की सीमाओं के कारण।
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