
Women’s Day Editorial Woman puppet of struggles
नई दिल्ली (समयधारा) : आज एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) आ गया l
एक बार फिर देश-विदेश सहित सभी जगह महिलाओं के सम्मान उनके गौरव और उनके लिए आवाज उठाई जायेगी l
सच में कभी-कभी काफी निराश हो जाता हूँ, जब यह सब बार-बार हर साल होता है l
आप सोच रहे होंगे की मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ l
अरे भाई! मैं भी इंसान हूँ भगवान नहीं , या किसी की कोई कठपुतली नहीं, की जब आपका जी चाहें आप कहो की मैं महिला का सम्मान करूँ, और जब आपका जी चाहें उन्हें भूल जाऊं l
जब महिला दिवस आता है तो लोग कहते है भाई महिला दिवस(Women’s Day) है… चलों महिलाओं के बारें में कुछ कहें, कुछ अच्छी चिकनी-चुपड़ी बातों से फिर समाज को बहकाएं और खुद को भी बहकाएं l
कभी-कभी यह सोचकर ही दिल काँप उठता है कि,क्या मैं या मेरे आसपास के लोग सच में महिलाओं के लिए उतने जागरूक है..?
बड़ा सवाल कर दिया न मैंने और शायद यही सवाल लोगों को चुभेगा भी की
- यह क्या बड़ी-बड़ी बात कर रहा है l
- चुपचाप जो काम दिया गया है वो क्यों नहीं करता….
- अपने काम से काम रख…. आदि-आदि l

Women’s Day Editorial Woman puppet of struggles
गुस्सा तो इतना भरा है मन में की सबको ले चपेट पे चपेट-चपेट पे चपेट मारूं l या इतना जोर से चिल्ला कर इन्हें इनकी औकात बताऊँ l
पर मैं खून के घूंट पी कर रह जाता हूँ … ?
कारण साफ़ है मुझे मेरी औकात पता है l मुझे भी समाज में रहना है इसलिए चुप्प हूँ..!!
पर एक चुप्पी में काफी ताकत होती है l इस ताकत को कलम द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, इसका अंदाजा है मुझे l
इसलिए मैं आज इस लेख में 2 सच्ची कहानियों द्वारा आदर्श महिलाओं के कुछ उदहारण प्रस्तुत करूंगा l
वही दूसरी तरफ इस समाज में इसयुग में, महिलाओं के स्थान उनकी पहचान की हकीकत बयां करूंगा l
इसके बाद अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप समाज को बदलना चाहते है या फिर वही Women’s day – Women’s day खेलना है l
सबसे पहले बात करता हूँ, रिटायर्ड स्कूल टीचर की जिनकी उम्र है करीब 64 साल है l
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64 वर्षीय द्रोपदी ने अपने जीवन के उन्ही पलों से संघर्ष करना शुरू कर दिया था,
जब हम स्कूल में किताबों के बीच और अपने बचपन के बीच की दुनिया में खोये रहते थे l
School और घर की विपरीत परिस्थितियों में तालमेल बिठाना – संघर्ष करना इनकी खूबी रही है l
9 भाइयों और बहनों (2 भाई–7 बहनें) में सबसे बड़ी बेटी द्रोपदी पर पढ़ाई/काम के बोझ के साथ-साथ घर में सबसे बड़े होने की जिम्मेदारी भी थी l
2 मार्च 1957 को जन्मी द्रोपदी के जीवन में संघर्ष तो बचपन से ही शुरू हो गया था l
दूध बेचने से लेकर पापा की साइकिल की दूकान में हाथ बंटाने तक, सभी काम उन्होंने किया l
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काम के साथ-साथ उन्होंने जो एक बात बचपन में ही गांठ मार ली थी वह यह की किसी भी सूरत में पढ़ाई को नहीं छोड़ना जिस वजह से वह अपने जीवन में आज इतनी शक्तिशाली सफल महिला बनी l
जब इंसान कुछ ठान लेता है तो वह जरुर कर सकता है, खास कर एक स्त्री l अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकती है l इतिहास में ऐसे कई उदहारण है l
द्रोपदी इस बात का एक और उदहारण है l अपने संघर्ष के दिनों में कई मुसीबतों का सामना करते हुए द्रोपदीजी ने न सिर्फ अपनी जिंदगी बनायीं l बल्कि अपने दो बच्चो की…अपने पति की जिंदगी भी उन्होंने बनायीं l
आज उनका एक लड़का लंदन में है तो वही दूसरा पुत्र दिल्ली में रहकर ही अपने सफल करियर को आगे बड़ा रहा है l
यह एक संक्षिप्त विवरण मैंने दिया , पर उनकी जीवनी की सबसे बड़ी परेशानी से आप अभी अवगत नहीं है l चलियें उनके संघर्ष के बारें में कुछ बाते जानते है l

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- सन 1957 में लड़कियों के पढ़ाई को लेकर संघर्ष l
- मिडिल क्लास फॅमिली में अपने से छोटे 8 भाइयों-बहनों के सामने आदर्श रखने का संघर्ष l
- अपने पति की फॅमिली में जॉब करते हुए घर सँभालने का संघर्ष l
- अपने काम के साथ-साथ दो बच्चों की परवरिश का संघर्ष l
- अपने आर्थिक हालात व अपने व परिवार के भविष्य को उज्जवल बनाने का संघर्ष l
- इन सब के बीच जो सबसे बड़ा संघर्ष था समाज का l उस समाज का जो महिलाओं को उस समय वो सम्मान नहीं देता था जो आज मिलता है, उस समाज के साथ लड़कर उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ने का संघर्ष l
- और अब 2017 से जीवन में अचानक आये अपनी माँ को लेकर एक और संघर्ष l
- एक संघर्ष खुद का आत्मविश्वास बढ़ाने व कार चलाकर इस उम्र में अपने बच्चों और पति के समक्ष अपने अस्तित्व का अहसास कराने का संघर्ष l
द्रोपदी ने जीवन के हर संघर्ष में जीत हासिल की और आगे भी करेगी l
जीत का कारण व सफल होने का कारण – सिर्फ एक है और वह है हर हालात में हार न मानना l
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द्रोपदी जी न सिर्फ एक मजबूत वीरांगना है, बल्कि संघर्षों पर विजय पाने वाली एक सच्ची सफल सीधी-साधी घरेलू महिला है l
इतने सारे संघर्षों के बाद जब कई नौकरीपेशा रिटायर्ड बुजुर्ग लोग अपनी पेंशन से सुखी जीवन जीते है,
वही उम्र को धत्ता बताते हुए सुबह 3 बजे उठकर ब्रह्मकुमारी के ज्ञान को आत्म्साद कर रही है l
यह द्रोपदी न सिर्फ ब्रह्मकुमारी सरीखा जीवन जी रही है,
बल्कि अपनी बूढ़ी अपाहिज माँ की जिम्मेदारी/देखभाल का जिम्मा भी अपने 7 नालायक भाइयों-बहनों के होते हुए भी उठा रही है l
द्रोपदीजी जैसे आदर्श ही उसकी सबसे छोटी बहन डीना में आयें l
आज द्रोपदीजी बहन डीना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी माँ के बचे हुए जीवन के लिए संघर्ष कर रही है l

यहाँ यह बता दे की अपने लिए तो सभी लोग करते है l
पर बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का इस हद तक साथ देना, इस कलयुग में बहुत ही कम देखने को मिलता है l
इस कहानी में एक और स्त्री/नारी का पात्र जुड़ा और वह है डीना का l
जिसका अब तक का जीवन भी कम संघर्ष से भरा नहीं है l हम आपको उनके जीवन के बारें में भी संक्षेप में बताएँगे l
- डीना : आज की युवा शक्ति के साथ-साथ अपने वचनों की जिम्मेदारी लेनेवाली एक सशक्त महिला l
- डीना : कभी रानी लक्ष्मीबाई तो कभी मदर टेरेसा बनकर संघर्ष कर रही एक युवा नारी की पहचान l
अपने पापा के गुजर जाने के बाद 10 वर्षों तक डिप्रेशन में रहने वाली l उससे बाहर निकल कर अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली डीना की कहानी भी काफी प्रेरणादायक है l
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संघर्ष सभी के जीवन में होता है l कोई हालातों के साथ समझौता कर लेता है और कोई डीना की तरह उनसे लड़ता है l
शादी करकर अपनी बूढ़ी अपाहिज माँ को मरते हुए छोड़ कर जाने का सुनहरा मौक़ा उसके पास काफी पहले से ही था l
पर अपने 2 भाइयों 6 बहनों की जिम्मेदारियों के बोझ को न सिर्फ उसने उठाया l बल्कि समाज में एक ऐसी सशक्त-मजबूत नारी का आदर्श रखा जो सदियों तक याद रखा जाएगा l

अपनी माँ के जीवन की लड़ाई चाहे डॉक्टर से हो या हालातों से या फिर खुद के बड़े भाइयों और बहनों से l डीना कभी भी पीछे नहीं हटी l
अपने माँ के जीवन के लिए बैंक से लोन लेना हो या कोर्ट में उनके खिलाफ अपने और अपनी माँ के सम्मान के लिए लड़ना हो वह कभी पीछे नहीं हटी l
झुझारुपन-निरंतर लड़ना और मीडिया जैसी 24*7 वाली अपनी जॉब को पूरा समय देना डीना के व्यक्तित्व की पहचान है l
डीना पढ़ी-लिखी एक सीधी-साधी लड़की थी पर हालातों ने उसे सीधी-साधी चुपचाप रहने वाली लड़की से एक आंदोलनकारी न थकने वाली अन्याय न सहने वाली लड़की में तब्दील कर दिया l
कई रसूखदार लोगों के आखों का काँटा डीना के जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष खुद के परिवार से लड़ने का रहा l
आप बाहर वाले से लड़ सकते हो पर अपने ही परिवार के खिलाफ लड़ना बेहद ही मुश्किल होता है l
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हमारे समाज में कई ऐसे उदहारण देखने को मिल जायेंगे जहाँ पर बूढ़े माँ-बाप के साथ अत्याचार हो रहा हो और समाज सहित कई लोग आँख मूंद कर बैठा हो l
आप के आसपास ऐसे कई परिवार मिल जायेंगे जहाँ यह बात आम है l और सबसे बड़ी बात है इन सब में आपका भी मौन समर्थन l
पर डीना इन सबसे अलग थी l जब तक उस पर अत्याचार हुए वह चुप रही l
उसने कुछ नहीं कहा पर जब बात उसकी 84 साल की बुढ़ि अपाहिज माँ की आई तो उसने सबकुछ दांव पर रख दिया l
अपने वजूद में छुपी हुई खूबसूरत तस्वीर को उसने बाहर निकाला l न सिर्फ बाहर निकाला बल्कि अपनी माँ को आज आज नया जीवन दिया है l
माँ की बीमारी को देख 2017 में डॉक्टर के जवाब देने के बावाजूद उसने माँ को फिर ज़िंदा कर किया l करोड़पति
भाइयों-बहनों के होने के बावजूद लोन लेकर माँ की बीमारी का इलाज करवाया l

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माँ के हक़ के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया वहां से माँ को इंसाफ दिलाया l
इन सब के बीच अपनी पर्सनल लाइफ को उसने नहीं जिया l करीब 5 साल तक सगाई होने के बावजूद शादी नहीं की l इस वजह से उसकी शादी भी इस समय खतरे में है l
इन दो कहानियों से जो मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ वो यही है की अगर आप को महिलाओं के लिए उचित सम्मान देने का 1 प्रतिशत भी ख्याल आता है तो आपके आसपास द्रोपदी–डीना जैसी कई महिलायें मिलेगीl
कमेंट्स करें और बताएं क्या बदलाव लाना चाहते है आप इस समाज में… कैसे आप एक आदर्श समाज का हिस्सा बनेगे जहाँ नारी के संघर्ष का अंत होगा और उसे बराबरी का हिस्सा मिलेगा l
उनका साथ दे l उनका सम्मान करें l और अगर यह न कर सके तो कम से कम उनके संघर्ष को और जटिल करने में अपना योगदान न दे l
अगर आप किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो किसी का बुरा करने का आपको कोई हक़ नहीं l
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मेरे कुछ सवाल है आपसे….
- क्या नारी का दूसरा नाम संघर्ष ही है..?
- क्या भारत में हालात नहीं बदलेंगे..?
- 1957 हो या 2021….. क्या आज भी हमारा समाज पुरुष प्रधान ही रहेगा…?
- क्या इस पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान के लिए अभी भी संघर्ष करना पडेगा…?
- आज भी दलितों की बेटियों को ज़िंदा जलाया जाएगा…?
- क्या आज भी जात पात का ऊंच-नीच का भेदभाव रहेगा …?
- क्या आज भी बेटों की जगह बेटियों को नहीं रखा जाएगा..?
शर्म आती है ऐसे समाज पर …..!!!
मुझे भी बड़ी-बड़ी बात करने का कोई हक़ नहीं है पर क्या आज भी नारी को अपने ही वजूद के लिए संघर्ष करना होगा..!!! शायद नहीं…पर अभी भी मैं कंफ्यूज हूँ …
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2021 women’s day के गूगल डूडल (Google Doodle) को देखकर अच्छा लगा जहाँ उन्होंने महिला-पुरुष को एक साथ एक ही धरातल पर दिखाया l
पर क्या यह भारतीय समाज की हकीकत बयां करता है …. क्या भारतीय समाज बदलेगा l
समयधारा की ओर से समाज की सभी महिलाओं को महिला दिवस की शुभकामनाएं!