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J&K के पूर्व गवर्नर सत्यपाल मलिक का 79 वर्ष की उम्र में निधन: एक बेबाक और संघर्षशील नेता की विदाई

जानें पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के जीवन, राजनीतिक सफर, विवादों और निधन की परिस्थितियों पर विस्तृत लेख 

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जानें पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के जीवन, राजनीतिक सफर, विवादों और निधन की परिस्थितियों पर विस्तृत जानकारी l 


सत्यपाल मलिक का निधन: एक बेबाक और संघर्षशील नेता की विदाई

1. अंतिम समय और निधन की परिस्थितियां

पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का 5 अगस्त 2025 को दिल्ली के एक प्रमुख अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले कई महीनों से बीमार चल रहे थे। अंतिम दिनों में उन्हें मूत्र संक्रमण (UTI) हुआ, जो उनके गुर्दों और अन्य अंगों को प्रभावित करता चला गया। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें मल्टी-ऑर्गन फेल्योर हुआ, जिसकी वजह से उनका निधन हुआ।

79 वर्ष की उम्र में, उन्होंने दोपहर 1:12 बजे अंतिम सांस ली। अस्पताल ने बयान जारी कर बताया कि मलिक का इलाज लंबे समय से चल रहा था और डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी।


2. राजनीतिक यात्रा: छात्रसंघ से राज्यपाल तक

सत्यपाल मलिक की राजनीति में शुरुआत 1960 के दशक के अंत में हुई। वे मेरठ कॉलेज और मेरठ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष भी रहे। छात्र राजनीति के अनुभव ने उन्हें जनता से जुड़ने की समझ दी।

1974 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की बागपत विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बनने की शुरुआत की। इसके बाद वे लोकदल, जनता दल, कांग्रेस और अंततः भाजपा जैसे विभिन्न दलों से जुड़े। 1989 में वे अलीगढ़ से लोकसभा सांसद बने।

उनका राजनीतिक सफर बहुत विविधतापूर्ण रहा। कभी किसान नेता के रूप में, कभी सांसद, कभी राज्यसभा सदस्य, और अंततः वे देश के कई राज्यों के राज्यपाल बने।


3. राज्यपाल के रूप में कार्यकाल

सत्यपाल मलिक ने बिहार, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय जैसे राज्यों में राज्यपाल के रूप में सेवा दी। उनका सबसे चर्चित कार्यकाल जम्मू-कश्मीर में रहा। 2018 में उन्हें राज्यपाल बनाया गया और 5 अगस्त 2019 को, उनके कार्यकाल में ही अनुच्छेद 370 को हटाकर जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बाँट दिया गया।

वे जम्मू-कश्मीर के अंतिम पूर्ण राज्यपाल थे, और उनकी भूमिका इस ऐतिहासिक बदलाव में महत्वपूर्ण रही।

बाद में उन्होंने गोवा और फिर मेघालय के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। अक्टूबर 2022 में उन्होंने सक्रिय सेवा से सेवानिवृत्ति ली।

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4. बेबाक आवाज़ और विवाद

सत्यपाल मलिक उन चुनिंदा नेताओं में थे जो सत्ता में रहकर भी सरकार की आलोचना करने से नहीं कतराते थे। उन्होंने 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए और किसानों का समर्थन किया।

उनका यह बयान कि “पुलवामा हमले में लापरवाही हुई थी” और उन्होंने उस समय प्रधानमंत्री को बताया था, विवादों में आ गया था। सरकार ने इन बयानों से दूरी बनाई, पर मलिक अपने स्टैंड पर कायम रहे।

उनके ऊपर रिश्वत के आरोप भी लगे। एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि उन्हें एक प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के लिए रिश्वत की पेशकश हुई थी, जिस पर बाद में जांच भी हुई।


5. नेताओं की प्रतिक्रियाएँ

उनके निधन पर सभी दलों के नेताओं ने शोक व्यक्त किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें राष्ट्रसेवा में समर्पित नेता बताया और उनके निधन पर गहरा दुख जताया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें किसानों का सच्चा हितैषी बताया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य और देश ने एक बेबाक नेता को खो दिया है।
अखिलेश यादव और मायावती ने भी ट्वीट कर शोक जताया और उनके योगदान को याद किया।


6. जनता और विश्लेषकों की नजर में

सत्यपाल मलिक एक ऐसे नेता थे जो विचारधारा से ऊपर उठकर जनहित में बोलते थे। किसान आंदोलनों, भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों और संवैधानिक सवालों पर उनकी स्पष्टता उन्हें विशिष्ट बनाती थी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सत्यपाल मलिक जैसे नेता आज के दौर में दुर्लभ होते जा रहे हैं। उन्होंने कभी राजनीतिक दबाव में आकर अपने विचार नहीं बदले। यह गुण उन्हें जनता के करीब और सत्ता से दूर रखता था।


7. उनका उत्तराधिकार और विरासत

सत्यपाल मलिक की सबसे बड़ी विरासत उनका साहसिक और स्पष्ट बोलना था। वे प्रशासनिक दृष्टि से सशक्त थे और संवैधानिक सीमाओं को समझते हुए अपने निर्णय लेते थे। उनके जैसे नेता लोकतंत्र की मजबूती के प्रतीक माने जाते हैं।

वे अक्सर कहा करते थे, “मैं जो कहता हूँ, वह अपने अनुभव और जमीर के आधार पर कहता हूँ। अगर मुझे इसके लिए पद छोड़ना पड़े, तो मैं सौ बार छोड़ दूँगा।”
ऐसे शब्द आज भी कई लोगों के दिलों में गूंजते हैं।

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8. निष्कर्ष: बेबाक राजनीतिक व्यक्तित्व की विदाई

सत्यपाल मलिक का जीवन भारतीय राजनीति का एक विशिष्ट अध्याय है। उनका सफर बताता है कि एक छात्र नेता कैसे राष्ट्रीय राजनीति में शीर्ष स्थान तक पहुँच सकता है। वे अपने पीछे ऐसे विचार छोड़ गए हैं, जो आने वाले नेताओं के लिए मिसाल हैं।

उनका जाना भारतीय राजनीति के उस वर्ग को कमजोर करता है, जो जनता की नब्ज पर हाथ रखता है और सत्ता के गलियारों में बेबाकी से सच कहने की ताकत रखता है।


भावभीनी श्रद्धांजलि!
ओम् शांति।


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Varsa

वर्षा कोठारी एक उभरती लेखिका है। पत्रकारिता जगत में कई ब्रैंड्स के साथ बतौर फ्रीलांसर काम किया है। अपने लेखन में रूचि के चलते समयधारा के साथ जुड़ी हुई है। वर्षा मुख्य रूप से मनोरंजन, हेल्थ और जरा हटके से संबंधित लेख लिखती है लेकिन साथ-साथ लेखन में प्रयोगात्मक चुनौतियां का सामना करने के लिए भी तत्पर रहती है।

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