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क्या है जमानती और गैर जमानती अपराध..? जानियें विस्तार में

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जीवन में इंसान से कभी अपराध भी हो जाता हैl कई बार कई ये जानबूझ कर होता है तो कई बार अनचाहे और अनजाने में भी हो जाता हैl

कई दफे रंजिश की वजह से भी लोगों को झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता हैl

आपराधिक मुकदमा होने की स्थिति मेंं उसे गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता हैl

भारतीय संविधान किसी भी व्यक्ति को जमानत या बेल लेने का पूरा अधिकार देता हैl

याद रहे कि कई अपराध ऐसे होते हैं जिनमें जमानत मिल जाती है और कई अपराध ऐसे होते हैं,

जिनमें जमानत नहीं मिलतीl कोई भी व्यक्ति जब जेल चला जाता है

और फिर व्यक्ति को जेल से बाहर निकालने के लिए जो अदालती आदेश मिलता है,उसे ही बेल या जमानत कहा जाता हैl 

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जमानती और गैर जमानती अपराध

आपको यह जान लेना चाहिए कि बेल कोई कानूनी अधिकार नहीं बल्कि जज की मर्सी पर निर्भर होता हैl

मामले की गंभीरता और प्रथम दृष्टया साक्ष्य और पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट बेल का निर्णय लेती हैl

कानून की नजर में अपराध के दो प्रकार होते हैंl एक जमानती अपराध और दूसरा गैर जमानती अपराध l

जमानती अपराध के तहत हल्के किस्म के अपराध आते हैं जबकि गैर जमानती अपराध के तहत गंभीर या विलक्षण किस्म के अपराध होते हैंl

जमानती अपराध

जमानती अपराध की श्रेणी में मारपीट, धमकी, लापरवाही से मौत, लापरवाही से गाड़ी चलाना,

जेब काटना आदि जैसे मामले आते हैंl सीआरपीसी यानी भारतीय दंड संहिता में ऐसे अपराधों की पूरी सूची बनाई गई हैl

जमानती अपराध के तहत ऐसे मामले आते हैं जिनमें अधिकतम तीन वर्ष की सजा सुनाई जाती हैl

ऐसे अपराधों में सीआरपीसी की धारा 436 के तहत कोर्ट द्वारा जमानत दे दी जाती हैl

कई बार ऐसे मामले भी सामने आते हैं जिनमें स्थानीय थाने से ही धारा 169 के तहत बेल मिल जाती हैl

कंई दफे गिरफ्तारी होने के बाद थानाध्यक्ष ही बेल बॉन्ड भरवा कर बेल दे देता हैl

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गैर जमानती अपराध

कई गंभीर किस्म के अपराध जिनमें हत्या, अपहरण, लूट , डकैती और फिरौती जैसे मामले

गैर जमानती अपराध की श्रेणी में आते हैंl ऐसे मामले जब अदालत के सामने जाते हैं

तो कोर्ट के सामने तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैंl कोई भी शख्स जब ऐसे गंभीर मामलों में अभियुक्त बनता है

तो उसकी जमानत याचिका मजिस्ट्रेट के समक्ष जाती हैl मामले की गंभीरता ओर तथ्यों पर गौर करने के बाद अगर मजिस्ट्रेट को लगता है

कि अभियुक्त को दस साल, उम्र कैद या फिर फांसी जैसी सजा हो सकती है तो वह जमानत याचिका को खारिज कर देता हैl

इससे कम की सजा वाले मामले में कोर्ट केस की मेरिट देखता है और उसके आधार पर जमान स्वीकृत या अस्वीकृत करता हैl

कई बार अपवाद का सहार लेते हुए अभियुक्त इन मामलों में भी जमानत की गुहार लगाते हैंl

कोई महिला या फिर शारीरिक, मानसिक रुप से बीमार आदमी गैर जमानती अपराधों में भी जमानत के लिए

कोर्ट के सामने जमानत याचिका लगा सकता है लेकिन जमानत का अंतिम फैसल कोर्ट को ही करना होता हैl

यह मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है कि वो याचिका स्वीकृत करे या अस्वीकृत,

हालांकि कोई भी फैसला तथ्यों और हालातों के मद्देनजर ही किया जा सकता हैl 

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Reena Arya

रीना आर्य www.samaydhara.com की फाउंडर और एडिटर-इन-चीफ है। रीना आर्य ने पत्रकारिता के महज 6-7 साल के भीतर ही अपने काम के दम पर न केवल बड़े-बड़े ब्रांड्स में अपनी पहचान बनाई बल्कि तमाम चुनौतियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए समयधारा.कॉम की नींंव रखी। हर मुद्दे पर अपनी ज्वलंत और बेबाक राय रखने वाली रीना आर्य एक पत्रकार, कंटेंट राइटर,एंकर और एडिटर की भूमिका निभा चुकी है।

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