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नई दिल्ली:NCSC Chairman Kishor Makwana Interview उस समय चर्चा में आया जब देश में आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे एक बार फिर केंद्र में हैं।
136वीं अंबेडकर जयंती के मौके पर Samaydhara के साथ हुई इस खास बातचीत में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन किशोर मकवाणा (NCSC Chairman Kishor Makwana Interview) ने डॉ. भीमराव अंबेडकर को लेकर बड़ा बयान दिया।
Samaydhara की संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ रीना आर्य द्वारा लिए गए इस NCSC Chairman Kishor Makwana Interview में उन्होंने कहा कि अंबेडकर को एक सीमित दायरे में बांध दिया गया, जबकि उनका विज़न कहीं अधिक व्यापक और राष्ट्र केंद्रित था।
यह NCSC Chairman Kishor Makwana Interview अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
राजनीति में कुछ ऐसे भी व्यक्तित्व है जिनके काम,विचार और अनुभव समाज को दिशा देने का काम करते हैं।
ऐसे ही एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व—राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन और प्रख्यात लेखक श्री किशोर मकवाणा जी के साथ हुई एक विशेष बातचीत का यह सारांश है।

साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले किशोर मकवाणा जी का जीवन संघर्ष, विचार और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
उन्होंने न केवल लेखन के माध्यम से समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया, बल्कि बाबा साहेब अंबेडकर, विरसा मुंडा,रामानुजाचार्य, अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरीखे महान नेताओं के विचारों को
आम जन तक पहुंचाने का भी कार्य किया है और बतौर पत्रकार अपने करियर की शुरुआत की थी।
इस विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपने बचपन के संघर्षों, लेखन की शुरुआत,पत्रकारित अनुभव, वैचारिक यात्रा और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अपने अनुभवों को बेहद सरल और स्पष्ट शब्दों में साझा किया है।
यह लेख केवल एक इंटरव्यू का संकलन नहीं है, बल्कि एक ऐसी वैचारिक यात्रा है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि “नेशन फर्स्ट” की भावना को हम अपने जीवन में कैसे उतार सकते हैं।
अगर आप समाज, राजनीति और प्रेरणादायक जीवन कहानियों में रुचि रखते हैं, तो यह इंटरव्यू आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
“NCSC Chairman Kishor Makwana Interview:”
NCSC Chairman Kishor Makwana Interview Highlights:
- “अंबेडकर को एक छोटे दायरे में सीमित कर दिया गया”
- “उनका असली सपना था भारत को महाशक्ति बनाना”
- सामाजिक न्याय के लिए समरसता और बंधुता पर जोर
- दलित समाज की प्रगति के साथ आत्मविश्वास बढ़ाने की जरूरत
- NCSC में पहली बार 43,000 केस क्लोज करने का दावा
बड़ा बयान: “अंबेडकर सिर्फ एक वर्ग के नेता नहीं थे”
किशोर मकवाणा ने कहा कि:
“बाबा साहब अंबेडकर का व्यक्तित्व वैश्विक स्तर का था, लेकिन उन्हें केवल एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया।”
उन्होंने यह भी कहा कि:
“उनका सपना था कि भारत एक महाशक्ति बने और राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।”
रीना आर्या: नमस्कार समयधारा चैनल में आपका हार्दिक स्वागत है। मैं आपकी होस्ट रीना आर्या और आज के इस विशेष पॉडकास्ट एपिसोड में आप सभी का हार्दिक स्वागत करती हूँ। आज हमारे समक्ष एक ऐसी विशेष शख्सियत मौजूद है जिन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक न्याय, समान विचारों, संविधान और वैचारिक लेखन को अर्पित किया है।
35 से अधिक प्रभावशाली पुस्तकों के लेखक जिन्होंने डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे महान व्यक्तित्वों के ऊपर अपनी कृतियां लिखी हैं और वर्तमान में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन के रूप में अपनी नई भूमिका निभा रहे हैं। चलिए मिलते हैं श्री किशोर मकवाना जी से। सर हमारे पॉडकास्ट एपिसोड में आपका हार्दिक स्वागत है।
किशोर मकवाणा: सभी को नमस्कार।
रीना आर्या: माननीय किशोर मकवाना जी का व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायक है। अत्यंत सरल, शांत और विचारों में गहराई लिए हुए आज हम उनके जीवन, विचार, संघर्ष और वैचारिक लेखन के प्रति उनके अनुभवों को समझने का प्रयास करेंगे। सर, आपके बचपन और प्रारंभिक जीवन के अनुभवों ने आपकी सोच और जीवन की दिशा को किस प्रकार प्रभावित किया?
किशोर मकवाणा:मेरा जो जन्म है वह अहमदाबाद से 45 किलोमीटर दूर धोलका करके एक हिस्टोरिकल सिटी है
वहां का एकदम जो दलित परिवार है, उसमें मेरा जन्म हुआ और मेरी सात पीढ़ियों से ज्यादा किसी ने ना तो कभी पुस्तक देखी थी, ना पेन देखी थी। केवल और केवल परिश्रम, मजदूरी, एकदम अत्यंत गरीबी।
पिताजी रेलवे में छोटी नौकरी करते थे। शुरू में तो वो जो रोड बनाते हैं उसमें जो मजदूरी करते हैं। उसमें पिताजी थे। बाद में रेलवे की नौकरी लगी और खास करके वैचारिक जो मेरा पोस्ट है, वह ज्यादातर मेरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में हुआ।
उस समय के जो शिक्षक थे खासकरके स्कूल के जो शिक्षक थे वो ऐसे शिक्षक थे कि वह रुचि रखते थे। इसमें थोड़ी बुद्धि प्रतिभा है। उसे पढ़ने में रुचि है। शिक्षा के अलावा भी अन्य पुस्तकों में रुचि है तो अच्छी अच्छी पुस्तकें लाकर हमारे शिक्षक हमें देते थे तो शिक्षक है, माता पिता है।

इन सब के कारण जो मेरी वैचारिक जो शक्ति है वो ज्यादा बढ़ी।
रीना आर्या: लेखन की शुरुआत आपने कब और किन परिस्थितियों में की? वो कौन सा क्षण था जब आपको लगा की आपको पुस्तक लिखनी चाहिए?
किशोर मकवाणा: मुझे पुस्तकें पढ़ने का तो बाल्यावस्था से ही शौक था। जब मैं स्कूल में पढ़ता था प्राथमिक शिक्षा तो तब भी मुझे पढ़ने का बहुत शौक था। मगर लिखना चाहिए ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था।
मगर गुजरात के अन्दर आरक्षण विरोधी आंदोलन के कारण सभी स्कूल विद्यालय बंद थे तो उस समय मुझे लगा कि यार यह विद्यालय बंद है। स्कूल बंद है तो विद्यार्थियों की शिक्षा बिगड़ रही है तो मैंने ऐसे ही उस समय तो अखबारों के अंदर लेटर एडिटर छपते थे। पाठकों के पत्र छपते थे तो मैंने एक पत्र लिखा।
और भाग्य से उस अखबार में वह पत्र छपा। और स्वाभाविक है जब अपना नाम छपता है तो एक आनंद भी होता है।
बाद में मुझे पता लगा कि महात्मा गांधी से लेकर अनेक महानुभाव इतने बड़े बड़े लेखक बने। उन्होंने अपनी लेखनी की शुरुआत लेटर एडिटर की थी। तो मुझे भी लिखने का नाम देखकर ही आनंद होने लगा तो बाद में मैंने काफी लिखा।
मैंने सबसे पहला जो आर्टिकल लिखा था,वो खुदीराम बोस पे था जो 15 वर्ष की आयु में माँ भारती की मुक्ति के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
तो उस पर मैंने लिखा था। तो इस प्रकार मेरी लेखनी प्रारम्भ हुई।
रीना आर्या: आपने अभी तक 35 से अधिक पुस्तकें लिखी है और इस निरंतर लेखन यात्रा के पीछे कौनसा प्रेरणा स्रोत है? आप हमें हमारे दर्शकों को बताना चाहेंगे।
किशोर मकवाणा: मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना जाता था। उस समय हमारे जो संघ के जो प्रचारक थे, हमारे विभाग के वो वर्तमान जो प्रधानमंत्री हैं, हमारे आदरणीय नरेंद्र भाई मोदी वो हमारे प्रचारक थे।
वो भी बहुत अच्छा लिखते हैं। उनकी भी काफी पुस्तकें प्रसिद्ध हुई है
मुझे याद है दो हज़ार वर्ष में हम बैठे थे तो वो उनमें एक बहुत अच्छा है। वो किसी के अंदर कुछ अच्छी बात है, कुछ अच्छे गुण है तो कैसे बाहर आना चाहिये
तो उन्होंने मुझे एक सलाह दी कि आप अखबारों में लिखते हो तो यह तो दूसरे दिन। यह रद्दी हो जाती है। अखबार रद्दी हो जाता है और आप पत्रकारिता भी करते हैं तो इससे आपका इमेज व्यक्तित्व एक अलग नहीं बनेगा। आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए। आपको एक अलग ही आपकी इमेज बने तो इसके लिए पुस्तकें आनी चाहिए।
मुझे भी लगा कि नहीं यह विचार तो अच्छा है। तो मैंने इस दिशा में शुरू किया काम और दो हज़ार 2 में मेरी पहली पुस्तक आई गुजराती में है, बाद में मेरी दूसरी किताब स्वामी विवेकानंद पर आई तो इस प्रकार एक के बाद एक पुस्तकें आती गई
कुछ मैंने मराठी से गुजराती। इंग्लिश से गुजराती, हिंदी से गुजराती ऐसी कुल मिलाकर सभी मिलाकर मेरी आज पुस्तकें हैं तो मैं हमेशा बोलता हूं। यह सभी मेरी छोटी सी पुस्तक है। उन सभी पुस्तकों का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को देना है तो हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी को मैं दूंगा।
रीना आर्या: ओके, एक बात और है सर, मैं आपके बारे में जब जान रही थी, आपने प्रधानमंत्री मोदी जी, डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर, अटल बिहारी वाजपेयी अलग अलग दौर के नेताओं पर लिखा है तो इन सभी नेताओं के व्यक्तित्व में वह कौन सी खासियत है जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
किशोर मकवाणा: मैंने जो पुस्तकें लिखी, खास करके एक तो स्वामी विवेकानंद है, डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर है, बिरसा मुंडा है। स्वामी अपने महर्षि रमण थे। उन पर मैंने लिखी है। संत रविदास पर मैंने लिखा है तो ऐसे जितने भी व्यक्तित्व जो महान थे उन पर लिखी। जैसे मोदी साहब तो इन सभी में एक बात कॉमन है कि उन्होंने सामान्य व्यक्ति से कैसे असामान्य व्यक्ति बने। जैसे नर से नारायण कैसे बना जा सकता है वो उन सभी में हम देख सकते हैं। यह मुझे बार बार प्रेरित करते थे। इसलिए मैंने इन सभी व्यक्तित्वों पर लिखा है
रीना आर्या: आपकी लिखी पुस्तकों में वह कौन सी पुस्तक है जो आपके दिल के सबसे ज्यादा करीब है?
किशोर मकवाणा: वैसे तो आप किसी माँ बाप को पूछेंगे कि आपको कौन सा बच्चा प्रिय है तो वह नहीं बता सकेगा। उसी प्रकार मुझे सभी पुस्तकें। सबसे मुझे प्रिय है। मगर खास करके मैं यहां एक पुस्तक का विशेष उल्लेख करूंगा। उसके पीछे लिखने की क्या प्रेरणा रही? वो है बाबा साहब अंबेडकर, जो बाबा साहब अंबेडकर का जो व्यक्तित्व है, उनका जो विचार है, उनका जो दर्शन है, वह आज भी लोगों के सामने सही तरह से नहीं आया है।
बाबा साहब अंबेडकर का पूरा जो जीवन है वो दो केंद्र बिंदु में हमें दिखाई देता है। एक है राष्ट्रहित सर्वोपरि। नेशन फर्स्ट और सेकंड है-समाज का जो पीड़ित वर्ग है, उनके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देना।
तो बाबा साहब अंबेडकर…जैसे रामानुजाचार्य है, रामानंद है, स्वामी दयानंद सरस्वती हैं, स्वामी विवेकानंद है। ऐसे जितने भी हमारे हमारे महान मनीषी हुए, उन सबका लक्ष्य भी यही था कि हिंदू समाज में जो विकृति है छुआछूत की वो दूर होनी चाहिए। बाबा साहब अंबेडकर भी यही चाहते थे।
वर्तमान समय में जो शब्द हमें बार बार सुनने को मिलता है आत्मनिर्भर भारत, समर्थ भारत, स्वदेशी पूर्ण भारत यह सभी बाबा साहब अंबेडकर चाहते थे। वह सभी बातें लोगों के सामने आई ही नहीं।
इसका कारण उनके जो तथाकथित जो ठेकेदार बन बैठे हैं
उन्होंने जानबूझकर वह बातें नहीं लाए तो हम चाहते थे। मैं भी चाहता था कि बाबा साहब अंबेडकर के यह सभी जो पहलू है, उन लोगों के सामने आना चाहिए। तो इसी उद्देश्य को लेकर मैंने मिशन लिया।
बाबा साहब अंबेडकर का जो सही और सच्चा जो है यथार्थ, वह व्यक्तित्व लोगों के सामने आना चाहिए। इसीलिए मैंने पुस्तक लिखी और बाबा साहब अंबेडकर की हिंदी, इंग्लिश, गुजराती सभी मिलाकर कुल मेरी 12 पुस्तकें हैं।
रीना आर्या: वर्तमान में आप राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। तो इस रोल में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
किशोर मकवाणा: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जो आयोग है, वह संविधान में हमारी तीसरी जो धारा है, उसके अंतर्गत इसकी रचना हुई है।
उसका उद्देश्य है की यह जो अनुसूचित जाति समाज है उसका सर्वांगीण विकास हो, उन पर किसी प्रकार का दमन ना हो, वह किसी प्रकार का उसके साथ अन्याय ना हो और उनके जो मूलभूत जो अधिकार है वह उसे मिलने चाहिए और उसकी रक्षा हो यह देखने का काम उसका कर्तव्य है।
दूसरा उसका जो काम है। केंद्र और राज्य सरकार है, उसके जितने भी अलग अलग डिपार्टमेंट है, वहां काम कर रहे अनुसूचित जाति के जो कर्मचारी हैं, अधिकारी हैं, उसको रोस्टर है, बढ़ोतरी है। वह कहीं पर भी उसे अन्याय होता है तो उसे न्याय मिले। वह देखने का काम आयोग का है।
भारत सरकार और राज्य सरकार की जो भी कल्याणकारी योजनाएं हैं, वह सही अर्थ में इंप्लीमेंट होती है कि नहीं? वह देखने का काम भी आयोग का है। उसका एक चौथा काम भी है। कहीं देश भर में अगर कोई घटना घटती है तो हम हम वहां का दौरा करते हैं स्थल का और देखते हैं कि उसमें क्या है और उस समय हम मार्गदर्शन करते हैं सरकार को, पुलिस को और यह मुख्य काम हमारा है
रीना आर्या: दलित समाज से जुड़े मुद्दों पर काम करते हुए आपके सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रही हैं?
किशोर मकवाणा: सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने एक ही है कि अनुसूचित जाति जो समाज है वह शताब्दियों से न्याय और अधिकार से वंचित था तो और उस पर इतने दमन भी हुए हैं पूर्व में तो उसके कारण उसकी जो शक्ति है, वह क्षीण हो गई। दूसरे, उनमें शक्ति तो काफी थी, मगर उसका सही अर्थ में उपयोग भी नहीं हुआ। अगर आप किसी व्यक्ति को बार बार दमन करेंगे तो उसका आत्मविश्वास है, वह भी क्षीण हो जाता है।
जैसे बाबासाहेब आम्बेडकर ने स्वयं भी कहा है कि जब मैंने मेरा कार्य प्रारंभ किया, 1920 के बाद, तब मेरे तीन सपने थे।
मेरा सपना यह था की दलित समाज जो है, अनुसूचित जाति समाज है वह शिक्षित बने। तो आज मैं जब देखता हूं तो मेरा जो सपना था वह पूर्ण हो गया है कि हजारों लाखों जो अनुसूचित जाति के, समाज के जो वर्ग है, लोग हैं वह शिक्षित हो रहे हैं। मेरा दूसरा सपना था कि अनुसूचित जाति के जो लोग है वह सरकारी नौकरियों में आए वह उन्होंने कहा कि आज जब मैं देखता हूं तो हजारों लाखों अनुसूचित जाति के लोग सरकारी नौकरियों में हैं। उन्होंने कहा, तो उनके जो सपना था वो संविधान के कारण पूर्ण हुआ। तीसरा उनका जो सपना था वो उन्होंने कहा की वो तीसरा सपना मेरा पूर्ण नहीं हुआ। वो तीसरा उनका सपना था कि गांव के अंदर रहने वाला जो अनुसूचित जाति का जो व्यक्ति है उस पर ये जातिगत अत्याचार है वो बंद होने चाहिए। मगर वो अभी तक चालू है।
तो अभी मैं एक जगह पर गया था तो वहां मैंने देखा कि छोटा मोटा और बड़े कारोबार करने वाले में अनेक अनुसूचित जाति के व्यक्ति है तो वो कारोबार भी कर रहे हैं। ऐसे अनेक सेक्टर हैं जहां पहले अनुसूचित जाति का युवा जाने की सोच भी नहीं पता भी नहीं था। उस दिशा में वो अपनी पूरी शक्ति सामर्थ्य से आगे बढ़ रहा है,
चाहे उद्योग का क्षेत्र हो, सरकारी नौकरी हो या साइंस, टेक्नोलॉजी या विज्ञान जैसे क्षेत्र है, उस दिशा में भी वह आगे बढ़ रहा है। तो यह अच्छी बात है कि संविधान के कारण सरकार की विविध कल्याणकारी योजनाओं के कारण आज अनुसूचित जाति का व्यक्ति आगे बढ़ रहा है। मगर साथ साथ अगर इनकी जो आत्मविश्वास की जो कमी है, अगर वह दूर करके एक नकारात्मक भाव है, वह दूर करके वह आगे बढ़ेगा तो बाबा साहब का जो भी सपना है या हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी का जो सपना है की यह जो अंतिम छोर पर बैठा हुआ व्यक्ति है वह भी मुख्यधारा में आकर अपनी पूरी शक्ति सामर्थ्य से आगे बढ़े तो बढ़ सकता है।
रीना आर्या: आयोग में काम करते हुए कोई ऐसा अनुभव या फिर ऐसा मामला जिसे आप आज भी याद करते हैं?
किशोर मकवाणा: हां, एक मैं बात जरूर बताऊंगा कि मैं मैसूर गया था कर्नाटक तो वहां एक संस्था ने कार्यक्रम आयोजन किया था। साधारणतया ऐसे कार्यक्रमों में मेरे जैसे पद पर बैठा हुआ व्यक्ति या तो राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति या सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति, कोई वहां तक नहीं जाता।
मगर समझ में आए इसलिए कि हमारी जो यह सेक्स वर्कर बहनें हैं, उनका वहां सम्मेलन था और वो भी इस क्षेत्र में काम करने वाली अनुसूचित जाति की दो बहनें हैं…तो उन्होंने मुझे कहा कि आप आयेंगे।
मैंने कहा हां जरूर आऊंगा क्योंकि वहां पर भी कोई वहां गया नहीं था। मैं वहां गया तो वहां का जो दृश्य था वह देखकर मेरी आंखों में भी आंसू आ गए। इतनी करुणा मैं इस स्थिति में यह हमारी बहनें जी रही थी। इतनी गरीब थी, संसाधनों का अभाव था। मैं उनके बीच बैठा।
उनको मैंने पूछा कि आपकी समस्या क्या है? तो किसी की बहन के पास राशन कार्ड नहीं था और राशन कार्ड नहीं था। इसके कारण उनके पास बाकी जो योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए वह भी नहीं था। तो मैंने कहा कि यह तो कैसे चल सकता है?… तो मैंने उनको वचन दिया कि मैं भाई के तौर पर आपको वचन देता हूं कि आपकी जो समस्या मैं हल करूंगा तो शाम को मैंने वहां के कलेक्टर को बुलाया और उनको कहा कि आज मैं यहां गया था।
यह सेक्स वर्कर बहनों के बीच तो उनकी यह समस्या है और हमने किसी भी हाल में आपको जो भी रास्ता निकालना है निकालिए। और इन बहनों को यह सब जो योजना है उनका लाभ मिलना चाहिए।
हम ऐसा करते हैं कि कल जो सम्मेलन है, मैं तीन अधिकारियों को वहां बिठा लूंगा और यह बहनों के पास जो भी आधे अधूरे डाक्यूमेंट्स हैं क्योंकि इस क्षेत्र में काम करती है वहां तो उनका पति का भी नाम नहीं है, डॉक्यूमेंट भी नहीं है। तो उन्होंने उनका वाट्सएप ग्रुप था। उसमें मैसेज डाल दिया कि आप कल सम्मेलन में आपके पास जो भी आधे अधूरे डॉक्यूमेंट हैं वो लेकर आई और दूसरे दिन पहली बार यह दिशा में काम शुरू हुआ और बाद में मैं फॉलोअप भी लेता रहा। आज लगभग 80% काम पूरा हो गया।
अनुसूचित जाति क्षेत्र में काम करने वाली लाखों लाखों संस्था है मगर ज्यादातर संस्था है ज्यादातर। मतलब 99% संस्थाएं। इस दिशा में जो मूलभूत समस्या है, उस दिशा में बहुत कम जाती है। अगर वह इस दिशा में भी जाएगी तो ऐसे अनेक सेक्टर है। वहां का उत्थान होगा, ऐसा मुझे लगता है।
रीना आर्या: आप लंबे समय से पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं, फिर भी हमेशा आप लो प्रोफाइल रहे हैं। जैसा कि अभी आपने बताया कि सेक्स वर्कर के प्रोग्राम में गए थे। कोई नेता जहां पर इन चीजों में शामिल होने से भी कई बार कतराते हैं?
बहुत बड़ी बात है यह कि आपने उन उन लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश करी तो क्या यह आपकी सोच समझकर अपनाई गई रणनीति है कि आप इतने बड़े बड़े काम करते हैं, लेकिन हमेशा लो प्रोफाइल रहते हैं?
किशोर मकवाणा: नहीं नहीं, मेरा तो स्वभाव ही यह है, क्योंकि कुर्सी मेरे पर कभी हावी होती ही नहीं। और दूसरा अगर माननीय हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी और हमारे राष्ट्रपति जी ने जब मुझे यह जिम्मेदारी दी है तो मेरा कर्तव्य है और यह तो अनुसूचित जाति के लोगों के लिए काम करने वाला आयोग है तो तो और हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
…तो हम हमने हमारे बीच में जो भी एक लक्ष्मण रेखा हमने हटा दी कि सामान्य से सामान्य पीड़ित जो भी है गरीब व्यक्ति वो मुझे मिल सकता है चेयरमैन को और उनका जो भी काम है हम सरलता से कर देते हैं
और आपको आश्चर्य होगा कि पहली बार आयोग ने लगभग 43,000 केस हमने क्लोज किए तो यह आयोग के इतिहास में पहली बार हुआ है और दूसरा लोगों को लगता है कि यह आयोग के कारण हमें न्याय मिलेगा।
रीना आर्या: क्या आपको कभी लगा कि कम सार्वजनिक उपस्थिति के कारण आपकी काम की पहुंच बहुत ज्यादा सीमित हो गई है?
किशोर मकवाणा: नहीं। क्या है कि मेरा एक जिम्मेदारी है। मेरा काम है कि यह आयोग का काम पूरा। मुझे जितना समय है, वह पूरा का पूरा हंड्रेड परसेंट मुझे देना है। तो इसलिए मैं पूरे मनोयोग से मुझे जितनी भी शक्ति है, वह पूरी शक्ति से लगाऊं काम में।
रीना आर्या: सर, क्या आने वाले समय में आप किसी नई पुस्तक या लेखन परियोजना पर काम कर रहे हैं।
किशोर मकवाणा: अभी तो मेरा एक ही काम है। आयोग का काम करना और ज्यादा से ज्यादा फाइलें पढ़ना। यही एक काम है।
रीना आर्या: आप पत्रकार भी रहे हैं तो पत्रकारिता के टाइम का कोई ऐसा अनुभव जो आपको आज भी याद आता हो?
किशोर मकवाणा: मेरे जीवन का बहुत मेरा सौभाग्य है कि जब आदरणीय प्रधानमंत्री, उस समय के अटल बिहारी वाजपेयी जी जब वह हिस्टोरिकल ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा उन्होंने प्रारम्भ की थी तो उस समय एक पत्रकार के नाते मुझे वहाँ जाने का सौभाग्य मिला था। वह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा, जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था। खास करके 8 से 9 का जो दौर था 6 दिसंबर वाला वो सभी 6 दिसंबर का जो हिस्टोरिकल ऐतिहासिक दिन है, उस दिन भी मैं वहीं पर था। एक पत्रकार के नाते तो मेरे जीवन में यह दो। एक तो लाहौर ऐतिहासिक बस में जाना और साथ साथ यह अयोध्या आंदोलन जब चरम पर था, उसका रिपोर्टिंग करना, यह सब मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
रीना आर्या: आज की युवा पीढ़ी तेजी से डिजिटल कंटेंट की तरफ बढ़ रही है। और आपको क्या लगता है कि ये बदलाव पारंपरिक साहित्य और पुस्तकों के लिए एक अवसर है या फिर चुनौती?
किशोर मकवाणा: नहीं, हर एक समय कालखंड में संसाधन बदलते रहते हैं, मगर युवाओं की सोच आगे बढ़ना नई नई जो टेक्नोलॉजी है, उसका उपयोग करना ये रहा है
वर्तमान समय में तो और एक अच्छी बात है कि उसके अंतःकरण में देश की भावना प्रज्वलित है। देश सामर्थ्यवान बने, देश महाशक्ति बने और देश का जो डंका है पूरी दुनिया में बजाना चाहिए। ये सोच भी आज के युवाओं में हो तो ये अच्छी बात है। दूसरा की अभी यहां एक बहुत बड़ा विश्व पुस्तक मेला लगा था। उसमें मैं गया था तो वहां मैंने देखा कि सबसे अधिक बहुत भीड़ थी और सबसे अधिक युवा थे और वह भी 15 साल से 30 की आयु वाले थे। तो मुझे नहीं लगता कि पुस्तकों की प्रति भी वह अनदेखा कर रहे हैं। ऐसा नहीं है। पुस्तक भी पढ़ता है और यह नई नई जो आई की टेक्नोलॉजी है, वह भी उतना ही उपयोग करता है वह।
रीना आर्या: क्या भविष्य में आपकी पुस्तकों पर आधारित कोई ऑनलाइन कोर्स, आर्काइव या डिजिटल लाइब्रेरी बनाने की ऐसी कोई परियोजना है?
किशोर मकवाणा: अभी तो मैंने सोचा नहीं है।
रीना आर्या: ठीक है। आपके अनुसार आज के भारत में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सबसे बड़ी आवश्यकता क्या है?
किशोर मकवाणा: बाबा साहब अंबेडकर ने कहा है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुता ये तीन होगी तो
सामाजिक न्याय तो अपने आप आ जाएगी। मगर सबसे महत्वपूर्ण जो बाबा साहब ने कहा वह है बंधुता। अगर समता है मगर समरसता नहीं है तो उसका कोई उपयोग नहीं।
मैं जो हूं वही आप है। मेरे अंदर जो ईश्वर है, वही आपमें ईश्वर है। तो एक समत्व का भाव आएगा। बंधुत्व का भाव आएगा तो समरसता के बिना समता, सामाजिक न्याय अधूरा है। वह सबसे महत्वपूर्ण। बाबासाहब अंबेडकर ने भी उन्होंने 1932 में ठक्कर बापा को एक पत्र लिखा है। पत्र बहुत लंबा है, बहुत बढ़िया पत्र है। मगर सबसे अंत में बाबासाहब अंबेडकर ने लिखा है कि कानून से सब हल नहीं होगा। जब तक प्रेम और आत्मीयता नहीं होगी। बिलकुल वैसे ही समता न्याय होगा। मगर बंधुता नही होगी। समरसता नहीं होगी तो उसका कोई मूल्य नहीं है। सामाजिक समता के लिए, सामाजिक न्याय के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है बंधुता, समरसता।
रीना आर्या: आने वाले वर्षों में आपका मिशन और दृष्टि क्या है? देश आपकी अगली भूमिका या योगदान से क्या उम्मीद रखता है?
किशोर मकवाणा: हमारा तो पहले से ही एक ही मिशन रहा है नेशन फर्स्ट। भारत आगे बढ़ना चाहिए। जो भी छोटा मोटा काम करें। लक्ष्य एक ही नेशन फर्स्ट। भारत सर्वोपरि बने। भारत माता की जय जयकार पूरे विश्व में गूंजे।
ये बहुत अच्छी बात है। आपको नहीं लगता कि डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर को विशेष रूप से आज भी सिर्फ एक दलित नेता के रूप में मान्यता ज्यादा मिली हुई है जबकि
वो हमारे देश के संविधान निर्माता है और हमारे देश के हर नागरिक को उन्होंने अधिकार दिया है। चाहे पुरुषों, औरतों कोई भी हो। तो ऐसे में उनके इतने बड़े योगदान को सिर्फ इस रूप में देखना कि वो एक दलित नेता रहे हैं या उनके योगदान को कमतर करके आंकना नहीं है।
किशोर मकवाणा: आपकी बात सही है। इसके लिए सभी जिम्मेदार हैं। जो अनुसूचित जाति के जो जितने भी ठेकेदार बन बैठे हैं, उन्होंने एक प्रकार से ऐसा वातावरण बना दिया की दलित दलितों के ही नेता है और इस बाहर के जो लोग मतलब अन्य जो समाज के लोग हैं उन्होंने भी यही माना की ये तो दलितों के नेता है तो इसके कारण एक सूर्य समान जो व्यक्तित्व है, एक वैश्विक स्तर का जो महान नेता है वो एक छोटे से वर्तुल में कैद हो गया। तो बाबा साहेब की जो प्रतिभा है वो एक तो वैश्विक स्तर की है
कि उन्होंने केवल देश के डेवलपमेंट के बारे में सोचा। भारत एक महाशक्ति बने। भारत का सर्वांगीण विकास हो वो उन्होंने सोचा।
मूकनायक जो उन्होंने 1920 में एक सामयिक प्रारंभ किया था, उसमें उन्होंने जापान का उदाहरण दिया है कि जापान में भी जाति व्यवस्था थी।
मगर जापान को जब लगा कि ये जाति व्यवस्था के कारण जापान पिछड़ रहा तो उन्होंने अपनी जाति व्यवस्था मिटा दी और जापान में रहने वाला प्रत्येक जापानी मेरा भाई है। ये भाव लेकर आगे बढ़े और 1920 में ही जापान पूरे संसार में समग्र विश्व में विकास की दौड़ में नंबर वन पहुंच गया। ये सब बाबा साहब अंबेडकर ने लिखा और बाद में वो लिखते हैं अपना जो हृदय की जो उद्देश्य है, उनका सपना है। वो लिखते हैं जापान की ये सारी बात लिखने के बाद की क्या भारत समग्र संसार में सर्वश्रेष्ठ नहीं बन सकता?
…तो बाबासाहब आंबेडकर का 1920 से एक ही सपना है कि भारत महाशक्ति बने और इसीलिए उन्होंने जब वह जल मंत्री थे, श्रम मंत्री थे, तब भी उन्होंने यह हमारी जो बड़ी बड़ी नदियां हैं और नदियों का लाखों गैलन पानी व्यर्थ सागर में बह जाता था तो उस पर डैम बनने चाहिए, ताकि देश में बिजली भी उत्पन्न हो और कृषि भी बढ़े और पीने का पानी भी रहे तो इसके लिए नदियों पर डैम बनना चाहिए। यह पहला विज़न बाबासाहेब अंबेडकर ने प्रस्तुत किया। तो ऐसे में आपको सैकड़ों उदाहरण बता सकता हूं कि…बाबा साहब अंबेडकर का एक ही सपना था भारत दुनिया में नंबर वन बने,सर्वश्रेष्ठ बने और राष्ट्रहित सर्वोपरि।यह उनका मंत्र था। मगर लोगों के सामने जान बूझकर यह उनका जो जीवन का एकमेव लक्ष्य था,एकमेव मंत्र था,वह लोगों के सामने आया ही नहीं। तो इस कारण बाबा साहब अंबेडकर एक ही में कैद हो गए।
रीना आर्या: तो आप मानते हैं कि राजनीतिक पार्टियों ने उनके एक वैश्विक योगदान को सिर्फ एक। सिर्फ दलित समाज तक सीमित करके रखा है।
राजनीतिक पार्टियों के अलावा भी बाकी जो सामाजिक संगठन, जो कुछ है, जिनका एक अलग उद्देश है, उनकी ठेकेदारी है, वह सबसे अधिक जिम्मेदार है। मैं आपको एक और उदाहरण
बताओ कि बाबा साहब की जो। सेकंड
पत्नी थी सविता अंबेडकर उन्होंने पुस्तक लिखी है।
उन्होंने लिखा है कि जब बाबा साहब अंबेडकर का देहावसान हुआ तब मैं चाहती थी कि दिल्ली में उनका जो निवास स्थान है,
जो घर है, वह एक म्यूजियम जैसा बनना चाहिए। वह लिखती है कि मैंने उस समय की सरकारें थी। उनको पत्र लिखा, किसी ने जवाब नहीं दिया
आगे वह लिखते हैं कि जितने भी दलित संगठन के थे, उन सभी मुखियाओं को मैंने लिखा। किसी ने ध्यान नहीं दिया। यह म्यूजियम कब बना?
रीना आर्या: कब?
किशोर मकवाणा: [00:18:15] जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने इस दिशा में प्रारंभ किया। मगर बाद में दो हज़ार 4 में और सरकार आई। काम बंद हो गया।
रीना आर्या:अच्छा।
किशोर मकवाणा: जो सविता अंबेडकर का जो सपना था,
वर्तमान हमारे जो प्रधानमंत्री हैं आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, उन्होंने वह सपना पूरा किया।
आज दिल्ली में जहां बाबासाहेब आंबेडकर ने अपनी अंतिम सांसे छोड़ी थी, उस पवित्र भूमि पर एक भव्य वैश्विक स्तर का बाबासाहब आंबेडकर का जो भव्य स्मारक है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने पूर्ण किया। तो बाबासाहब आंबेडकर का जो मिशन था, जो उनका उद्देश्य था, जो उनका सपना था और एक वैश्विक जो उनकी प्रतिभा थी, वो लोगों के सामने जान बूझकर कुछ लोगों ने नहीं आने दी।
रीना आर्या: समयधारा और देशभर के युवाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
किशोर मकवाणा: मेरा एक ही संदेश है कि आपकी जो भी बुद्धि शक्ति है वो समाज हित और देश के हित में करें। और हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई का एक सपना है।
कि दो हज़ार 47 का जो भारत है वो एक आत्मनिर्भर भारत बने। विकसित भारत बने तो इस दिशा में हम थोडा भी योगदान अलग अलग। अपनी जितनी भी शक्ति बुद्धि है वो करेंगे तो जरूर यह सपना पूरा होगा और भारत एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में पूरे संसार में जो हमारे मनीषियों का सपना है वो पूरा होगा।
रीना आर्या: [00:20:01] सर आज आपने अपने विचार जिस सरलता और स्पष्टता के साथ हमारे साथ शेयर करें, उसके लिए थैंक यू सो मच। आपके विचार ना केवल हमें प्रेरित करते हैं बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी एक रास्ता दिखाते हैं, उनके लिए गाइडेंस का काम करते हैं। हमारा प्रयास है की आपके सोच और आपके अनुभव अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। एक बार फिर आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
किशोर मकवाणा: बहुत बहुत धन्यवाद नमस्ते सर।
रीना आर्या: आपने अपने अनुभव, विचार और दृष्टि को जिस सरलता और स्पष्टता से हमारे साथ साझा किया, उसके लिए दिल से धन्यवाद।
किशोर मकवाणा: सभी को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्ते।
रीना आर्या: तो यह थे आदरणीय श्री किशोर मकवाना जी। बेहद सरल, शांत व्यक्तित्व के स्वामी और बेहद शिक्षित। हमारा प्रयास था की आप इनके बारे में, इनके जीवन के अनुभवों के बारे में, इनके विचारों और संघर्ष के बारे में जानें। आपको हमारा यह पॉडकास्ट एपिसोड कैसा लगा? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर दीजियेगा और इसी प्रकार की महान शख्सियतों से मिलने के लिए हमारे समयधारा यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूले।
क्यों महत्वपूर्ण है यह इंटरव्यू?
यह Ambedkar interview Samaydhara केवल एक इंटरव्यू नहीं बल्कि एक वैचारिक दृष्टिकोण है। इस NCSC Chairman Kishor Makwana Interview में अंबेडकर के विचारों को एक नए नजरिए से समझने की कोशिश की गई है।
सामाजिक न्याय पर क्या कहा?
इस NCSC Chairman Kishor Makwana Interview में उन्होंने कहा:
“सिर्फ समानता नहीं, बल्कि बंधुता और समरसता भी जरूरी है, तभी सामाजिक न्याय संभव है।”
Nation First पर जोर
इस Kishor Makwana Ambedkar interview में उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि हर व्यक्ति को अपनी क्षमता देशहित में लगानी चाहिए ताकि भारत एक विकसित राष्ट्र बन सके।
❓ FAQ
1. किशोर मकवाना कौन हैं?
किशोर मकवाणा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग(NCSC)के चेयरमैन और एक प्रसिद्ध लेखक हैं।
2. इस इंटरव्यू में अंबेडकर पर क्या कहा गया?
उन्होंने कहा कि अंबेडकर को केवल एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया है।
3. Ambedkar interview Samaydhara क्यों चर्चा में है?
क्योंकि इसमें दिए गए बयान नई बहस को जन्म दे रहे हैं।
4. इंटरव्यू का मुख्य विषय क्या है?
सामाजिक न्याय, अंबेडकर का विज़न और Nation First विचारधारा।
5. Samaydhara podcast Kishor Makwana कहाँ देख सकते हैं?
आप इसका पूरा वीडियो YouTube पर देख सकते हैं।
6. क्या यह इंटरव्यू विवादित है?
इसमें दिए गए विचार बहस को जन्म दे सकते हैं।
7. युवाओं के लिए क्या संदेश दिया गया?
देशहित में अपनी क्षमता का उपयोग करने का संदेश दिया गया।
आपकी क्या राय है?
क्या आप किशोर मकवाना के विचारों से सहमत हैं?
💬 कमेंट करके अपनी राय जरूर दें
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