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धोखेबाज शायरी : रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे…

जब हर साजिश के पीछे अपने ही निकलेंगे.....

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रिश्तों की दलदल से कैसे

निकलेंगे…

जब हर साजिश के पीछे अपने ही

निकलेंगे…

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दूरियाँ
तो पहले ही आ चुकी थी ज़माने में ,

कोरोना ने आकर
इल्ज़ाम अपने सर ले लिया ।

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मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैँ ,

हासिल कहाँ नसीब से होती हैं !

मगर वहाँ तूफान भी हार जाते हैं ,

जहाँ कश्तियाँ ज़िद पर होती हैँ !

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