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Guru Purnima 2020:आज गुरू पूर्णिमा पर है चंद्र ग्रहण,जानें कैसे-कितने बजे करें पूजा

साल 2018 और 2019 में भी गुरु पूर्णिमा के ही दिन चंद्र ग्रहण लगा था और अब 2020 में भी गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहाण लग रहा है...

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नई दिल्ली:इस वर्ष आषाढ़ महीने की गुरु पूर्णिमा 2020 (Guru Purnima 2020) 5 जुलाई,रविवार को है। बीते दो साल की तरह इस साल भी गुरू पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2020) है।

जी हां,निरंतर यह तीसरा वर्ष है जब गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima 2020) के दिन चंद्र ग्रहण भी लग रहा है।

गौरतलब है कि साल 2018 और 2019 में भी गुरु पूर्णिमा के ही दिन चंद्र ग्रहण लगा था और अब 2020 में भी गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहाण लग रहा है।

हिंदू धर्म में मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा दिन महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेद व्यास (Ved Vyas) का जन्म हुआ था।

महर्षि वेद व्यास संस्कृत भाषा के विद्वान थे। उनका पूरा नाम महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास अर्थात महर्षि वेद व्यास (Ved Vyas) है। वे चार वेदों के विख्याता थे।

महर्षि वेद व्यास को 18 पुराणों का रचयिता भी माना जाता है। वेदों के विभाजन का श्रेय महर्षि को ही जाता है और इसी कारण इनका नाम भी वेद व्यास पड़ा था।

कहा जाता है कि वेद व्यास आदिगुरू थे इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा (Vyas Purnima) भी कहा जाता है।

गुरु पूर्णिमा के दिन ही इस बार चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी है। गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा की जाती है।

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कब है गुरु पूर्णिमा-guru-purnima date

इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई रविवार को है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) कहा जाता है।

 

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गुरु पूर्णिमा पूजा का समय और शुभ मुहूर्तguru-purnima-2020-puja-shubh-muhurat-time

गुरु पूर्णिमा की तिथि: 5 जुलाई

गुरु पूर्णिमा प्रारंभ: 4 जुलाई 2020 को सुबह 11 बजकर 33 मिनट से

गुरु पूर्णिमा तिथि सामप्‍त: 5 जुलाई 2020 को सुबह 10 बजकर 13 मिनट तक

 

 

गुरु पूर्णिमा पर पूजा करने का तरीका या पूजा विधि-Guru Purnima Puja Vidhi

गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपन गोविंद दीयो मिलाय...इस श्लोक के माध्यम से गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है।

गुरु को ही वो मार्ग या माध्यम बताया गया है जिसके द्वारा व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में गुरु का विशेष महत्व माना गया है।

गुरु की पूजा को ईश्वर से भी पहले करने की बात कही गई है। गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन आप भी अपने गुरू की इस प्रकार पूजा कर सकते है:

1.सबसे पहले प्रात:काल उठकर स्नान कर लें और स्वच्छ वस्त्र पहन ले।

2.अब किसी चौकी पर सफेद कपड़े को बिछाकर घर के मंदिर में रख दें और उसपर 12-12 रेखाएं अंकित करके व्यास पीठ बना लें।

3.फिर इस मंत्र का जाप करें- ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’।

4.अब पूजा-अर्चना के बाद अपने गुरु या उनकी तस्वीर की पूजा-अर्चना कर लें।

5.यदि आपके गुरु आपके समक्ष ही है तो सर्वप्रथम उनके चरण स्पर्श करें और तिलक लगाकर फूल अपर्ण कर लें।

6.इसके बाद अपने गुरु को भोजन करा लें।

7.अब दक्षिणा दें और पांव छूकर उन्हें विदा करें।

गुरु पूर्णिमा के दिन आप किसी भी ऐसे शख्स की पूजा कर सकते है जिसे आप अपना गुरु मानते है।

जिसने आपको जीवन जीने की राह दिखाई हो, जो अज्ञान के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में आपको लाया हो।

जो प्रत्येक परिस्थिति में आपको सही राह दिखाता रहा हो।

फिर चाहे वो व्यक्ति आपके माता-पिता,,बच्चे हो, ऑफिस का बॉस, कोई दोस्त,गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड,पति/पत्नी,भाई-बहन या भी सास-ससुर ही क्यों न हो।

यदि आपके गुरु स्वर्णवासी हो गए है तो आप उनकी तस्वीर की पूजा विधिवत कर सकते है।

 

गुरु पूर्णिमा पर है चंद्र ग्रहण भी-guru-purnima-2020-puja-shubh-muhurat-vidhi-chandra-grahan

इस वर्ष 5 जुलाई गुरु पूर्णिमा 2020 पर चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan) भी है। इस बार चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan time) लगभग 2 घंटे 43 मिनट और 24 सेकेंड तक रहेगा।

गुरु पूर्णिमा 2020 (Guru Purnima 2020) के दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण 2020 (Chandra Grahan 2020)  सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर शुरू होगा और इसके बाद यह 9 बजकर 59 मिनट पर अपने अधिकतम प्रभाव में होगा और सुबह 11 बजकर 22 मिनट पर खत्म हो जाएगा।

इस प्रकार भारत में सूर्य उदय हो जाने के कारण यह चंद्र ग्रहण नहीं दिखेगा। यानि गुरु पूर्णिमा के दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण उपछाया मात्र है और इसी कारण इस चंद्र ग्रहण के दौरान सूतक काल(Sutak Kaal) भी नहीं लगेगगा।

 

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जानें कौन थे महर्षि वेद व्‍यास

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, विष्णु पुराण की रचना करने वाले ऋषि महर्षि पराशर एक सुंदर स्त्री सत्यवती पर एक बार मोहित हो गए।

सत्यवती एक मछुआरे की पुत्री थी और उसके शरीर से हमेशा मछली की गंध आती रहती थी। इसलिए सत्यवती को मत्स्यगंधा भी कहते थे।

यमुना नदी का भ्रमण करने के दौरान एक दिन ऋषि पराशर ने सत्यवती से उन्हें नदी पार ले जाने का आग्रह किया। सत्यवती ने उन्हे अपनी नाव में बैठा लिया।

ऋषि पराशर ने सत्यवती के समक्ष प्रणय निवेदन किया। तब सत्यवती ने निवेदन को सशर्त स्वीकार कर लिया। ऋषि पराशर सत्यवती के साथ संभोग करना चाहते थे और सत्यवती ने इसकी स्वीकृति तीन शर्तों के साथ दी थी

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पहला- कोई भी जीव सत्यवती और पराशर ऋषि को संभोग करते देख न पाएं।

इसलिए ऋषि ने इस शर्त को स्वीकार करके दैवीय शक्ति से एक द्वीप को बना दिया।

इस द्वीप पर घना कोहरा था और इस कारण इसे कोई देख नहीं सकता था।

दूसरा-सत्यवती ने अपनी दूसरी शर्त के तहत कहा कि उसके शरीर से मछली की गंध की जगह फूलों की सुगंध आने लगे। पराशर ऋषि ने इस शर्त को भी स्वीकार कर लिया

और सत्यवती की देह से फूलों की सुगंध आने लगी।

तीसरा- सत्यवती की तीसरी शर्त थी कि ऋषि से सहवास के बाद जब सत्यवती गर्भवती होगी तो उसका पुत्र कोई सामान्य नागरिक या मछुआरा नहीं

बल्कि महाविद्वान और महाज्ञानी होना चाहिए।

ऋषि ने इसे भी स्वीकार कर लिया और साथ ही आशीर्वाद दिया कि उनके साथ सहवास के बाद भी सत्यवती का कौमार्य बरकरार रहेगा।

कोहरे से भरे द्वीप पर सत्यवती और पराशर ने संभोग किया।

वक्त आने पर सत्यवती ने जिस पुत्र को जन्म दिया वो महाज्ञानी निकला।

सत्यवती-पराशर के इस पुत्र का रंग काला था, इसलिए इसका नाम कृष्ण रखा गया।

सत्यवती-पराशर का पुत्र कृष्ण ही आगे चलकर महर्षि वेद-व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुआ

जिसने महाकाव्य महाभारत की रचना की और चार वेदों का विस्तार व 18 महापुराणों और ब्रह्मसूत्र को भी लिखा।

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