
Table of Contents
Pitru Paksha 2026 : 4 अक्टूबर मातृ नवमी और 5 अक्टूबर दशमी श्राद्ध, आगे कौन सी तिथि किसके लिए?
पितृ पक्ष 2026 (Pitru Paksha 2026) अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध और मातृ नवमी, 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी और मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी।
इसलिए अगर आप जानना चाहते हैं कि किस तारीख को किस पूर्वज का श्राद्ध करना चाहिए, मातृ नवमी किसके लिए होती है, चतुर्दशी श्राद्ध किन लोगों के लिए किया जाता है और सर्वपितृ अमावस्या का क्या महत्व है, तो यह पूरी जानकारी आपके लिए है।
2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत को लेकर अलग-अलग कैलेंडरों में 26 और 27 सितंबर का अंतर दिखाई देता है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध और 27 सितंबर से नियमित कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा श्राद्ध मानी गई है। पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्राद्ध सामान्यतः उस तिथि पर किया जाता है जिस तिथि को संबंधित पूर्वज का निधन हुआ था। अगर मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या किसी कारण से नियमित तिथि पर श्राद्ध न हो सके, तो कई परंपराओं में सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है।
Pitru Paksha 2026 2026 कब तक है?
पितृ पक्ष 2026 का अंतिम दिन 10 अक्टूबर 2026, शनिवार है। इस दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालय अमावस्या मनाई जाएगी।
दिल्ली पंचांग के अनुसार 4 अक्टूबर को कृष्ण नवमी, 5 अक्टूबर को कृष्ण दशमी, 6 अक्टूबर को कृष्ण एकादशी, 7 अक्टूबर को कृष्ण द्वादशी, 8 अक्टूबर को कृष्ण त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को कृष्ण चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को अमावस्या रहेगी।
यानी आज 4 अक्टूबर 2026 से पितृ पक्ष के अंतिम सात दिनों का क्रम शुरू हो रहा है।
पितृ पक्ष 2026 की पूरी श्राद्ध तिथि सूची
नीचे Pitru Paksha 2026 का पूरा कैलेंडर दिया गया है, ताकि आपको एक ही जगह सभी प्रमुख श्राद्ध तिथियां मिल जाएं।
| तारीख | दिन | श्राद्ध |
|---|---|---|
| 26 सितंबर 2026 | शनिवार | पूर्णिमा श्राद्ध |
| 27 सितंबर 2026 | रविवार | प्रतिपदा श्राद्ध |
| 28 सितंबर 2026 | सोमवार | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | तृतीया श्राद्ध / महाभरणी |
| 30 सितंबर 2026 | बुधवार | चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध |
| 1 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्टूबर 2026 | शनिवार | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्टूबर 2026 | रविवार | नवमी श्राद्ध / मातृ नवमी |
| 5 अक्टूबर 2026 | सोमवार | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्टूबर 2026 | बुधवार | द्वादशी / मघा श्राद्ध |
| 8 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | चतुर्दशी श्राद्ध |
| 10 अक्टूबर 2026 | शनिवार | सर्वपितृ अमावस्या |
प्रमुख प्रकाशित पंचांग और समाचार रिपोर्टिंग भी 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक इसी क्रम की पुष्टि करती हैं।
4 अक्टूबर 2026: नवमी श्राद्ध और मातृ नवमी
4 अक्टूबर 2026 Pitru Paksha 2026 के सबसे भावनात्मक दिनों में से एक है, क्योंकि इस दिन नवमी श्राद्ध के साथ मातृ नवमी का विशेष महत्व माना जाता है।
मातृ नवमी को मुख्य रूप से दिवंगत माता और मातृ पक्ष की महिला पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध से जोड़ा जाता है। कई परिवारों में इस दिन मां, दादी, नानी या परिवार की अन्य दिवंगत महिला पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।
अगर किसी परिवार में मां का निधन हो चुका है और परिवार की परंपरा मातृ नवमी पर उनका श्राद्ध करने की है, तो 4 अक्टूबर उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन हो सकता है।
मातृ नवमी केवल मां का श्राद्ध क्यों नहीं है?
मातृ नवमी को केवल जन्म देने वाली मां तक सीमित नहीं माना जाता। कई पारंपरिक मान्यताओं में मातृ पक्ष की दिवंगत महिला पूर्वजों को भी इस दिन याद किया जाता है।
इसलिए इस दिन का भाव केवल कर्मकांड नहीं बल्कि मातृ शक्ति, त्याग, प्रेम और परिवार की जड़ों के प्रति कृतज्ञता से भी जुड़ा है।

मां अब हमारे बीच नहीं हैं तो मातृ नवमी क्यों खास है?
मां के जाने के बाद उनकी यादें परिवार के साथ रहती हैं। उनके संस्कार, उनकी बातें और उनके द्वारा सिखाई गई छोटी-छोटी बातें जीवन का हिस्सा बन जाती हैं।
मातृ नवमी ऐसे परिवारों के लिए अपनी मां को श्रद्धा से याद करने का अवसर है।
इस दिन श्राद्ध और तर्पण के साथ मां की तस्वीर के सामने दीपक जलाना, उनके नाम से भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता करना या उनके अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना भी भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
5 अक्टूबर 2026: दशमी श्राद्ध
5 अक्टूबर 2026, सोमवार को दशमी श्राद्ध होगा।
जिस पूर्वज का निधन दशमी तिथि को हुआ था, उनके लिए Pitru Paksha 2026 की दशमी तिथि पर श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है।
इस दिन परिवार अपने दिवंगत पूर्वज को श्रद्धापूर्वक याद कर सकता है और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म, तर्पण, पिंडदान और दान कर सकता है।
यह समझना जरूरी है कि श्राद्ध केवल किसी एक विशेष व्यक्ति की इच्छा से तय नहीं होता। पारंपरिक रूप से पूर्वज की मृत्यु तिथि को प्रमुख आधार माना जाता है।
6 अक्टूबर 2026: एकादशी श्राद्ध
6 अक्टूबर 2026, मंगलवार को एकादशी श्राद्ध होगा।
यदि किसी पूर्वज का निधन एकादशी तिथि को हुआ था, तो पितृ पक्ष में उनके लिए एकादशी श्राद्ध करने की परंपरा है।
एकादशी तिथि को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं हो सकती हैं, इसलिए यदि श्राद्ध की तिथि को लेकर परिवार में भ्रम है तो स्थानीय पंचांग और पुरोहित की सलाह लेना उचित रहेगा।
7 अक्टूबर 2026: द्वादशी और मघा श्राद्ध
7 अक्टूबर 2026, बुधवार को द्वादशी श्राद्ध के साथ मघा श्राद्ध का भी विशेष उल्लेख मिलता है।
मघा नक्षत्र का संबंध धार्मिक परंपराओं में पितरों से जोड़ा जाता है। इसलिए 7 अक्टूबर का दिन पितृ कर्म की दृष्टि से विशेष माना जाता है।
जिस पूर्वज का निधन द्वादशी तिथि को हुआ था, उनके लिए द्वादशी श्राद्ध किया जाता है।
इसके अलावा मघा नक्षत्र से जुड़ी परंपरा का पालन करने वाले परिवार इस दिन विशेष पितृ कर्म कर सकते हैं।
मघा श्राद्ध क्या है?
मघा नक्षत्र को पितरों से संबंधित नक्षत्रों में विशेष माना जाता है। इसी वजह से मघा श्राद्ध को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण बताया जाता है।
Pitru Paksha 2026 हालांकि किस परिवार को मघा श्राद्ध करना चाहिए और इसकी विधि क्या होगी, यह परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती है।
8 अक्टूबर 2026: त्रयोदशी श्राद्ध Pitru Paksha 2026
8 अक्टूबर 2026, गुरुवार को त्रयोदशी श्राद्ध होगा।
यदि किसी पूर्वज का निधन त्रयोदशी तिथि को हुआ था, तो उनके लिए इस दिन श्राद्ध किया जाता है।
पितृ पक्ष की इस तिथि पर भी तर्पण, श्राद्ध, दान और पूर्वजों के स्मरण की परंपरा है।
9 अक्टूबर 2026: चतुर्दशी श्राद्ध
9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को चतुर्दशी श्राद्ध होगा।
चतुर्दशी श्राद्ध को सामान्य मृत्यु तिथि वाले श्राद्ध से अलग एक विशेष महत्व दिया जाता है। कई धार्मिक परंपराओं में अकाल मृत्यु, दुर्घटना या असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त लोगों के लिए इस दिन श्राद्ध करने की बात कही जाती है।
इसी कारण चतुर्दशी श्राद्ध को कई जगह घायल या अकाल मृत्यु से जुड़े पूर्वजों के श्राद्ध के रूप में भी समझाया जाता है।
हालांकि इस विषय में परिवार और संप्रदाय की परंपरा महत्वपूर्ण है।

10 अक्टूबर 2026: सर्वपितृ अमावस्या
पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण अंतिम दिन है—
10 अक्टूबर 2026, शनिवार — सर्वपितृ अमावस्या।
इसे महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध करने की परंपरा है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं किया जा सका।
इसी वजह से सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या किसके लिए होती है?
सामान्य रूप से इस दिन—
- जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है
- जिनका श्राद्ध छूट गया है
- जिनके लिए परिवार अलग से श्राद्ध करना चाहता है
- ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों के सामूहिक स्मरण
के लिए श्राद्ध करने की परंपराएं मिलती हैं।
Pitru Paksha 2026 यही कारण है कि जिन लोगों को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि याद नहीं है, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध किस तिथि को करना चाहिए?
पितृ पक्ष में श्राद्ध को लेकर सबसे सामान्य नियम यही बताया जाता है कि जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ था, उसी तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध किया जाए।
उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष की दशमी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जा सकता है।
यही कारण है कि केवल तारीख देखकर श्राद्ध तय करना पर्याप्त नहीं है। मृत्यु की हिंदू तिथि जानना महत्वपूर्ण होता है।
यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो परिवार की परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या का सहारा लिया जा सकता है।
श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?
बहुत से लोग श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को एक ही समझते हैं, जबकि धार्मिक परंपरा में इनके अलग-अलग अर्थ और प्रक्रियाएं हैं।
श्राद्ध
Pitru Paksha 2026 श्रद्धा से पितरों को स्मरण करते हुए किए जाने वाले कर्म को सामान्य रूप से श्राद्ध कहा जाता है। इसमें संकल्प, तर्पण, भोजन, दान और अन्य पारंपरिक कर्म शामिल हो सकते हैं।
तर्पण
जल आदि अर्पित करके पितरों का स्मरण करना तर्पण कहलाता है। कई परंपराओं में जल में काले तिल का प्रयोग किया जाता है।
पिंडदान
पितरों के निमित्त पिंड अर्पित करने की परंपरा को पिंडदान कहा जाता है। इसकी विधि और सामग्री क्षेत्र एवं परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
पितृ पक्ष में तर्पण कैसे किया जाता है?
तर्पण की विधि अलग-अलग परंपराओं में अलग हो सकती है। सामान्य रूप से स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पितरों का स्मरण करते हुए संकल्प लिया जाता है।
Pitru Paksha 2026 कई परंपराओं में जल में काले तिल मिलाकर पितरों के निमित्त जल अर्पित किया जाता है। तर्पण के दौरान कुश के प्रयोग की परंपरा भी कई स्थानों पर मिलती है।
श्राद्ध की विस्तृत विधि और मंत्र परिवार, क्षेत्र, संप्रदाय और पुरोहित परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए जटिल कर्मकांड स्वयं अनुमान से करने के बजाय योग्य पुरोहित से विधि समझना बेहतर है।
पितृ पक्ष में किस दिशा की ओर मुख करके श्राद्ध किया जाता है?
धार्मिक परंपराओं में पितृ कर्म के समय दक्षिण दिशा को विशेष महत्व दिया जाता है। कई विधियों में दक्षिणाभिमुख होकर तर्पण या पितृ स्मरण किया जाता है।
हालांकि अलग-अलग कर्मों की दिशा और आसन की विधि अलग हो सकती है, इसलिए पूर्ण श्राद्ध विधि के लिए स्थानीय परंपरा का पालन करना चाहिए।
पितृ पक्ष में क्या दान करना चाहिए?
पितृ पक्ष में दान को श्रद्धा और सेवा से जोड़ा जाता है।
सामर्थ्य के अनुसार इन चीजों का दान किया जा सकता है—
- अन्न
- भोजन
- फल
- वस्त्र
- दैनिक उपयोग की वस्तुएं
- जरूरतमंदों की सहायता
- दक्षिणा
दान में सबसे महत्वपूर्ण भावना है श्रद्धा और सेवा, न कि दिखावा।
यदि परिवार की परंपरा में ब्राह्मण भोजन या अन्य विशेष दान की व्यवस्था है तो उसी के अनुसार किया जा सकता है।
क्या पितृ पक्ष में कौए को भोजन कराया जाता है?
कई परिवारों में पितृ पक्ष के दौरान कौए, गाय, कुत्ते या अन्य जीवों को भोजन कराने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यताओं में इसे पितरों के प्रति श्रद्धा से जोड़ा जाता है। हालांकि इसे धार्मिक विश्वास और परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भोजन स्वच्छ और सम्मानपूर्वक दिया जाए तथा किसी जीव को नुकसान न पहुंचे।
क्या पितृ पक्ष में गरीबों को भोजन करा सकते हैं?
हां, जरूरतमंदों को भोजन कराना या उनकी सहायता करना पितृ स्मरण की भावना से किया जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक क्षमता सीमित है तो भी वह अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, फल या अन्य उपयोगी वस्तु देकर सेवा कर सकता है।
पितृ पक्ष का उद्देश्य केवल बड़े कर्मकांड या खर्च से जुड़ा नहीं होना चाहिए। श्रद्धा, स्मरण और सेवा इसकी मूल भावना हैं।
क्या बेटी अपनी मां या पिता का श्राद्ध कर सकती है?
श्राद्ध कौन करेगा, इस विषय में अलग-अलग धार्मिक और पारिवारिक परंपराएं मौजूद हैं।
परंपरागत रूप से कई परिवारों में पुत्र को श्राद्ध का प्रमुख कर्ता माना गया है, लेकिन आज कई परिवारों में बेटियां भी अपने माता-पिता के लिए धार्मिक कर्म करती हैं।
यदि किसी परिवार में पुत्र नहीं है या बेटी अपने माता-पिता का श्राद्ध करना चाहती है, तो परिवार की परंपरा और स्थानीय पुरोहित की सलाह के अनुसार विधि अपनाना उचित है।
अगर मृत्यु की तिथि याद नहीं है तो कौन सा श्राद्ध करें?
यह पितृ पक्ष से जुड़े सबसे आम सवालों में से एक है।
यदि परिवार को पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि मालूम नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है। 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन ऐसे पितरों का स्मरण और श्राद्ध किया जा सकता है।
हालांकि किसी विशेष परिस्थिति में कौन-सी तिथि उचित होगी, यह जानने के लिए परिवार के पुरोहित से सलाह लेना बेहतर है।
अगर श्राद्ध की तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए तो क्या करें?
कभी-कभी यात्रा, बीमारी, जानकारी के अभाव या किसी अन्य कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाता।
ऐसी स्थिति में परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार आगे की उपयुक्त तिथि या सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा हो सकती है।
इसलिए यदि 4, 5, 6 या 7 अक्टूबर की निर्धारित तिथि निकल गई है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार किसी विद्वान या पुरोहित से अगली उचित तिथि पूछें।
क्या पितृ पक्ष में रोज तर्पण करना जरूरी है?
हर परिवार में रोज तर्पण करने की परंपरा नहीं होती।
कुछ लोग पूरे पितृ पक्ष में नियमित तर्पण करते हैं, जबकि कई परिवार केवल अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध और तर्पण करते हैं।
इसलिए रोज तर्पण करना अनिवार्य है, ऐसा सामान्य रूप से नहीं कहा जा सकता। परिवार की परंपरा और धार्मिक विधि के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।
पितृ पक्ष में कौन-कौन से दिन सबसे महत्वपूर्ण हैं?
2026 में विशेष रूप से इन दिनों पर ध्यान देना चाहिए—
29 सितंबर — महाभरणी श्राद्ध
4 अक्टूबर — मातृ नवमी
7 अक्टूबर — द्वादशी एवं मघा श्राद्ध
9 अक्टूबर — चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर — सर्वपितृ अमावस्या
इनमें से किस दिन आपके परिवार के लिए श्राद्ध महत्वपूर्ण है, यह पूर्वज की मृत्यु तिथि और परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।
Matru Navami 2026 : मां के लिए 4 अक्टूबर का दिन क्यों खास? जानें श्राद्ध विधि
पितृ पक्ष 2026 की आखिरी 7 तारीखें एक नजर में
अगर आपको केवल आने वाले दिनों का कैलेंडर देखना है, तो इसे सेव कर लें:
| तारीख | तिथि | किसके लिए |
|---|---|---|
| 4 अक्टूबर | नवमी | मातृ नवमी, दिवंगत मां एवं महिला पूर्वज |
| 5 अक्टूबर | दशमी | दशमी तिथि को दिवंगत पूर्वज |
| 6 अक्टूबर | एकादशी | एकादशी तिथि को दिवंगत पूर्वज |
| 7 अक्टूबर | द्वादशी | द्वादशी तिथि के पूर्वज + मघा श्राद्ध |
| 8 अक्टूबर | त्रयोदशी | त्रयोदशी तिथि को दिवंगत पूर्वज |
| 9 अक्टूबर | चतुर्दशी | विशेष रूप से अकाल/असामान्य मृत्यु से जुड़े श्राद्ध की परंपरा |
| 10 अक्टूबर | अमावस्या | सर्वपितृ अमावस्या — ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण |
यह तालिका 2026 के प्रकाशित श्राद्ध कैलेंडर और दिल्ली पंचांग के तिथि क्रम से मेल खाती है।
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार सादगीपूर्ण जीवन और सात्विक भोजन का पालन करते हैं। कुछ परिवार इस अवधि में शुभ मांगलिक कार्यों से भी दूरी रखते हैं।
आम तौर पर इन बातों का ध्यान रखा जाता है—
- दिखावे से बचें
- पितरों के नाम पर किए जाने वाले दान का अहंकार न करें
- परिवार की परंपरा का सम्मान करें
- अनावश्यक विवाद और क्रोध से बचें
- भोजन और धार्मिक सामग्री का अपमान न करें
- किसी जरूरतमंद को भोजन या सहायता देने में संकोच न करें
अलग-अलग समुदायों और परिवारों के नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी एक क्षेत्र की परंपरा को हर परिवार पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
पितृ पक्ष में भोजन को लेकर क्या सावधानी रखें?
पितृ पक्ष में कई परिवार सात्विक भोजन करते हैं। प्याज, लहसुन, मांसाहार या कुछ अन्य खाद्य पदार्थों से परहेज की परंपरा कुछ परिवारों में होती है।
लेकिन भोजन संबंधी नियम सार्वभौमिक नहीं हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा के अनुसार भोजन तैयार करना बेहतर है।
श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन को श्रद्धा से तैयार करना और जरूरतमंदों को भोजन कराना इस अवधि की सेवा भावना के अनुरूप माना जाता है।
क्या पितृ पक्ष केवल डर का समय है?
नहीं।
पितृ पक्ष को केवल डर, पितृ दोष या किसी अनहोनी से जोड़कर देखना उचित नहीं है।
इस अवधि का एक प्रमुख भाव अपने पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और परिवार की पिछली पीढ़ियों से जुड़ना है।
पितृ पक्ष हमें यह याद दिलाता है कि हमारा वर्तमान केवल हमारा अपना बनाया हुआ नहीं है। हमारे पीछे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और कई पीढ़ियों का योगदान है।
इसीलिए श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा है।
मातृ नवमी से सर्वपितृ अमावस्या तक क्या करें?
4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक पितृ पक्ष के अंतिम दिनों में सबसे जरूरी है कि आप अपने परिवार की निर्धारित श्राद्ध तिथि पहचानें।
अगर आपके किसी पूर्वज की मृत्यु नवमी को हुई थी, तो 4 अक्टूबर महत्वपूर्ण है।
अगर मृत्यु दशमी को हुई थी, तो 5 अक्टूबर।
इसी तरह आगे तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
और अगर मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या कई पूर्वजों का सामूहिक स्मरण करना है, तो 10 अक्टूबर सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण दिन है।
2026 में पितृ पक्ष का सबसे भावनात्मक संदेश
पितृ पक्ष का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह हमें उन लोगों को याद करने का मौका देता है जो आज हमारे साथ नहीं हैं।
4 अक्टूबर की मातृ नवमी खास तौर पर उन लोगों के लिए भावुक दिन हो सकती है जिन्होंने अपनी मां को खो दिया है।
मां की आवाज, उनका खाना, उनकी डांट, उनका प्यार, उनके हाथ का स्पर्श—ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें समय भी मिटा नहीं सकता।
इसलिए अगर इस साल मातृ नवमी पर आपकी मां आपके साथ नहीं हैं, तो उनके लिए कुछ पल जरूर निकालिए।
उनकी तस्वीर के सामने दीपक जलाइए।
उनकी कोई पुरानी बात याद कीजिए।
परिवार के साथ उनकी यादें साझा कीजिए।
और यदि संभव हो तो किसी जरूरतमंद की मदद उनके नाम से कीजिए।
क्योंकि मां को याद करने के लिए केवल कर्मकांड ही जरूरी नहीं—उनके संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना भी एक बड़ी श्रद्धांजलि है।
10 अक्टूबर के बाद क्या होगा?
10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष समाप्त होगा।
इसके अगले दिन 11 अक्टूबर 2026 से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी। दिल्ली पंचांग में भी 11 अक्टूबर को शुक्ल प्रतिपदा के साथ शारद नवरात्रि का उल्लेख है।
यानी 10 अक्टूबर को पितृ पक्ष का समापन होने के बाद 11 अक्टूबर से नवरात्रि का धार्मिक उत्सव शुरू हो जाएगा।
यह समय भारतीय धार्मिक कैलेंडर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर हम पूर्वजों को श्रद्धांजलि देकर पितृ पक्ष का समापन करते हैं और उसके बाद शक्ति उपासना के पर्व नवरात्रि में प्रवेश करते हैं।
Pitru Paksha 2026: सबसे जरूरी बातें एक नजर में
पितृ पक्ष की शुरुआत: 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध; 27 सितंबर से नियमित प्रतिपदा श्राद्ध
मातृ नवमी: 4 अक्टूबर 2026
दशमी श्राद्ध: 5 अक्टूबर 2026
एकादशी श्राद्ध: 6 अक्टूबर 2026
द्वादशी और मघा श्राद्ध: 7 अक्टूबर 2026
त्रयोदशी श्राद्ध: 8 अक्टूबर 2026
चतुर्दशी श्राद्ध: 9 अक्टूबर 2026
सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026
नवरात्रि आरंभ: 11 अक्टूबर 2026
अंतिम बात: श्राद्ध में तारीख से ज्यादा जरूरी है श्रद्धा
पितृ पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—श्रद्धा।
किसी भी श्राद्ध कर्म को केवल डर या सामाजिक दबाव में करने के बजाय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना से करना चाहिए।
अगर आपके परिवार में 4 अक्टूबर को मातृ नवमी पर मां का श्राद्ध होता है, तो यह दिन उनके स्मरण का अवसर है।
अगर 5 से 9 अक्टूबर के बीच आपके किसी पूर्वज की निर्धारित तिथि आती है, तो उसी दिन पारिवारिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध करें।
और अगर किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो 10 अक्टूबर 2026 की सर्वपितृ अमावस्या आपके लिए विशेष महत्व रखती है।
पितृ पक्ष हमें अपने अतीत से जोड़ता है और यह याद दिलाता है कि जिन लोगों ने हमें जीवन दिया, उनके प्रति कृतज्ञता केवल एक दिन की नहीं होती।
मां हों या पिता, दादा-दादी हों या नाना-नानी—उनकी यादों को सम्मान देना ही पितृ पक्ष की सबसे बड़ी भावना है।
नोट: श्राद्ध की तिथि, मुहूर्त और विधि स्थान, सूर्योदय, पंचांग तथा पारिवारिक/क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार बदल सकती है। ऊपर दी गई तारीखें 2026 के प्रकाशित पंचांग/कैलेंडर के अनुसार हैं; किसी विशेष श्राद्ध के लिए स्थानीय पंचांग और योग्य पुरोहित से अंतिम पुष्टि करना उचित है।
आपको यह खबर कैसी लगी?
अगर आपको यह जानकारी पसंद आई है, तो इसे अपने WhatsApp दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें।
ऐसी ही और ताज़ा खबरों के लिए 'समयधारा' (Samaydhara) से जुड़े रहें।




