
BRICS Summit 2026 Live Updates: दिल्ली में मोदी-शी-पुतिन की बड़ी मुलाकात, चीन-रूस पर दुनिया की नजर, जानिए हर बड़ा अपडेट
BRICS Summit 2026 Live Updates: नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आगाज हो चुका है।
12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन में दुनिया की निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर टिकी हैं।
इस बार BRICS की बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष, ऊर्जा संकट, वैश्विक व्यापार तनाव और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से गुजर रही है।
सबसे बड़ी खबर यह है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही नई दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अहम द्विपक्षीय वार्ता कर चुके हैं।
चीन और रूस दोनों के साथ भारत के संबंध इस BRICS Summit की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल हैं।
BRICS Summit 2026: आज दिल्ली में क्या हो रहा है?
भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वां BRICS Summit नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का पहला दिन वैश्विक शासन, बहुपक्षवाद, आर्थिक सहयोग, व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और मौजूदा युद्धों जैसे मुद्दों पर केंद्रित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के शुरुआती सत्र में Global South की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि विकासशील देश वैश्विक संकटों की अग्रिम पंक्ति में हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका अभी भी सीमित है। (ThePrint)
BRICS अब केवल भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित समूह नहीं है। विस्तार के बाद इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं। इस विस्तार ने समूह का आर्थिक और भू-राजनीतिक वजन काफी बढ़ाया है।
सबसे बड़ा अपडेट: शी जिनपिंग दिल्ली पहुंचे
BRICS Summit से पहले सबसे ज्यादा चर्चा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर रही। शी जिनपिंग 12 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे। यह उनकी 2019 के बाद भारत की पहली यात्रा है। उनका भारत आगमन ऐसे समय हुआ है जब भारत और चीन के बीच संबंधों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
शी जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने पर उनका रेड कार्पेट स्वागत किया गया और पारंपरिक भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए उनका स्वागत हुआ।
अब सबसे बड़ा सवाल है—क्या मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात भारत-चीन संबंधों में नया अध्याय शुरू कर सकती है?
दोनों नेताओं की प्रस्तावित बैठक को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद ने दोनों देशों के संबंधों को काफी प्रभावित किया है।
मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात: किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच शनिवार शाम द्विपक्षीय मुलाकात प्रस्तावित है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच बातचीत में भारत-चीन संबंध, व्यापार, सीमा से जुड़े मुद्दे और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषय प्रमुख हो सकते हैं। (Navbharat Times)
यह मुलाकात इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत और चीन ने 2024 के बाद सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
दोनों देशों के बीच सैन्य disengagement की प्रक्रिया के बाद सीधी उड़ानों की बहाली, व्यापारिक गतिविधियों में सुधार और वीजा प्रक्रियाओं में कुछ आसानी जैसे कदम उठाए गए हैं। हालांकि सीमा पर सैन्य तैनाती और अरुणाचल प्रदेश जैसे मुद्दे अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं।
भारत-चीन व्यापार भी बड़ा मुद्दा
भारत और चीन के बीच व्यापार संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं। चीन वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के सबसे बड़े आयात स्रोतों में रहा और भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर के सामान का आयात किया। इसमें भारतीय उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण कई घटक शामिल हैं।
यही वजह है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव के बावजूद आर्थिक संबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
भारत की चिंता व्यापार घाटे, संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश, तकनीकी निर्भरता और सीमा सुरक्षा को लेकर बनी हुई है।
क्या भारत-चीन संबंधों में सचमुच बड़ा बदलाव आएगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच संवाद की इच्छा को दिखाती है, लेकिन एक बैठक से सभी विवाद खत्म नहीं हो सकते।
भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है—सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना रिश्तों को पूरी तरह सामान्य करना मुश्किल है।
वहीं चीन की तरफ से भी भारत के साथ संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखने की बात कही गई है। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि चीन भारत के साथ मतभेदों को उचित तरीके से संभालते हुए दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी और सहयोगी के रूप में आगे बढ़ाने को तैयार है।
इसलिए मोदी-शी बैठक को किसी अंतिम समझौते से ज्यादा भारत-चीन रिश्तों को स्थिर करने की दिशा में एक और कदम के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
अब बात रूस की: मोदी-पुतिन मुलाकात में क्या हुआ?
BRICS Summit से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता हुई।
भारत सरकार के अनुसार दोनों नेताओं ने राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, कौशल विकास और लोगों के बीच संपर्क सहित कई क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की।
दोनों नेताओं की यह 2026 में दूसरी बैठक थी। इससे पहले वे 31 अगस्त को बिश्केक में SCO Summit के दौरान मिले थे।
मोदी और पुतिन ने भारत में पहली बार आयोजित INNOPROM India प्रदर्शनी का भी दौरा किया। यह प्रदर्शनी 9 से 11 सितंबर 2026 के बीच आयोजित हुई और इसका उद्देश्य भारत-रूस औद्योगिक सहयोग को मजबूत करना था।
भारत-रूस व्यापार का बड़ा लक्ष्य: 2030 तक 100 अरब डॉलर
मोदी-पुतिन वार्ता से निकलने वाली सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक खबरों में भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य शामिल है।
दोनों देश मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे, परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग पहले से ही मजबूत है। अब दोनों देश व्यापार को केवल तेल और गैस तक सीमित रखने के बजाय व्यापक औद्योगिक साझेदारी की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।
रूस के साथ परमाणु ऊर्जा सहयोग भी महत्वपूर्ण
भारत और रूस के संबंधों में परमाणु ऊर्जा लंबे समय से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।
ताजा चर्चाओं में भारत में रूस की मदद से एक और परमाणु ऊर्जा संयंत्र की संभावित स्थापना को लेकर भी ध्यान दिया गया है। इसके साथ ही ऊर्जा, रक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावना पर चर्चा हुई।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बनने वाली है।
यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख
BRICS Summit ऐसे समय हो रहा है जब यूक्रेन युद्ध अभी भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
रूस BRICS के भीतर अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग लंबे समय से करता रहा है।
भारत का रुख हालांकि संतुलित रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के साथ बातचीत में भी यह दोहराया कि संघर्षों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। भारत ने शांति प्रयासों में योगदान देने की अपनी इच्छा भी दोहराई है।
यही संतुलन BRICS में भारत की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक ताकत है।
पुतिन ने मोदी को रूस आने का निमंत्रण दिया
मोदी-पुतिन मुलाकात में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।
राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस आने का निमंत्रण दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। यात्रा की तारीखें दोनों देशों के राजनयिक चैनलों के जरिए तय की जाएंगी।
इससे साफ है कि भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी अभी भी दोनों देशों की विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
BRICS में चीन और रूस की क्या भूमिका है?
BRICS के भीतर चीन और रूस दो बेहद प्रभावशाली शक्तियां हैं।
चीन समूह की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक है, जबकि रूस ऊर्जा, सैन्य शक्ति और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दोनों देश लंबे समय से एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो और Global South तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिले।
लेकिन भारत की रणनीति इससे थोड़ी अलग है।
भारत BRICS को किसी पश्चिम-विरोधी सैन्य या राजनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहता। प्रधानमंत्री मोदी ने भी BRICS को उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज मजबूत करने वाले मंच के रूप में पेश किया है।
BRICS में डॉलर को लेकर क्या चर्चा है?
BRICS देशों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की मांग लगातार बढ़ी है।
रूस और चीन विशेष रूप से डॉलर पर निर्भरता कम करने के समर्थक रहे हैं। इस Summit में भी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दे चर्चा में हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि BRICS ने डॉलर को तुरंत हटाने का कोई फैसला कर लिया है।
व्यावहारिक तौर पर BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्रा व्यापार बढ़ाना एक लंबी प्रक्रिया होगी।
BRICS Joint Declaration पर बड़ी खबर
BRICS Summit के बीच एक महत्वपूर्ण खबर यह भी सामने आई है कि सदस्य देशों के बीच Joint Declaration पर सहमति बन गई है।
Reuters के अनुसार घोषणा में किसी एक देश का नाम लेकर आलोचना करने की संभावना कम है। इसमें एकतरफा युद्ध या सैन्य कार्रवाई की निंदा की जा सकती है। साथ ही IMF, World Bank और WTO जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग को प्रमुखता मिल सकती है।
यह घोषणा BRICS की एकता के लिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि समूह में शामिल देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं।
पश्चिम एशिया का युद्ध भी BRICS के एजेंडे में
इस बार BRICS Summit का सबसे कठिन मुद्दा पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष है।
ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि UAE भी समूह में शामिल है। क्षेत्रीय संघर्ष ने BRICS देशों के बीच मतभेदों को भी सामने ला दिया है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि भारत के ऊर्जा आयात, समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पश्चिम एशिया की स्थिति का सीधा प्रभाव पड़ता है।
भारत की कोशिश है कि BRICS युद्ध के बजाय संवाद, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे मुद्दों पर साझा रुख विकसित करे।
भारत के लिए BRICS Summit इतना महत्वपूर्ण क्यों?
भारत के लिए यह Summit केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है।
यह भारत को एक साथ कई शक्तियों के साथ संवाद का अवसर देता है।
एक तरफ भारत के रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंध हैं।
दूसरी तरफ चीन के साथ सीमा विवाद और आर्थिक संबंध दोनों मौजूद हैं।
वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ भारत की रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी भी लगातार मजबूत हुई है।
ऐसे में भारत का लक्ष्य किसी एक खेमे में जाना नहीं बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र रणनीतिक विकल्प बनाए रखना है।
मोदी के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस Summit में सबसे बड़ी चुनौती BRICS के भीतर अलग-अलग देशों के हितों के बीच संतुलन बनाने की होगी।
चीन और रूस चाहते हैं कि BRICS वैश्विक वित्तीय और राजनीतिक व्यवस्था में ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभाए।
भारत चाहता है कि BRICS Global South की आवाज बने लेकिन इसे किसी एक देश या पश्चिम-विरोधी एजेंडे का मंच न बनाया जाए।
ईरान और UAE के बीच क्षेत्रीय तनाव भी एक अलग चुनौती है।
ऐसे में भारत की अध्यक्षता की असली परीक्षा यह होगी कि क्या सभी सदस्य देश साझा घोषणापत्र पर सहमति कायम रख पाते हैं।
BRICS Summit में व्यापार और निवेश पर जोर
BRICS की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ रही है।
इसलिए इस Summit में केवल युद्ध और राजनीति ही मुद्दा नहीं हैं।
व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, AI, ऊर्जा, critical minerals, supply chains और खाद्य सुरक्षा जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हैं।
वैश्विक supply chains में बढ़ते तनाव के बीच BRICS देश वैकल्पिक व्यापार मार्ग और आर्थिक साझेदारी विकसित करना चाहते हैं।
भारत के लिए यह manufacturing और technology sectors में निवेश आकर्षित करने का अवसर भी है।
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चीन के लिए भारत क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन के लिए भारत केवल पड़ोसी देश नहीं बल्कि दुनिया की बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
भारत का विशाल बाजार, बढ़ता manufacturing sector और Global South में बढ़ता प्रभाव चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
वहीं भारत चीन से electronics, machinery, chemicals और industrial components सहित कई उत्पाद आयात करता है।
इसलिए दोनों देशों के बीच तनाव कम होने से व्यापार और निवेश के नए अवसर बन सकते हैं।
लेकिन भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में चीनी कंपनियों को लेकर अभी भी सावधानी बरत रहा है।
रूस के लिए भारत क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस के लिए भारत लंबे समय से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है।
रक्षा क्षेत्र के अलावा अब ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे, critical minerals और व्यापार में सहयोग बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने उसके वैश्विक आर्थिक रिश्तों को बदल दिया है। ऐसे समय में भारत जैसे बड़े बाजार के साथ मजबूत आर्थिक संबंध रूस के लिए महत्वपूर्ण हैं।
भारत भी रूस के साथ अपने संबंधों को इसलिए बनाए रखना चाहता है क्योंकि रूस रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक क्षेत्रों में लंबे समय से महत्वपूर्ण साझेदार रहा है।
चीन और रूस के बीच बढ़ता तालमेल भारत के लिए क्या मायने रखता है?
यह सवाल भी BRICS Summit के दौरान काफी महत्वपूर्ण है।
चीन और रूस के बीच रणनीतिक संबंध पिछले वर्षों में मजबूत हुए हैं। दोनों देश पश्चिमी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की मांग करते रहे हैं।
भारत दोनों के साथ संबंध रखता है लेकिन भारत की रणनीति अलग है।
भारत रूस के साथ पारंपरिक रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों को संभाल रहा है।
यही कारण है कि मोदी की पुतिन और शी जिनपिंग दोनों से बातचीत को दुनिया इतनी बारीकी से देख रही है।
क्या BRICS अमेरिका के खिलाफ गठबंधन बन रहा है?
यह दावा करना सही नहीं होगा कि BRICS कोई NATO जैसा सैन्य गठबंधन बन चुका है।
BRICS की सदस्य अर्थव्यवस्थाओं और राजनीतिक व्यवस्थाओं में काफी अंतर है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है।
ईरान और UAE के क्षेत्रीय हित कई मामलों में अलग हैं।
रूस और पश्चिम के बीच गंभीर टकराव है।
इसके बावजूद ये देश आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर एक मंच साझा कर रहे हैं।
यही BRICS की ताकत भी है और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
BRICS 2026: 20 साल पूरे, लेकिन अगली दिशा क्या?
इस वर्ष BRICS अपने गठन के 20 वर्ष पूरे कर रहा है।
2006 में शुरुआत के समय समूह में चार प्रमुख देश थे। आज इसका विस्तार काफी हो चुका है और इसके partner countries को जोड़ने पर इसका प्रभाव और व्यापक हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी BRICS के 20 वर्ष पूरे होने का उल्लेख किया है।
अब BRICS के सामने सवाल यह है कि अगले 20 वर्षों में वह केवल एक संवाद मंच रहेगा या वास्तव में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली बड़ी संस्था बनेगा।
दिल्ली में हाई सिक्योरिटी, दुनिया की नजर BRICS पर
BRICS Summit के कारण नई दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है तथा प्रमुख क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है। Summit के कारण राजधानी में ट्रैफिक और एयरस्पेस से जुड़े प्रतिबंध भी लागू किए गए हैं।
दुनिया के तीन महत्वपूर्ण नेता—मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग—एक ही समय दिल्ली में हैं। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था भी अभूतपूर्व स्तर पर रखी गई है।
आज की सबसे बड़ी 10 BRICS Updates
| अपडेट | स्थिति |
|---|---|
| BRICS Summit | नई दिल्ली में शुरू |
| भारत की भूमिका | 2026 में BRICS अध्यक्ष |
| शी जिनपिंग | दिल्ली पहुंच चुके हैं |
| शी की भारत यात्रा | 2019 के बाद पहली |
| मोदी-शी बैठक | प्रस्तावित/आज होने की उम्मीद |
| पुतिन-मोदी बैठक | हो चुकी |
| भारत-रूस व्यापार | 2030 तक 100 अरब डॉलर लक्ष्य |
| भारत-रूस सहयोग | रक्षा, ऊर्जा, परमाणु, रेलवे, उद्योग |
| BRICS Declaration | सदस्य देशों में सहमति की खबर |
| मुख्य मुद्दे | युद्ध, व्यापार, ऊर्जा, Global South, वित्तीय सुधार |
आगे क्या होने वाला है?
BRICS Summit का दूसरा दिन और भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
सबसे ज्यादा नजर प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत के परिणाम पर रहेगी।
यदि दोनों देश सीमा पर शांति, व्यापार और आर्थिक संवाद को आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस दिशा तय करते हैं तो यह भारत-चीन संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत होगा।
दूसरी तरफ भारत-रूस आर्थिक साझेदारी में यदि नए समझौते सामने आते हैं तो इससे दोनों देशों के रिश्तों को नई आर्थिक गति मिल सकती है।
इसके अलावा BRICS Joint Declaration यह बताएगा कि 11 सदस्य देश यूक्रेन, पश्चिम एशिया, व्यापार, वित्तीय व्यवस्था और Global South के मुद्दों पर कितनी साझा भाषा तैयार कर पाते हैं।
BRICS Summit 2026: भारत के लिए असली जीत क्या होगी?
भारत के लिए इस Summit की असली सफलता केवल किसी घोषणा या समझौते में नहीं होगी।
भारत के लिए बड़ी उपलब्धि यह होगी कि वह एक साथ—
रूस के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करे,
चीन के साथ तनाव कम करे,
Global South की आवाज को मजबूत करे,
व्यापार और निवेश बढ़ाए,
ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करे,
और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रखे।
यही भारत की वर्तमान विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है।
BRICS 2026 में भारत के पास दुनिया को यह दिखाने का अवसर है कि वह केवल किसी बड़े शक्ति समूह का हिस्सा नहीं है, बल्कि खुद एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति और स्वतंत्र रणनीतिक केंद्र बन चुका है।
निष्कर्ष
BRICS Summit 2026 सिर्फ दिल्ली में होने वाली एक बैठक नहीं है। यह बदलती हुई विश्व व्यवस्था का एक बड़ा मंच है।
एक तरफ रूस यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी दबाव के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहता है।
दूसरी तरफ चीन Global South और BRICS की आर्थिक भूमिका को बढ़ाने के साथ भारत के साथ रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रहा है।
भारत इन दोनों शक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका को मजबूत करना चाहता है।
शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत आना, पुतिन की मोदी के साथ महत्वपूर्ण बातचीत, BRICS में स्थानीय मुद्राओं के व्यापार की चर्चा, वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग और Joint Declaration पर सहमति—ये सभी घटनाक्रम बताते हैं कि BRICS अब विश्व राजनीति में एक तेजी से महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
लेकिन असली परीक्षा घोषणाओं के बाद होगी।
क्या भारत-चीन संबंध वास्तव में स्थिर होते हैं?
क्या भारत-रूस व्यापार 2030 तक 100 अरब डॉलर के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ता है?
क्या BRICS युद्धों और वैश्विक संकटों पर साझा रुख बना पाता है?
और क्या BRICS वास्तव में Global South को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा ताकत दिला पाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले घंटों और दिनों में सामने आएंगे।
BRICS Summit 2026 से जुड़ी बड़ी घोषणाओं, मोदी-शी जिनपिंग बैठक, भारत-रूस समझौतों और Joint Declaration के हर महत्वपूर्ण अपडेट पर नजर बनी हुई है।
यह लाइव अपडेट लेख 12 सितंबर 2026 को उपलब्ध ताजा सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। जैसे-जैसे आधिकारिक घोषणाएं सामने आएंगी, खबर में नए अपडेट जोड़े जा सकते हैं।
नोट: ऊपर दिए गए अपडेट में मैंने अपुष्ट बातों को तथ्य के रूप में नहीं लिखा है—खासकर मोदी-शी जिनपिंग की बैठक के मामले में, क्योंकि उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में बैठक को प्रस्तावित/निर्धारित बताया गया है, उसका परिणाम अभी उपलब्ध नहीं था।
FAQ
Q1. BRICS Summit 2026 कहां आयोजित हो रहा है?
BRICS Summit 2026 का आयोजन भारत की राजधानी नई दिल्ली में हो रहा है।
Q2. BRICS Summit 2026 में कौन-कौन से प्रमुख नेता शामिल हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रमुख नेताओं में शामिल हैं।
Q3. शी जिनपिंग की भारत यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
शी जिनपिंग की यह 2019 के बाद भारत की पहली यात्रा है। ऐसे समय में उनका दिल्ली आना महत्वपूर्ण है जब भारत-चीन संबंधों में सीमा तनाव के बाद धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
Q4. मोदी और शी जिनपिंग की बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हो सकती है?
भारत-चीन सीमा, व्यापार, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दे प्रमुख हो सकते हैं।
Q5. मोदी-पुतिन बैठक में क्या चर्चा हुई?
दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष और औद्योगिक सहयोग सहित कई मुद्दों पर चर्चा की।
Q6. भारत और रूस ने व्यापार को लेकर क्या लक्ष्य रखा है?
दोनों देशों का लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाना है।
Q7. क्या BRICS डॉलर को खत्म करना चाहता है?
BRICS देशों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा होती रही है, लेकिन इसे डॉलर को तुरंत खत्म करने का फैसला नहीं माना जा सकता।
Q8. BRICS Summit 2026 भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए यह रूस, चीन और Global South के साथ संबंध मजबूत करने तथा वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका को बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर है।
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