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Paryushan Parv 2026 महत्व और श्वेताम्बर/तेरापंथी/दिगंबर सभी की पर्युषण तारीख की सटीक जानकारी

Paryushan Parv 2026 की तारीख , 8 दिन के श्वेतांबर पर्युषण, 10 दिन के दशलक्षण पर्व, संवत्सरी, नियम और धार्मिक महत्व की पूरी जानकारी पढ़ें।

Paryushan Parv 2026 की तारीख , 8 दिन के श्वेतांबर पर्युषण, 10 दिन के दशलक्षण पर्व, संवत्सरी, नियम और धार्मिक महत्व की पूरी जानकारी पढ़ें।

पर्युषण पर्व 2026 कब से शुरू? जानें तारीख, महत्व, नियम और जैन धर्म में इसका धार्मिक महत्व

Paryushan Parv 2026 Date: जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व 2026 में सितंबर महीने में मनाया जाएगा। हालांकि, यहां एक जरूरी बात समझना बेहद महत्वपूर्ण है—जैन धर्म के अलग-अलग संप्रदायों में पर्युषण/दसलक्षण पर्व की तिथियां और अंतिम क्षमा दिवस एक समान नहीं होते।

श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण 8 दिनों का होता है, जबकि दिगंबर परंपरा में इसी काल से जुड़ा दशलक्षण महापर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है।

जैन धर्म के पर्युषण महापर्व-संवत्सरी के बारें में जाने सब कुछ 

वहीं Paryushan Parv 2026 श्वेतांबर समाज के भीतर भी मूर्तिपूजक, स्थानकवासी और तेरापंथ परंपराओं में संवत्सरी की तिथि को लेकर अंतर देखने को मिलता है।

2026 में श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के अनुसार पर्युषण 8 सितंबर से 15 सितंबर तक रहेगा और 15 सितंबर को संवत्सरी मनाई जाएगी।

दूसरी ओर दिगंबर परंपरा के लिए उपलब्ध पंचांगों में दशलक्षण पर्व की शुरुआत 15/16 सितंबर के आसपास बताई गई है, इसलिए स्थानीय दिगंबर संघ के पंचांग के अनुसार तिथि की पुष्टि करना उचित है। (Jain Center of Northern California)


पर्युषण पर्व 2026 की तारीखें एक नजर में

जैन परंपरापर्व2026 की प्रमुख तिथिअवधि
श्वेतांबर मूर्तिपूजकपर्युषण महापर्व8–15 सितंबर8 दिन
श्वेतांबर मूर्तिपूजकसंवत्सरी15 सितंबरअंतिम दिन
स्थानकवासी/तेरापंथपर्युषण एवं संवत्सरीस्थानीय संघ/पंचांग के अनुसार पुष्टि आवश्यक8 दिन
दिगंबरदशलक्षण महापर्व15/16 सितंबर से आगे10 दिन
दिगंबरक्षमावाणीदशलक्षण के बाद1 दिन

2026 की उपलब्ध जैन पंचांग-सूचनाओं में श्वेतांबर मूर्तिपूजक पर्युषण की तिथि 8 से 15 सितंबर स्पष्ट रूप से दी गई है।

दिगंबर दशलक्षण के लिए अलग-अलग कैलेंडरों में 15 सितंबर से 24 सितंबर अथवा 16 सितंबर से 25 सितंबर तक की गणना मिलती है। इसका कारण तिथि-गणना और स्थानीय पंचांग परंपरा का अंतर है।

Paryushan Parv 2026
Paryushan Parv 2026

श्वेतांबर मूर्तिपूजक समाज में पर्युषण 2026 कब है?

Paryushan Parv 2026 श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के अनुसार पर्युषण महापर्व 8 सितंबर 2026, मंगलवार से शुरू होकर 15 सितंबर 2026, मंगलवार तक चलेगा।

इसका आठवां और सबसे महत्वपूर्ण दिन संवत्सरी होगा।

तारीख

पर्युषण प्रारंभ: 8 सितंबर 2026
पर्युषण समाप्त: 15 सितंबर 2026
संवत्सरी: 15 सितंबर 2026
कुल अवधि: 8 दिन

जैन समुदाय के कई संस्थागत एवं धार्मिक आयोजनों में भी 8 से 15 सितंबर 2026 की अवधि दी गई है। (Melbourne Shwetambar Jain Sangh Inc.)

पर्युषण के दौरान प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, तप, संयम, साधना और आत्मचिंतन पर विशेष जोर दिया जाता है। अंतिम दिन संवत्सरी पर व्यक्ति अपने पूरे वर्ष के जाने-अनजाने अपराधों और गलतियों के लिए क्षमा मांगता है।


स्थानकवासी और तेरापंथ में पर्युषण की तारीख क्यों अलग सुनाई देती है?

यही वह विषय है जिसे लेकर हर साल कई लोगों के मन में भ्रम रहता है।

श्वेतांबर जैन परंपरा में मूर्तिपूजक, स्थानकवासी और तेरापंथ अलग-अलग धार्मिक परंपराएं हैं। सामान्यतः पर्युषण की अवधि आठ दिनों की ही मानी जाती है, लेकिन संवत्सरी की तिथि को लेकर परंपरागत अंतर हो सकता है।

कुछ जैन पंचांगों के अनुसार:

  • मूर्तिपूजक: संवत्सरी — 15 सितंबर 2026
  • स्थानकवासी/तेरापंथ की कुछ परंपराएं: भगवती संवत्सरी — 16 सितंबर 2026

एक जैन पंचांग स्रोत स्पष्ट रूप से बताता है कि संवत्सरी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मूर्तिपूजक परंपरा में तथा शुक्ल पंचमी को स्थानकवासी और तेरापंथ परंपरा में रखी जाती है।

इसलिए यदि किसी स्थान पर 15 सितंबर और कहीं 16 सितंबर को संवत्सरी की जानकारी मिल रही है, तो जरूरी नहीं कि इनमें से कोई गलत हो। यह संप्रदाय और पंचांग-परंपरा का अंतर हो सकता है।

तेरापंथ या स्थानकवासी समाज के श्रद्धालुओं को अंतिम धार्मिक अनुष्ठान, प्रतिक्रमण या उपवास का संकल्प लेने से पहले अपने स्थानीय आचार्य, साधु-साध्वी, संघ या प्रकाशित पंचांग की तिथि को प्राथमिकता देनी चाहिए।


दिगंबर जैन समाज में 10 दिन का दशलक्षण पर्व

Paryushan Parv 2026 दिगंबर जैन परंपरा में श्वेतांबर पर्युषण के समान समय में मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व दशलक्षण महापर्व है।

यह 10 दिनों तक चलता है और प्रत्येक दिन जैन धर्म के एक उत्तम धर्म पर विशेष चिंतन किया जाता है।

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2026 में कई जैन कैलेंडरों में इसकी शुरुआत 15 सितंबर से बताई गई है, जबकि कुछ पंचांग-आधारित गणनाओं में 16 सितंबर से 25 सितंबर तक की अवधि दी गई है। University of Kansas के Jain religious observance calendar में भी दशलक्षण को भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक माना गया है। 

इसलिए दिगंबर समाज के लिए प्रकाशित स्थानीय पंचांग को अंतिम मानना सबसे उचित होगा।

दशलक्षण के 10 धर्म

  1. उत्तम क्षमा
  2. उत्तम मार्दव
  3. उत्तम आर्जव
  4. उत्तम शौच
  5. उत्तम सत्य
  6. उत्तम संयम
  7. उत्तम तप
  8. उत्तम त्याग
  9. उत्तम आकिंचन्य
  10. उत्तम ब्रह्मचर्य

Paryushan Parv 2026 इन दस दिनों में आत्मसंयम, तपस्या, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से आत्मा को अधिक निर्मल बनाने का प्रयास किया जाता है।


पर्युषण और दशलक्षण में क्या अंतर है?

बहुत से लोग दोनों को एक ही पर्व मान लेते हैं, लेकिन दोनों परंपराओं की धार्मिक पद्धति अलग है।

श्वेतांबर परंपरा

8 दिन — पर्युषण महापर्व

मुख्य केंद्र:

  • कल्पसूत्र वाचन
  • साधना
  • उपवास
  • प्रतिक्रमण
  • स्वाध्याय
  • संयम
  • आत्मचिंतन
  • संवत्सरी
  • क्षमायाचना

दिगंबर परंपरा

10 दिन — दशलक्षण महापर्व

मुख्य केंद्र:

  • दस उत्तम धर्म
  • तप
  • संयम
  • स्वाध्याय
  • ध्यान
  • आत्मशुद्धि
  • त्याग
  • क्षमा
  • अंत में क्षमावाणी

इसलिए समाचार या सोशल मीडिया में केवल “Paryushan 2026” लिखने से भ्रम पैदा हो सकता है। बेहतर है कि खबर में संबंधित परंपरा का नाम भी लिखा जाए।

Paryushan Parv 2026
Paryushan Parv 2026

पर्युषण पर्व का धार्मिक महत्व क्या है?

Paryushan Parv 2026 पर्युषण को जैन धर्म में केवल एक त्योहार के रूप में नहीं देखा जाता। यह आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण का आध्यात्मिक पर्व है।

इस दौरान व्यक्ति बाहरी सुख-सुविधाओं और भौतिक गतिविधियों से ध्यान हटाकर अपने भीतर देखने का प्रयास करता है।

जैन दर्शन में कर्मों का आत्मा पर प्रभाव महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए पर्युषण के दौरान व्यक्ति अपने व्यवहार, विचार और वाणी की समीक्षा करता है।

इसका मूल संदेश है—

मैंने किसे दुख पहुंचाया?
मेरी कौन-सी गलतियां हुईं?
मैंने किसके प्रति क्रोध या अहंकार रखा?
मैं किन बुराइयों को छोड़ सकता हूं?

इसी आत्मचिंतन से क्षमा की भावना उत्पन्न होती है।

जानें क्यों हर जैनी संवत्सरी महापर्व पर मांगते है क्षमा..! क्यों जैन धर्म में हर जीव से माफ़ी मांगी जाती है..? 


पर्युषण में उपवास क्यों रखा जाता है?

Paryushan Parv 2026 पर्युषण के दौरान अनेक श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार अलग-अलग प्रकार के उपवास करते हैं।

कुछ लोग:

  • एकासन करते हैं
  • बियासन करते हैं
  • आयंबिल करते हैं
  • उपवास रखते हैं
  • लंबे तप करते हैं
  • केवल सीमित भोजन लेते हैं

लेकिन यह समझना जरूरी है कि पर्युषण का उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं है।

उपवास का वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्य इंद्रियों पर नियंत्रण, इच्छाओं में कमी और आत्मचिंतन है।

इसलिए किसी व्यक्ति की तपस्या को दूसरे व्यक्ति से तुलना करना उचित नहीं है।


पर्युषण में क्या-क्या किया जाता है?

पर्युषण के दौरान जैन समाज में अनेक धार्मिक गतिविधियां होती हैं।

1. प्रतिक्रमण

प्रतिक्रमण का अर्थ अपने आचरण की समीक्षा करना और गलतियों के लिए प्रायश्चित करना है।

2. स्वाध्याय

जैन आगमों, धार्मिक ग्रंथों और संतों के प्रवचनों का अध्ययन किया जाता है।

3. तप

सामर्थ्य के अनुसार उपवास और अन्य तप किए जाते हैं।

4. संयम

भोजन, वाणी, क्रोध, इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण का प्रयास किया जाता है।

5. ध्यान

मन को शांत करके आत्मा के स्वरूप पर चिंतन किया जाता है।

6. जीवदया

जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा के अनुरूप जीवों के प्रति करुणा और संवेदना का भाव रखा जाता है।


पर्युषण में क्या नहीं करना चाहिए Paryushan Parv 2026?

पर्युषण आत्मशुद्धि का पर्व है, इसलिए इस दौरान व्यक्ति को अपने व्यवहार में भी संयम लाने का प्रयास करना चाहिए।

सामान्य रूप से इन बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है:

  • किसी जीव को जानबूझकर नुकसान न पहुंचाएं।
  • क्रोध से बचें।
  • झूठ बोलने से बचें।
  • अनावश्यक विवाद न करें।
  • अपशब्दों का प्रयोग न करें।
  • भोजन में संयम रखें।
  • अधिक भौतिक सुख-सुविधाओं में न उलझें।
  • दूसरों की निंदा करने से बचें।
  • अहंकार और ईर्ष्या कम करने का प्रयास करें।
  • अधिक से अधिक स्वाध्याय और आत्मचिंतन करें।

हालांकि विशिष्ट आहार और व्रत के नियम संप्रदाय, परिवार, साधु-साध्वी के मार्गदर्शन और व्यक्ति की क्षमता के अनुसार अलग हो सकते हैं।

Paryushan Parv 2026
Paryushan Parv 2026

संवत्सरी क्या है Paryushan Parv 2026 ?

संवत्सरी पर्युषण का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में 2026 में संवत्सरी 15 सितंबर को होगी। इस दिन विशेष रूप से संवत्सरी प्रतिक्रमण किया जाता है।

इस दिन व्यक्ति पूरे वर्ष में मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगता है।

जैन समाज में इस अवसर पर कहा जाता है—

“मिच्छामि दुक्कडम्”

इसका भाव है कि मेरे द्वारा मन, वचन या कर्म से किसी को जाने-अनजाने कोई कष्ट पहुंचा हो तो मैं क्षमा चाहता हूं।

यह केवल एक संदेश या परंपरागत शब्द नहीं, बल्कि अहंकार छोड़कर क्षमा मांगने और दूसरों को क्षमा करने की आध्यात्मिक भावना है।


मिच्छामि दुक्कडम् का महत्व

Paryushan Parv 2026 संवत्सरी का सबसे खूबसूरत संदेश है—क्षमा।

जैन धर्म में क्षमा केवल दूसरों से मांगने की चीज नहीं है, बल्कि स्वयं भी दूसरों को क्षमा करना उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस दिन व्यक्ति अपने रिश्तों में मौजूद:

  • मनमुटाव
  • क्रोध
  • नाराजगी
  • अहंकार
  • शिकायत

को पीछे छोड़ने का प्रयास करता है।

यही वजह है कि पर्युषण का अंतिम चरण व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना से आगे बढ़कर सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक क्षमा का संदेश देता है।


दिगंबर समाज में क्षमावाणी का महत्व

Paryushan Parv 2026 दिगंबर परंपरा में दशलक्षण महापर्व के बाद क्षमावाणी का विशेष महत्व है।

दशलक्षण के दस धर्मों पर चिंतन करने के बाद व्यक्ति अपने मन में सभी जीवों के प्रति क्षमा का भाव रखता है।

यह संदेश देता है कि केवल धार्मिक अनुष्ठान कर लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक धर्म तभी है जब हमारे व्यवहार में:

क्षमा, सत्य, संयम, त्याग, अहिंसा और विनम्रता दिखाई दे।


पर्युषण पर्व और अहिंसा Paryushan Parv 2026

जैन धर्म की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं में से एक है—अहिंसा।

पर्युषण के दौरान अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रखा जाता। व्यक्ति को अपनी वाणी और विचारों में भी हिंसा कम करने का प्रयास करना चाहिए।

किसी को अपमानित करना, कटु शब्द कहना, दुर्भावना रखना या जानबूझकर किसी को मानसिक कष्ट देना भी आत्मचिंतन का विषय बनता है।

इसलिए पर्युषण का संदेश आज के समय में भी बेहद प्रासंगिक है।


पर्युषण का संबंध चातुर्मास से Paryushan Parv 2026

पर्युषण चातुर्मास की अवधि में आता है।

जैन साधु-साध्वियों के लिए वर्षा ऋतु में एक स्थान पर ठहरने की परंपरा रही है। इस अवधि में अधिक समय धर्म, स्वाध्याय और साधना में लगाया जाता है।

पर्युषण इसी आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक गहरा करता है।

जैन यूनिवर्सिटी की सामग्री भी पर्युषण को चातुर्मास की अवधि में मनाया जाने वाला प्रमुख जैन पर्व बताती है। (Jain University)


2026 में पर्युषण की तारीखों को लेकर भ्रम क्यों Paryushan Parv 2026?

सबसे महत्वपूर्ण बात यही है।

जैन पर्वों की तिथियां सामान्य ग्रेगोरियन कैलेंडर की तरह स्थिर नहीं होतीं। वे जैन चंद्र पंचांग और तिथियों पर आधारित होती हैं।

इसके अलावा अलग-अलग जैन परंपराओं में तिथि निर्धारण की पद्धति और पर्व मनाने की परंपरा में अंतर है।

इसीलिए इंटरनेट पर आपको 2026 के लिए:

  • 8 सितंबर
  • 15 सितंबर
  • 16 सितंबर
  • 24/25 सितंबर

जैसी अलग-अलग तिथियां दिखाई दे सकती हैं।

Paryushan Parv 2026 उदाहरण के लिए, कुछ स्रोत दिगंबर दशलक्षण को 15–24 सितंबर बताते हैं, जबकि अन्य पंचांग-आधारित गणना इसे 16–25 सितंबर बताते हैं।

इसलिए अपने स्थानीय जैन संघ/समाज के पंचांग को अंतिम मानना सबसे सुरक्षित और धार्मिक रूप से उचित तरीका है।

जैन धर्म के सबसे बड़े दिन “संवत्सरी” पर हर जैनी क्षमा मांग कर कर्मों से होता है मुक्त 


2026 में कौन-सा पर्व कब? आसान भाषा में समझें

श्वेतांबर मूर्तिपूजक

8 सितंबर 2026: पर्युषण प्रारंभ
15 सितंबर 2026: संवत्सरी
अवधि: 8 दिन

स्थानकवासी/तेरापंथ

पर्युषण आठ दिनों की परंपरा से जुड़ा है, लेकिन भगवती संवत्सरी की तिथि शुक्ल पंचमी के अनुसार 16 सितंबर 2026 रखने वाली परंपराएं मिलती हैं। इसलिए इस समुदाय के श्रद्धालु अपने स्थानीय संघ/पंचांग की तिथि देखें।

दिगंबर

दशलक्षण महापर्व: 10 दिन

2026 में उपलब्ध पंचांगों में 15 सितंबर से 24 सितंबर और 16 सितंबर से 25 सितंबर दोनों प्रकार की गणनाएं मिल रही हैं। अतः दिगंबर समाज में धार्मिक अनुष्ठान या व्रत के लिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना चाहिए।


पर्युषण पर्व हमें क्या संदेश देता है?

पर्युषण का सबसे बड़ा संदेश है—

बाहर की दुनिया को बदलने से पहले खुद को बदलना।

यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी उपलब्धियां क्यों न हों, यदि हमारे मन में क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष भरा है तो वास्तविक शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

आठ दिनों की साधना व्यक्ति को अपने भीतर झांकने का अवसर देती है।

और संवत्सरी हमें याद दिलाती है कि—

गलती मान लेना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल है।
क्षमा मांगना छोटापन नहीं, बल्कि विनम्रता है।
और किसी को क्षमा कर देना आत्मा की बड़ी जीत है।


Paryushan Parv 2026

Paryushan Parv 2026 जैन धर्मावलंबियों के लिए आत्मशुद्धि, संयम, तप, स्वाध्याय और क्षमा का अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है।

श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में 8 से 15 सितंबर 2026 तक 8 दिवसीय पर्युषण महापर्व और 15 सितंबर को संवत्सरी प्रमुख तिथि है। स्थानकवासी और तेरापंथ परंपराओं में संवत्सरी की तिथि को लेकर 16 सितंबर की परंपरा भी मिलती है। वहीं दिगंबर समाज में 10 दिवसीय दशलक्षण महापर्व मनाया जाता है, जिसकी 2026 की शुरुआत की तिथि विभिन्न पंचांगों में 15 या 16 सितंबर दी गई है।

इसलिए पर्युषण के बारे में सबसे सही जानकारी लिखते समय केवल “जैन धर्म में पर्युषण 8 दिन का है” कहना पर्याप्त नहीं है। किस संप्रदाय की बात हो रही है, यह स्पष्ट करना जरूरी है।

नोट: जैन पर्वों की तिथियां तिथि-गणना, संप्रदाय और स्थानीय पंचांग के अनुसार एक दिन आगे-पीछे हो सकती हैं। व्रत, पारणा, प्रतिक्रमण या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने स्थानीय जैन संघ/आचार्य द्वारा जारी पंचांग को अंतिम मानें।

Paryushan Parv FAQ – Frequently Asked Questions

1. पर्युषण पर्व क्या है?

पर्युषण पर्व जैन धर्म का प्रमुख आध्यात्मिक पर्व है, जिसे आत्मशुद्धि, संयम, तप, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और क्षमा के लिए मनाया जाता है। इस दौरान जैन धर्मावलंबी अपने विचारों, वाणी और कर्मों का आत्मनिरीक्षण करते हैं तथा गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं।

2. Paryushan Parv 2026 कब है?

Paryushan Parv 2026 की तारीख जैन संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती है। श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में 8 दिवसीय पर्युषण 8 सितंबर से 15 सितंबर 2026 तक माना जाता है और 15 सितंबर को संवत्सरी मनाई जाती है। स्थानकवासी और तेरापंथ परंपरा में संवत्सरी की तिथि अलग हो सकती है।

3. पर्युषण पर्व कब है?

पर्युषण पर्व की तारीख हर वर्ष जैन पंचांग के अनुसार निर्धारित होती है। इसके अलावा श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में पर्व की अवधि और प्रमुख दिनों में अंतर होता है। इसलिए सही तारीख जानने के लिए संबंधित संप्रदाय के पंचांग को देखना चाहिए।

4. Paryushan Parv कितने दिन का होता है?

श्वेतांबर जैन परंपरा में Paryushan Parv 8 दिनों का होता है। दिगंबर जैन परंपरा में इसी धार्मिक काल से संबंधित दशलक्षण पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है।

5. Shwetambar Paryushan 2026 कब से शुरू होगा?

Shwetambar Paryushan 2026 की मूर्तिपूजक परंपरा के अनुसार शुरुआत 8 सितंबर 2026 से होगी और यह 15 सितंबर तक चलेगा। आठवें दिन संवत्सरी मनाई जाएगी।

6. श्वेतांबर और दिगंबर पर्युषण में क्या अंतर है?

श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण 8 दिनों का प्रमुख पर्व है, जबकि दिगंबर परंपरा में दशलक्षण पर्व 10 दिनों का होता है। दोनों परंपराओं में तप, संयम, आत्मचिंतन, स्वाध्याय और क्षमा को विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन धार्मिक विधियों और पर्व की तिथियों में अंतर हो सकता है।

7. Digambar Dashlakshan Parv क्या है?

Digambar Dashlakshan Parv दिगंबर जैन परंपरा का 10 दिवसीय प्रमुख आध्यात्मिक पर्व है। इसके प्रत्येक दिन जैन धर्म के एक उत्तम धर्म पर चिंतन किया जाता है। इनमें उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य शामिल हैं।

8. दशलक्षण पर्व 2026 कब है?

दशलक्षण पर्व 2026 की तारीख विभिन्न पंचांगों में एक दिन के अंतर के साथ मिल सकती है। उपलब्ध पंचांग परंपराओं में इसे सितंबर 2026 में 10 दिनों तक मनाया जाना बताया गया है। धार्मिक अनुष्ठान, व्रत और पारणा के लिए अपने स्थानीय दिगंबर जैन समाज या पंचांग की तिथि को प्राथमिकता दें।

9. संवत्सरी 2026 कब है?

संवत्सरी 2026 की तारीख श्वेतांबर जैन संप्रदाय की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में 15 सितंबर 2026 को संवत्सरी मनाई जाएगी, जबकि स्थानकवासी और तेरापंथ परंपराओं में 16 सितंबर की तिथि मिलती है।

10. संवत्सरी का क्या महत्व है?

संवत्सरी पर्युषण पर्व का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन जैन धर्मावलंबी प्रतिक्रमण और आत्मचिंतन करते हैं तथा मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। यह दिन अहंकार, क्रोध और द्वेष को छोड़कर क्षमा और मैत्री की भावना अपनाने का संदेश देता है।

11. मिच्छामि दुक्कडम् का अर्थ क्या है?

मिच्छामि दुक्कडम् का भाव है—मेरे द्वारा मन, वचन या कर्म से किसी को जाने-अनजाने कोई कष्ट पहुंचा हो तो मैं क्षमा चाहता हूं। संवत्सरी के अवसर पर जैन धर्मावलंबी एक-दूसरे से क्षमा मांगते और क्षमा करते हैं।

12. Micchami Dukkadam कब कहा जाता है?

Micchami Dukkadam विशेष रूप से संवत्सरी और क्षमायाचना के अवसर पर कहा जाता है। इसका उद्देश्य वर्षभर में हुई जाने-अनजाने गलतियों के लिए क्षमा मांगना और दूसरों के प्रति मन में मौजूद शिकायत या द्वेष को समाप्त करना है।

13. पर्युषण पर्व क्यों मनाया जाता है?

पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण के लिए मनाया जाता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपने क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और गलत आचरण पर विचार करने तथा संयम, अहिंसा, तप और क्षमा को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

14. पर्युषण पर्व का धार्मिक महत्व क्या है?

पर्युषण पर्व का महत्व जैन दर्शन में आत्मा की शुद्धि और कर्मों से मुक्ति की दिशा में किए जाने वाले आध्यात्मिक प्रयास से जुड़ा है। इस दौरान उपवास, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, ध्यान, तप और संयम जैसे धार्मिक अभ्यास किए जाते हैं।

15. पर्युषण में क्या करना चाहिए?

पर्युषण में सामर्थ्य के अनुसार उपवास या तप, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, ध्यान, धार्मिक प्रवचन सुनना, संयम रखना, अहिंसा का पालन करना और दूसरों के प्रति क्षमा एवं मैत्री का भाव रखना चाहिए।

16. पर्युषण में क्या नहीं करना चाहिए?

पर्युषण के दौरान क्रोध, हिंसा, झूठ, अपशब्द, अहंकार, ईर्ष्या और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। भोजन और दैनिक जीवन में भी अपनी धार्मिक परंपरा तथा सामर्थ्य के अनुसार संयम रखने की भावना महत्वपूर्ण है।

17. पर्युषण में उपवास क्यों किया जाता है?

पर्युषण में उपवास केवल भोजन छोड़ने की प्रक्रिया नहीं है। इसका उद्देश्य इंद्रियों पर नियंत्रण, इच्छाओं को सीमित करना और आत्मचिंतन के लिए समय देना है। उपवास या तप अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए।

18. पर्युषण में प्रतिक्रमण क्या होता है?

पर्युषण प्रतिक्रमण आत्मनिरीक्षण और प्रायश्चित की धार्मिक प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों पर विचार करता है तथा उन्हें दोबारा न दोहराने का संकल्प करता है।

19. क्षमावाणी क्या है?

क्षमावाणी दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व के बाद क्षमा मांगने और क्षमा करने का महत्वपूर्ण अवसर है। इसका मूल संदेश है कि सभी जीवों के प्रति मन में मैत्री रखें और जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें।

20. पर्युषण और दशलक्षण पर्व में क्या अंतर है?

पर्युषण मुख्य रूप से श्वेतांबर जैन परंपरा का 8 दिवसीय प्रमुख पर्व है, जबकि दशलक्षण पर्व दिगंबर जैन परंपरा में 10 दिनों तक मनाया जाता है। दोनों का मूल उद्देश्य आत्मचिंतन, संयम, तप, स्वाध्याय और आत्मशुद्धि है।

21. स्थानकवासी और तेरापंथ पर्युषण की तारीख अलग क्यों होती है?

स्थानकवासी और तेरापंथ पर्युषण की अवधि आठ दिनों की परंपरा से जुड़ी है, लेकिन संवत्सरी की तिथि मूर्तिपूजक परंपरा से अलग हो सकती है। इसलिए अलग-अलग जैन पंचांगों में 15 और 16 सितंबर जैसी तारीखें दिखाई दे सकती हैं।

22. क्या Paryushan Parv की तारीख हर साल बदलती है?

हां। Paryushan Parv date जैन चंद्र पंचांग की तिथियों पर आधारित होने के कारण हर वर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर में अलग तारीख पर आती है। साथ ही अलग-अलग जैन संप्रदायों में पर्व की तिथियों में अंतर हो सकता है।

23. पर्युषण पर्व का सबसे बड़ा संदेश क्या है?

पर्युषण पर्व का सबसे बड़ा संदेश आत्मशुद्धि और क्षमा है। यह व्यक्ति को दूसरों की गलतियां देखने से पहले अपनी गलतियों को देखने, अहंकार छोड़ने, संयम अपनाने और सभी जीवों के प्रति मैत्री रखने की प्रेरणा देता है।

 

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Varsa

वर्षा कोठारी एक उभरती लेखिका है। पत्रकारिता जगत में कई ब्रैंड्स के साथ बतौर फ्रीलांसर काम किया है। अपने लेखन में रूचि के चलते समयधारा के साथ जुड़ी हुई है। वर्षा मुख्य रूप से मनोरंजन, हेल्थ और जरा हटके से संबंधित लेख लिखती है लेकिन साथ-साथ लेखन में प्रयोगात्मक चुनौतियां का सामना करने के लिए भी तत्पर रहती है।

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