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प्रकृति ने इंसा को औकात दिखाई तरक्की की चाह में कैद दिलाई

प्रदूषित पर्यावरण से परेशान प्रकृति ने कोरोनावायरस के रूप में अपना विराट रूप इस नश्वर संसार के सामने पेश भर किया है...

Coronavirus Outbreak: Nature imprisoned human 

भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के मुताबिक जब अर्जुन अपनो के संग युद्ध नहीं करना चाह‌ रहे थे, अपनो पर ही कैसे हथियार उठाते इस दुविधा में थे उस वक्त भगवान श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखा उन्हें समझाया था,” यह सब तो मेरे हाथों पहले ही मर चुके हैं। होता वही है जो मैं चाहता हूँ आत्मा कभी भी मरती नहीं है ,बस शरीर रूपी वस्त्र बदल लेती है, इसलिए शोक किस बात का ?”

यह बात जब-जब धरती पर किसी न किसी रूप में भी विपदाएं आती हैं, अपने-आप सही जान पड़ती हैं।

जब-जब अन्याय,पाप व अत्याचार बढ़ते हैं ईश्वर किसी न किसी रूप में दुनिया की बागडोर अपने हाथों में ले लेता है। फिर अंत में सदैव अधर्म पर धर्म‌ की विजय ही होती है।

इसी तरह जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है,स्वत: प्राकृतिक तौर पर हीलिंग होती जाती है। प्रकृति के विनाश का कारण अधिकांश इंसान ही बनता है और इसका परिणाम लगभग हर जीव-जंतु को भुगतना पड़ता है।

प्रदूषित पर्यावरण से परेशान प्रकृति ने कोरोनावायरस (Coronavirus) के रूप में अपना विराट रूप इस नश्वर संसार के सामने पेश भर किया (Coronavirus Outbreak: Nature imprisoned human) है।

प्रकृति अगर अपने‌ कहर बरपाने पर उतर आई तो न जाने क्या होगा ?

यह विश्व सब जीव-जंतुओं के रहने का स्थान है न कि मानव मात्र का और आज प्रदूषण के लेवल में कमी  व पशु- पंछियों का आजादी महसूस करना कहीं न कहीं इंसान का कैदी बन कर रह जाने की वजह से ही संभव हुआ है।

 

आज बड़ी से बड़ी शक्ति क्यूँ

डरी चुपचाप बैठती जा रही है….…

उधर प्रकृति मान ही नहीं रही

क्यूँ इतना ऐंठती ही जा रही है….. ‌

अंतरिक्ष व चाँद पर उड़ने वाली

परमाणु बनाने वाली भी कुछ

नहीं अब कर पा रही है … ‌

प्रकृति से डरना सीखो ,बर्बादी

से अपनी कुपित होती जा रही है….

जाने ऐसी कौन से मुकां पर पहुंचने

की है चाह तुम्हारी, जो अपने लिए

संकट के बीज बोये ही जा रही है… ‌

वक्त रहते समझ ऐ इंसा! आहृवान

ऊपरी शक्ति के सामने ना कभी किसी

की चली थी ना ही चल पा रही है….

इस कोरोना महामारी (Corona) के सामने आज बड़ी से बड़ी शक्तियां निराश हो चुकी है। चीन से शुरू हुआ यह मौत का खेल अमेरिका, लंदन,इटली और अनगिनत अपने को सर्वोपरि मानने वाले देशों को मौत का ग्रास बना चुका है।

लॉकडाउन से घरों में कैद इंसान आज पिंजरे में बंद जीव की तरह तड़प कर रह गया‌ है ऊपर से रोजी-रोटी की चिंता।(Coronavirus Outbreak: Nature imprisoned human)

संपूर्ण संसार को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इंसान ‌‌‌‌की गलतियां उसको कुछ सीखाने की भरपूर कोशिश कर रही हैं।

  उधर कुछ कटृर धर्म पंथियों ने हंगामा खड़ा कर दिया है। जब एकजुट हो समस्त विश्व को इस महामारी के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, उस वक्त मरकज में जमातियों की वजह से कोरोना केसेज में जो बढ़ोतरी हुई वह बेहद शर्मसार करने वाली हरकत है और उससे भी ज्यादा खतरनाक कोरोना की आड़ में सांप्रदायिकता का जहर घोलने वालों की करतूत है।

यह कोरोना खून व धर्म देखकर हमला नहीं कर रहा इसलिए धर्म के नाम पर लड़ने वालों को यह बात भलीभांति समझ जानी चाहिए।

पूरे देश व विश्व के हित में लागू किये गये लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हर कोई करे।

 

“धर्म के कट्टरपंथियों की प्रभु के दरबार में

काश! कोई इक ऐसी जमात लग जाये….

ताकि कोई मरकज मरघट फिर न बन

कर रह जाये…

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

बस सर्व सत्य…

मानवीयता से बड़ा न कोई धर्म-कर्म ना ही

कोई पूजा काश! इसां सहज समझ जाये…”

 

अभी महामारी से निपटना फिर बिगड़ते इकोनॉमिक हालातों से। न जाने विश्व कब इन विपदाओं व हालातों से निजात पाएगा।

इसलिए यह लड़ने-झगड़ने का वक्त नहीं, एकजुट होकर इस महामारी को हराने का वक्त है।

इंसान के अंदर रहने से भर से जब वातावरण इतना शुद्ध हो सकता है तो इसका मतलब इंसान चाहे तो वह कुछ भी कर सकता है।

कोरोना जैसी महामारी से लड़ना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं,करना भी कुछ  खास नहीं है बस एकांतवास ले लें।

मास्क लगा कर रखना,बार-बार हाथ धोना अपनी आदतों में शुमार कर लें।

 शायद इंसान ज्यादा व्यस्त हो गया था। अपने लिए वक्त नहीं निकाल पा रहा था इसलिए कुदरत ने उसको आराम करने का मौका दिया है।

उसके सपनों व ख्वाहिशों का कद कुछ ज्यादा ही ऊंचा हो गया था। उनको लगाम देने के लिए शायद प्रकृति ने यह मात्र एक छोटा सा सबक दिया है,सचेत भर किया(Coronavirus Outbreak: Nature imprisoned human)है।

अब हम इंसानों पर है कि कितना समझ व संभल पाते हैं।

 

“उधर कोरोना कहर बरपा रहा है

इधर अपने को मसीहा समझते लोग….

कैसी विपदा आन पड़ी विश्व पर

इस घड़ी में एकजुट क्यूँ न होते लोग…

धर्म युद्ध का यह उचित वक्त नहीं

इक-दूजे से जुड़ी जिंदगी सचेते लोग…

हर बात का हर घड़ी माखौल ठीक नहीं

अपनो के लिए ही अपने को दूर रखें लोग…

दवाई ही नहीं सिर्फ उपाय स्वच्छता व

मुख पर आवरण एहतियात पूर्ण बरते लोग…

प्रकृति के कहर बरपाने से पहले हराना

पूर्णतया एकांतवास क्यूँ नहीं ले लेते लोग…”

Coronavirus Outbreak: Nature imprisoned human

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shweta sharma

श्वेता शर्मा एक उभरती लेखिका है। पत्रकारिता जगत में कई ब्रैंड्स के साथ बतौर फ्रीलांसर काम किया है। लेकिन अब अपने लेखन में रूचि के चलते समयधारा के साथ जुड़ी हुई है। श्वेता शर्मा मुख्य रूप से मनोरंजन, हेल्थ और जरा हटके से संबंधित लेख लिखती है लेकिन साथ-साथ लेखन में प्रयोगात्मक चुनौतियां का सामना करने के लिए भी तत्पर रहती है।

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