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यूपी का भगवाकरण मोदी की जीत या बीजेपी की!

देशभर और मीडिया जगत में पांच राज्यों (मणिपुर, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) में हुए चुनाव के नतीजों को जानने की उत्सुकता बरक़रार थी, मग़र सबसे ज्यादा नज़रें यूपी  की ओर गड़ी  हुई थीं।आख़िरकार 11 मार्च को इंतज़ार ख़त्म हुआ और चुनाव के सबसे दिलचस्प नतीजे उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिले। एक राज्य जिसका अपना अलग ही महत्त्व है, इस चुनाव में तीन-चौथाई से भी ज़्यादा बहुमत (बीजेपी- 325 सीटें) हासिल कर भगवा रंग में रंग चुका है।

अफ़सोस कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के इस भगवा रंग के आगे अखिलेश की साइकिल की चमक और मायावती के हाथी का नीला रंग फ़ीका पड़ गया है और शायद नतीजे की एक रात पहले ही उत्तर प्रदेश में हुई बारिश में कांग्रेस के हाथ में पकड़े झंडे के भी सब रंग धुल गए।

लखनऊ, बनारस, मथुरा, आगरा, कानपुर और इलाहाबाद जैसे महत्त्वपूर्ण शहरों का प्रतिनिधित्व करता उत्तर प्रदेश इस चुनाव में बीजेपी  के लिए बेहद ज़रूरी था और इस महत्ता को बल मीडिया में हुए मोदीवाद से भी मिला क्योंकि यूपी की ऐतिहासिक जीत में मोदी-मोदी करता मीडिया भी पार्टी के लिए विशेष रूप से सहायक साबित हुआ।

जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक बयार में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी शुमार थे, उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में एक-के-बाद-एक रैलियाँ आयोजित कर जनता के सामने लाकर चुनाव जीतने की भरपूर कोशिश की गई जो पूर्णतया सफल हुई।

इसके अतिरिक्त चाय पे चर्चा, मन की बात, स्मार्ट सिटीज़, एंटी-रोमियो स्क्वॉड और बहुत-सी फलाना-ढिमका रणनीतियों ने यूपी वासियों को बीजेपी की ओर लुभाया।

बीजेपी की जीत का बारीक़ी से विश्लेषण किया जाए तो शाहरुख़ ख़ान की फिल्म “ॐ शांति ॐ” का यह डायलॉग इस पर बिलकुल सटीक बैठता है- “इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।”

चौदह साल में कितनी बार चुनाव आये होंगे मग़र हर बार हार का सामना करना आसान नहीं रहा होगा। दलितों की मुखिया (मायावती) और यादवों के अगुवा (मुलायम सिंह यादव) के आगे भाजपा के हिंदुत्व  वाले  तर्क और जुमले मानो लोगों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगने देते होंगे। 

बीजेपी की जीत के स्तर को देखकर महसूस होता है कि 14 साल पार्टी द्वारा बड़ी ही शिद्दत से मुद्दों पर पकड़ बनायी गई है और फिर चुनावी रैलियों में उनका ज़िक्र किया गया है। 

प्रदेश की रैलियों में अयोध्या का राम मंदिर इस बार चर्चा में कम रहा। इसके साथ ही मुस्लिम वोट बैंक का विशेष ध्यान रखा गया जो शायद बीजेपी के रवैये में एक बड़ा बदलाव रहा । फोकस को हिंदुओं से हटाकर ट्रिपल तलाक़ (जिसे हटाने की बात की गयी) की मदद से थोड़ा मुस्लिम महिलाओं की ओर शिफ्ट किया गया। इसके अलावा काले धन को ख़त्म करने के लिए नोटबंदी (एक ऐसा फैसला जिसे गिनेज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज कराया जा सकता है) जनता के सिर चढ़कर बोली। हालाँकि विरोधी दलों ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर मिडिल क्लास, गरीबों और किसानों को वोट बैंक बनाने की भरपूर कोशिश की, मग़र अफ़सोस!

क्या कारण रहा होगा कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्तर पर जीत प्राप्त की ?

समाजवादी पार्टी में बाप (मुलायम सिंह यादव) – बेटे (अखिलेश यादव) के बीच की दरार, नोटबंदी के बाद बसपा के खाते में जमा 104 करोड़ रुपये (जिसकी बहन जी द्वारा दी गई कोई सफाई जनता के गले नहीं उतरी) , कांग्रेस – सपा का बेजान गठजोड़, यूपी के लड़कों की जनता को कतई ना प्रभावित कर पाने वाली प्रेस वार्ताएं या चौदह साल से बार-बार उसी साइकिल और हाथी की सवारी से बोरियत?

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल ये बीजेपी की जीत नहीं बल्कि सपा, बसपा और कांग्रेस की हार है। नतीजों का केंद्र-बिंदु एक दल की जीत से ज़्यादा बाक़ी तीनों दलों की मात है। यूपी के लड़कों के ऊल-जुलूल बयानों ने मोदी की जीत में उत्प्रेरक का काम किया। 

नतीजों को पचा न पाने पर मायावती का ये कहना है कि पोलिंग के लिए इस्तेमाल की गई ईवीएम मशीनें ख़राब थी। वो गारंटी दे रहीं हैं कि अगर दोबारा चुनाव कराये जाएँ तो इस सत्ता का तख़्तापलट हो जाएगा।

यहाँ तक कि डेली ओ  के एक लेख के अनुसार बीजेपी के ही एक लोकप्रिय एमपी श्री सुब्रमण्यम स्वामी का भी ये आरोप है कि मतदान के लिए इस्तेमाल हुई ईवीएम मशीनों में हेरफ़ेर था। लेख में इस बात का भी ज़िक्र है कि कैसे ईवीएम मशीनों में इस्तेमाल किये जाने वाले सॉफ्टवेयर को डिलीट कर या मतों को अपने हिसाब से एडजस्ट कर नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है।

कम से कम ये सुनकर ही बहनजी को कुछ तो तसल्ली हुई होगी। नतीजों के बाद उनका ये भी कहना है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी ईवीएम मशीनों में ख़राबी पाए जाने के बाद चुनावों के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

शायद मायावती भूल गयी हैं कि कितने लोगों ने तो मोदी जी को ‘डिजिटल इंडिया’ बनने की उम्मीद में वोट दिए होंगे। मोदी जी का मॉडर्निज़्म मायावती नाकार कैसे सकती हैं?

जो भी हो इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि यूपी में बीजेपी का चौदह साल का वनवास खत्म करने में मोदी जी की अहम भूमिका रही है या यूं कहें कि केवल मोदी की लोकप्रियता की बदौलत ही यूपी में बीजेपी को संजीवनी मिली और अंतत: चौदह साल का बीजेपी का वनवास बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के साथ खत्म हुआ। अब सवाल यह उठता है कि क्या यूपी के मतदाता को बीजेपी के चुनावी एजेंडा पर भरोसा था या मोदी पर? यकीनन मोदी पर। इस बात को बल इसी से मिलता है कि जांत-पांत के नाम पर वोट देने वाला यूपी का वोटर पहली बार मोदी के विकास के कमल को खिलाने की हिम्मत जुटा सका। दूसरा, मोदी ही वह इकलौता फैक्टर रहा जिसके कारण लोकल नेता और बीजेपी यूपी के सीएम कैंडिडेट का चेहरा न जानते हुए भी यूपी के वोटर्स ने बीजेपी को बहुमत दिला दिया। यह शायद इतिहास में पहली बार हुआ है जब किसी व्यक्ति का कद पार्टी से ऊपर उठ गया और प्रत्येक वर्ग के मतदाताओं ने (दलित, मुस्लिम, सर्वण) सभी ने केवल एक व्यक्ति विशेष की लीडरशिप में आस्था दिखाते हुए उसके नाम पर वोट दिया। स्टार प्रचारकों की लिस्ट में भी स्वंय पीएम मोदी का नाम सबसे ऊपर होना, आखिरी दो चरणों में खुद मोदी का रोड शो करना दर्शाता है कि मोदी का कद आज बीजेपी से भी ऊपर उठ चुका है। अगर कहें कि बीजेपी को अपने अस्तित्व के लिए मोदी की दरकार है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि ‘अबकी बार बीजेपी सरकार’ का नारा अब नहीं दिखता। 2014 से केवल यही सुनाई देता है कि ‘अबकी बार मोदी सरकार’

ख़ैर, अब तो सब कुछ हो चुका- मतदान भी और हार-जीत का फ़ैसला भी।

होली का उत्सव है। गिले – शिक़वे भूलकर पांच सौ और दो हज़ार के नए रंगीन नोटों के साथ होली मनाइये। फिर ऐसी होली क्या पता कब नसीब हो।

बाक़ी उम्मीद है कि 2019 तक यूपी का भगवा रंग फ़ीका नहीं होगा। वरना ये पब्लिक है, जो अगर 2017 में नहीं जान पायी, तो 2019 तक तो ज़रूर जान लेगी।

“हैप्पी होली विद् हिस्टोरिक विक्ट्री टू मोदी जी !”

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