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दिल्ली ने सांप्रदायिकता को ठुकराया, इसलिए दिल्ली को सांप्रदायिकता के नाम पर ही जलाया?

दिल्ली को जानबूझकर जलाया गया, खून बहाया गया चूंकि दिल्ली ने सांप्रदायिकता को नकारा था...

Editorial on Delhi Violence- राजनीतिक पार्टियों, बिकाऊ मीडिया चैनलों के द्वारा कई महीनों और सालों से जो नफरत के बीज देश की जनता में रोपे जा रहे थे उसकी भयावह फसल आखिरकार दिल्ली हिंसा (Delhi Violence) के रूप में कटकर सामने आई।

दिल्ली हिंसा में मरने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है और इसमें हिंदू-मुस्लमान दोनो संप्रदाय के लोग है।  

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों (Delhi Assembly Elections 2020) में जिन दिल्लीवासियों ने नफरत,सांप्रदायिकता (Delhi rejected communalism) और भड़काऊ भाषणों से इतर प्रेम, विकास, धर्मनिरपेक्षता और काम को वोट दिया था, वहीं लोग आखिरकार कैसे इतने सांप्रदायिक हो गए? कि पूरे तीन दिन तक दिल्ली दंगों (Delhi riots) के रूप में इंसानियत, भाईचारे और प्रेम को जलाकर नफरत, सांप्रदायिकता और कत्लेआम को अमलीजामा पहना दिया (burned Delhi in the name of communalism?)

यह न तो कोई संयोग है और न ही कोई प्रयोग है बल्कि सोचा-समझा सांप्रदायिकता का योग है। दिल्ली की बेकसूर जनता को उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच की सजा दी गई है।

फर्क बस इतना है कि सजा पाने वाले को पता ही नहीं कि सजा उसे किस बात की दी गई है? और किसने दी है?लेकिन गौर से समीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि दिल्ली हिंसा कोई अचानक हुआ उपद्रव नहीं है बल्कि इसकी चिंगारी और बीच-बीच में शोले हम दिल्लीवासी काफी दिनों से झेल रहे थे।

Editorial on Delhi Violence

सभी को पता था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) भारत की दो दिवसीय यात्रा पर है।

खुद को मजबूत इरादों वाला प्रधानमंत्री साबित करने पर उतारू नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और उनकी सरकार में नंबर दो की पोजिशन पर विराजमान और कथित सख्त रवैये के लिए मशहूर गृहमंत्री अमित शाह क्या इतने नादान हो सकते है कि दिल्ली में हिंसा कभी भी भयानक रूप ले सकती है इसका उन्हें अंदाजा ही नहीं था?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। दिल्ली की कानून-व्यवस्था और दिल्ली पुलिस सीधे-सीधे गृहमंत्री अमित शाह के अंतर्गत आती है।

अमित शाह (Amit Shah) को पता था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भारत में अपने दो दिवसीय दौरे पर है और अंत में दिल्ली होकर ही अमेरिका रवाना होंगे फिर कैसे उन्होंने सुरक्षा में इतनी बढ़ी चूक होने दी कि दिल्ली में 1984 के बाद अब 2020 में सबसे ज्यादा भयानक सांप्रदायिक दंगे हो गए। 

ट्रंप के स्वागत समारोह की तैयारियों को अहमदाबाद जाकर देखने वाले अमित शाह कैसे इतने नादान हो सकते है कि अपने महकमे के अंतर्गत आने वाली दिल्ली की कानून-व्यवस्था और दिल्ली पुलिस की किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने की तैयारियों पर उन्होंने कोई समीक्षा तक नहीं की?

यह सवाल इसलिए भी उठ रहे है चूंकि दिल्ली हिंसा के कई वीडियोज में खुद दिल्ली पुलिस कठपुतली, नाकाम और निकम्मी हाथ बांधे खड़ी दिख रही है।

दिल्ली पुलिस के इस रवैये पर सवाल इसलिए भी उठ रहे है चूंकि यह वहीं दिल्ली पुलिस है जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में जब लाइब्रेरी में छात्रों पर लाठी भांजती है तो किसी प्रशासन की इजाजत नहीं लेती लेकिन उत्तर पूर्वी दिल्ली की सड़कों पर जब गुंडें पिस्तौल हवा में लहराकर गोली चलाते दिखते है तब पुलिस कुछ नहीं करती और मूक दर्शक बनी रहती है।

Editorial on Delhi Violence

हालांकि यहां इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ लचर पुलिसवालों के कारण पूरी दिल्ली पुलिस को नाकाम,निकम्मी घोषित नहीं किया जा सकता। कुछ पुलिस वाले हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल सरीखे भी होते है जो जान हथेली पर लेकर दंगाईयों से लोहा लेते है और शहीद हो जाते है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि हमारे जवान हो, पुलिस हो या आम जनता शहादत हमेशा हम ही क्यों दें? कभी इन सांप्रदायिक दंगों को भड़काने वाले नेता और उनके परिजन इन दंगों का शिकार क्यों नहीं होते?

जवाब आपको और हमें मालूम है लेकिन बस हम लोग इन नेताओं की जहरीली बोली में फंसकर एक-दूसरे को मारते है,काटते है और एक-दूसरे का लहू बहाकर इन नेताओं को सत्ता का स्वाद चखाते है।

दिल्ली चुनावों में नफरत भरी बयानबाजी का खुद पीएम मोदी और अमित शाह द्ववारा निंदा न करना, कई सवालों के जवाब खुद देे देता  है।

अमित शाह ने शाहीनबाग को दिल्ली चुनावों में मुद्दा बनाया था। सोचा था कि भाजपा की चिर-परिचित राजनीति हिंदू-मुसलमान में फूट डालों और शासन करो का गुरू मंत्र दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में भी चल जाएगा लेकिन दिल्ली की जनता ने इस बार इस सांप्रदायिकता से भरी राजनीति को जिस तरह से भाजपा को हराकर मुंहतोड़ जवाब दिया उससे इतने कयास तो लगाएं ही जा रहे थे कि शाह का अमित अंहकार इतनी आसानी से इसे हजम नहीं करेगा।

तो क्या दिल्लीवासियों ने भाजपा की जिस सांप्रदायिक सोच को मुहंतोड़ जवाब दिया उसका प्रतिशोध दिल्ली हिंसा है?

इस बात से पूरी तरह इंकार भी नहीं किया जा सकता। खासकर जब गृहमंत्री अमित शाह के अंतर्गत दिल्ली पुलिस और कानून-व्यवस्था आती है। फिर क्यों दिल्ली की सड़कों पर पूरे तीन दिन तक मौत का तांडव मचने दिया गया? 

जो अमित शाह जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने के लिए सभी चुने हुए सांसदों, पूर्व मुख्यमंत्रियों को घर मे्ं ही नजरबंद कर सकते है,

अमरनाथ यात्रा पर गए श्रद्धालुओं को यात्रा पूरी होने से पहले अप्रिय घटना से बचाने के कथित सुरक्षात्मक कदम उठा सकते है, राज्य में पैरामिलिट्री फोर्स और अतिरिक्त सुरक्षा बलों का पूरा जखीरा खड़ा कर सकते है,

Editorial on Delhi Violence

वहीं गृहमंत्री अमित शाह यह जानते हुए भी कि देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाके में 23 फरवरी, रविवार से ही माहौल ज्यादा बिगड़ने लगा है और 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति भारत यात्रा पर है और 25 फरवरी को परिवार संग दिल्ली में होंगे, दिल्ली हिंसा को इतना भयानक रूप से भड़कने देते है।

अमित शाह की इंटेलीजेंस जम्मू-कश्मीर में 370 हटाने के लिए सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए जाग सकती है लेकिन दिल्ली में हिंसा किस हद तक उग्र हो सकती हैै, तब उनकी पुलिस और इंटेलीजेंस दोनों सोती रहती है या सोने का नाटक करती है।

दिल्ली को जानबूझकर जलाया गया, खून बहाया गया चूंकि दिल्ली ने सांप्रदायिकता को नकारा था और इसलिए उसे इससे बड़ी सजा और क्या दी जा सकती थी? कि सांप्रदायिक दंगों के नाम पर ही दिल्ली में दंगे भड़काएं जाएं।

माताओं की कोख को सूना कर दिया जाए। पत्नियों के सुहाग को मिटा दिया जाए। बूढ़े मां-बाप को जवान औलाद का शव उठाने का दर्द दिया जाए।

दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है। पीएम मोदी सीधे शासन करते है। खुद अमित शाह (Amit Shah) देश के गृहमंत्री है और दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर उन्हें ही रिपोर्ट करती है ऐसे में दिल्ली हिंसा का जो भयानक रूप देश और दुनिया ने देखा है वो केंद्रीय नेतृत्व पर सवालिया निशान जरूर लगाता है।

कुछ लोगों का मत है कि दिल्ली हिंसा के लिए अकेले अमित शाह को जिम्मेदार ठहराना बिल्कुल गलत है।

लेकिन उनका यह मत ही इसलिए गलत है चूंकि अमित शाह देश के गृहमंत्री है और दिल्ली पुलिस व कानून-व्यवस्था की जो हालात अमित शाह के कार्यकाल में दिल्ली की हो गई है

वो इससे पहले मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह के समय भी नहीं हुई थी।

ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि दिल्ली चुनावों में गोलियां चली, दिल्ली के विश्वविद्दयलों में बिना प्रशासन की इजाजत के पुलिस ने बर्रबता बरपी और जेएनयू में यहीं दिल्ली पुलिस मूक दर्शक बनी रही ठीक दिल्ली हिंसा की तरह।

क्या यह सब सिर्फ दिल्ली पुलिस की नाकामी है? 

ऐसा नहीं है, वर्ना हालात आज भी काबू मेंं नहीं होते। कई निचले तबके के पुलिसवालों ने बताया है कि उन्हें ऊपर से ऑर्डर नहीं थे कि कुछ ज्यादा करते। ये ऊपर वाले कौन है हम सभी को पता है।

जामिया में कुछ उपद्रवी छात्रों ने जब पत्थरबाजी की तो दिल्ली पुलिस ने उन्हें काबू करने के नाम पर लाइब्रेरी में बैठे छात्रों को पीटा।

इस पर जब पुलिस की किरकिरी होने लगी तो जेएनयू (JNU) मेंं कुछ नकाबपोश गुंडई छात्रों से रात के अंधेरे में हमला करवाया गया  और दिल्ली पुलिस प्रशासन से अनुमति के इंतजार का ढोंग करती केवल बाहर खड़ी देखती रही।

हालांकि जब गुंडे बाहर भागे तब भी पुलिस को इजाजत का इंतजार रहा। फिर थ्योरी दी गई कि अगर बिना अनुमति पुलिस संस्थान में जाए तो आप कहते हो कि अनुमति क्यों नहीं ली और जब अनुमति मिलने तक इंतजार करती है  तो आप लोग कहते हो कि पुलिस मूक दर्शक बनी रही। 

इसी क्रोनोलॉजी को अब दिल्ली हिंसा में भी भुनाया गया है। जी हां, दिल्ली हिंसा (Delhi Violence) का एक अन्य कारण मोदी-अमित शाह का संशोधित नागरिकता कानून (Citizenship Amendment Act) के प्रति देशभर में हो रही खिलाफत को कंट्रोल करना भी है।

Editorial on Delhi Violence

विशेष रुप से सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हिंसा पर जब स्वंय कहा था कि ‘शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र में जनता का अधिकार है और सरकार से असहमति देशद्रोह नहीं है। सरकार और देश दोनों अलग होते है।’

इसलिए जरूरी था कि सरकार के नापाक मंसूबों को अगर पाक-साफ बनाना है तो प्रत्येक विरोध की आवाज को हिंसक बना दिया जाएं और देशद्रोह का नाम दे दिया जाए।

अप्रत्यक्ष रूप से देश को संदेश दिया गया है कि  बगावत करोगे तो बिना बात के मरोगे। बहुंसंख्यकवाद का वर्चस्व खड़ा करने की पाखंडी सोच के नाम पर सिर्फ अल्पसंख्यकों को ही निशाना नहीं बनाया गया बल्कि बहुसंख्यकों को भी बनाया गया है।

वर्ना न कोई रतनलाल शहीद होता, न कोई अंकित शर्मा और न ही राहुल सोलंकी इत्यादि। केवल फुरकान, नजील, शाहीद और अशफाक की लाशे ही आपको देखने को मिलती।

दिल्ली हाईकोर्ट के जज मुरलीधरन ने जब दिल्ली हिंसा पर केंद्र और पुलिस पर सख्ती की तो नाटकीय तरीके से उनका ट्रांसफर कर दिया गया।

हालांकि इसे कोलोजियम के तहत किया गया बताया गया लेकिन टाइमिंग पर सवाल बरकरार है। इतना ही नहीं, अभी भी भड़काऊ भाषणों के नाम पर एफआईआर का मामला केवल विपक्ष पर बनाया गया है। 

दिल्ली पुलिस ने आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन (Tahir Hussain) पर आईबी ऑफिसर अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली हिंसा के लिए सबसे पहले केस दर्ज किया।

कारण दिया गया कि अंकित के परिजनों ने भी उनपर ही आरोप लगाया है। बहुत अच्छी बात है जो भी दिल्ली हिंसा के लिए जिम्मेदार है उनपर तुरंत एफआईआर होनी ही चाहिए।

लेकिन दिल्ली पुलिस का यह एक्शन केवल विपक्षी पार्टियों के नेताओं पर ही क्यों हुआ? दिल्ली हाईकोर्ट के अनुसार तो सबसे पहले एफआईआर कपिल मिश्रा, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकर, प्रवेश वर्मा के भड़काऊ भाषणों पर भी होनी चाहिए थी।

खुद राहुल सोलंकी के पिता ने अपने 26 वर्षीय बेटे की लाश पर फफक-फफककर रोते हुए कहा था कि कपिल मिश्रा मौजपुर में आग लगाकर घर में घुस गया और मेरे बेटे को मरवा दिया।

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दिल्ली हिंसा में मारे गए राहुल सोलंकी के पिता

क्या राहुल सोलंकी अल्पसंख्यक समुदाय से है ? जो उनके बेटे की मौत के लिए जिम्मेदार भाजपा नेता कपिल मिश्रा के नाम पर अभी तक एफआईआर नहीं हुई?

अंकित के परिजनों के आरोप पर एक्शन तो राहुल सोलंकी के परिजनों के आरोप पर एक्शन क्यों नहीं? क्या सिर्फ इसलिए कि कपिल मिश्रा (Kapil Mishra) अब भाजपा के नेता है।

बिकाऊ मीडिया अब भी अंकित शर्मा की बेहरहमी से मौत को और नफरत भड़काने के लिए भुना रहा है चूंकि उसमें आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप लगे है तो दिल्ली हिंसा में बरबरता का शिकार हुए राहुल सोलंकी के पिता के आरोपों को भी क्यों नहीं दिखाया जा रहा, जिसमें उन्होंने कपिल मिश्रा पर आरोप लगाए है कि उनके भड़काऊ भाषणों के चलते हिंसा हुई और बेटा मार दिया गया। क्या उन्हें इंसाफ का हक नहीं है?

Editorial on Delhi Violence

बात भाजपा या आप के नेताओं के दोषी होने या न होने की नहीं है, बात केवल इतना समझने की है कि दिल्ली हिंसा के नाम पर जो मरा वो केवल एक आम आदमी या एक संप्रदाय नहीं था , जिसका मकान,दुकान जला वो भी…केवल एक आम आदमी या एक संप्रदाय नहीं था…. नुकसान आम आदमी पार्टी या भारतीय जनता पार्टी या फिर कांग्रेस के नेताओं का नहीं हुआ बल्कि खून हम आम आदमी का बहा। हमारे भाईचारे का बहा।

दिल्ली हिंसा को शाहीनबाग के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को खत्म करने की ओर पहला कदम मान लेने में भी कोई गुरेज नहीं है।

चूंकि अभी कल ही साउथ-ईस्ट डिस्ट्रिक के डीएसपी ने कहा है कि उन्हें सोशल मीडिया से इनपुट मिले है कि 1 मार्च को मदनपुर खादर से कुछ लोग शाहीनबाग आ सकते है।

हमने विभिन्न इलाकों में अमन कमिटी से बात की है और सभी ने सहमति व्यक्त की कि वे शांतिपूर्ण रहेंगे और विरोध अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया जाएगा। काश इसी तरह का इनपुट दिल्ली नॉर्थ-ईस्ट पुलिस को भी मिल गया होता तो आज दिल्ली जली न होती।

अब गौर से समझें कि यही वो क्रोनोलॉजी है जो जामिया और जेएनयू की हिंसा में इस्तेमाल हुई थी। दिल्ली हिंसा मेें पहले जानबूझकर दिल्ली पुलिस के हाथ बांधे गए और फिर अब शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों पर अगर आने वाले वक्त में आप हिंसा देखते है तो हैरत मत कीजिएगा चूंकि भूमिका तैयार की जा चुकी है कि देखिए अगर हम एक्शन नहीं लेते तो आप लोग ही कहते कि दिल्ली हिंसा की तरह पुलिस चुपचाप बैठी रही।

Editorial on Delhi Violence

दिल्ली हिंसा को भले ही हिंदू-मुस्लिम दंगों के रूप में भुनाया गया लेकिन इसका असल मकसद देश और दिल्ली को संदेश है कि जो भी सरकार से असहमति जताएगा उसे चुन-चुनकर कुचल दिया जाएगा

फिर भले ही वो अल्पसंख्यक हो या फिर बहुसंख्यकवाद का वो तबका जो केवल लोकतंत्र में विश्वास करता है। सांप्रदायिकता से नफरत करता है और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देता है।

इसलिए दिल्लीवासियों ने जो सांप्रदायिकता को नकार कर काम के आधार पर वोट दिया था उसे भाजपा की विचारधारा बर्दाश्त नहीं कर सकी और आगे आने वाले अन्य राज्यों  विशेषकर बंगाल औऱ बिहार की जनता को मैसेज दिया गया कि आप इस सांप्रदायिकता को भूलना भी चाहोगे तो हमारे अंदर इतना जहर है कि हम आपको लड़ाएंगे भी और आप लोगों का आपस में खून बहाएंगे भी।

अब सवाल उठता है कि अगर मोदी सरकार जानबूझकर यह सब करवा रही है तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगमन पर ऐसा करके तो उसकी ही किरकिरी होगी।

फिर अमित शाह पर आरोप बेमानी लगते है। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कट्टरता को बढ़ावा देते है।

इसकी बानगी स्वंय उनके शासनकाल में भारतीयों के प्रति हुए घृणित अपराध (Hate crime) के रूप में आप देख सकते है।

वर्ष 2017 तक अमेरिका में भारतीयों के प्रति 8,400 हेट क्राइम हुए। जिनमें से 24 फीसदी  सिखों के प्रति, 15 फीसदी हिंदुओं के प्रति और 300 फीसदी मुस्लमानों के प्रति हुए है। इतना ही नहीं, 

पहली भारतीय मूल की अमेरिकी सीनेटर कमला हैरिस ने हाल ही में कहा था कि  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नवंबर 2016 के चुनाव के बाद से दक्षिण एशियाई अमेरिकियों के खिलाफ नस्लवाद और अपराधों में वृद्धि हुई है, इसलिए अमेरिकी एकजुट होकर इन मुद्दों से निपटने के लिए सच बोलने का साहस करें।

पिछले साल फरवरी में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास कुचिभोटला को मिडवेस्टर्न यूएस के कंसास में मार दिया गया था।

43 वर्षीय भारतीय मूल के स्टोर के मालिक हर्निश पटेल की दो मार्च को दक्षिण कैरोलिना में उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

39 वर्षीय सिख व्यक्ति दीप राय 3 मार्च को घायल हो गए थे जब कैंट शहर में उनके घर के बाहर एक अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें गोली मार दी थी।

अब आप ही समझिये कि जो व्यक्ति खुद अपने देश में हम भारतीयों के प्रति किए जा रहे भेदभाव व घृणित अपराधों को रोकने में असमर्थ है या कहें कि अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार की ही तरह मौन है वो अपनी उपस्थिति में हुई दिल्ली हिंसा की भला कैसे निंदा करता?

लेकिन गुजरात, उत्तर प्रदेश के बाद अब दिल्ली में जो नफरत और सांप्रदायिकता का मॉडल तैयार किया जा रहा है उसके बाद क्या भारत के पास खुद अपने नागरिकों के प्रति अमेरिका या अन्य देशों में हो रहे हेट क्राइम पर सवाल पूछने का हक रह जाता है?

क्या अपना सिर उठाकर दूसरे देश में अपने नागरिकों को जो सांप्रदायिकता के नाम पर मारा जा रहा है उसके लिए एक्शन लेने की बात कहने की हिम्मत भारत में रह जाएगी?

नफरत, सांप्रदायिकता और भेदभाव ये वो नासूर है जिनका दंश भारत ने 100 साल तक पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में भी झेला था और आज भी झेल रहे है।

फर्क बस इतना है तब एक विदेशी ने हमें लड़वाया था और शासन किया था और आज स्वार्थ, लालच और सत्ता के मद में चूर अहंकारी राजनेता करवा रहे है और हमें मरवा रहे है।

Editorial on Delhi Violence

आज यह स्थिति ज्यादा दुखद इसलिए भी है चूंकि हम कहने को तो 21वीं सदीं में है लेकिन हमारी सोच मध्ययुगीन भारत की तरह कुंठित कर दी गई है।जहां हम सिर्फ हिंदु-मुस्लमान देख रहे है और खूनी खेल खेल रहे है।

गिरती अर्थव्यव्स्था, भंग होती शांतिप्रिय देश की पहचान, बढ़ती बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई पर से आम आदमी का ध्यान भटकाना है तो इन्हें अंग्रेजों के पुराने फॉर्मुले पर भिड़ाओ। फूट डालो-शासन करो। चूंकि तभी सत्ताधारी की सत्ता बची रहेगी।

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