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Sunday Thoughts:कोई क्या बोलता है हमारी पीठ के पीछे, मुझे फर्क

...नहीं पड़ता मुंह पर बोलने की औकात नहीं, मेरे लिए इतना काफी है।

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कोई क्या बोलता है हमारी पीठ के पीछे, मुझे  फर्क नहीं पड़ता
मुंह पर बोलने की औकात नहीं, मेरे लिए इतना काफी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बहुत जरूरी है ज़िन्दगी में थोड़ा खालीपन, क्योंकि……!!
यही वो समय है जहां हमारी मुलाकात हमसे होती है..

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

टूटने का मतलब खत्म होना नहीं होता,
कभी कभी टूटने से जिंदगी की नई शुरुआत होती है..!!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

माना कि मेरे झुक जाने से सब कुछ हल हो जाएगा,
लेकिन इससे मेरे किरदार को काफी नुकसान हो जायेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

वो मंज़िल ही बदनसीब थी जो हमें पा ना सकी,
वरना जीत की क्या औकात जो हमें ठुकरा दें।

 

 

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……. “डर”……
मृत्यु को नही रोक सकता,
ये जीवन को रोकता है !

जितने वाला ही नहीं बल्कि कहाँ पर क्या हारना है..!!

ये जानने वाला भी सिकन्दर होता है..!!

 

 

 

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Dropadi Kanojiya

द्रोपदी कनौजिया पेशे से टीचर रही है लेकिन अपने लेखन में रुचि के चलते समयधारा के साथ शुरू से ही जुड़ी है। शांत,सौम्य स्वभाव की द्रोपदी कनौजिया की मुख्य रूचि दार्शनिक,धार्मिक लेखन की ओर ज्यादा है।

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