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8 Years of Modi led BJP Government: राफेल डील से तीन कृषि कानूनों तक,भाजपा सरकार के 9 विवादित निर्णय

इन आठ सालों में मोदी सरकार ने देश के लिए कई अहम और विवादास्पद फैसले लिए,जिनके चलते सरकार न केवल विपक्ष के निशाने पर आई बल्कि कई मौकों पर घिरती दिखी।

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आज से आठ साल पहले 26 मई 2014 को पीएम नरेंद्र मोदी(Narendra Modi)नित भाजपा सरकार(BJP Govt)ने केंद्र में सत्ता की कमान संभाली थी।

आज 26 मई 2022को मोदी नित भाजपा सरकार के केंद्र में 8 साल पूरे हो गए(8-Years-of-Modi-led-BJP-Government-9)है।

इन आठ सालों में मोदी सरकार ने देश के लिए कई अहम और विवादास्पद फैसले लिए,जिनके चलते सरकार न केवल विपक्ष के निशाने पर आई बल्कि कई मौकों पर घिरती भी(8-Years-of-Modi-led-BJP-Government-9-controversial-decisions-Rafael-to-three-new-farm- laws-details)दिखी।

फिर चाहे वह रक्षा क्षेत्र में राफेल डील का मामला हो,जम्मू-कश्मीर से धारा 370(Article 370)हटाने का निर्णय हो या फिर विवादास्पद तीन कृषि कानून(New Farm Laws),जिन्हें अंतत: मोदी सरकार को किसानों के आंदोलन के चलते वापस लेना ही पड़ा।

केंद्र में आठ साल पूरे करने पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) 30 मई से 14 जून तक बड़े स्तर पर जश्न की तैयारी कर रही है।

 

 

ऐसे में चलिए बताते है मोदी सरकार(PM Modi)के वो 9 विवादित निर्णय जिन्हें लेने के बाद भाजपा सरकार घिरती नजर आई:

8-Years-of-Modi-led-BJP-Government-9-controversial-decisions-Rafael-to-three-new-farm- laws-details:

 

1.नोटबंदी

मोदी सरकार भले ही 2014 में  सत्ता में आई हो,लेकिन उन्होंने सबसे बड़ा और विवादित फैसला दो साल बाद 8 नवंबर 2016 को लिया,जब रातों रात पूरे देश में मोदी सरकार ने सभी 500 और 1,000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण यानी डीमोनेटाइजेशन(Demonitisation)की घोषणा कर दी।

सरकार के इस फैसले को नोटबंदी कहा गया। सरकार ने नोटबंदी(Notebandi)किए गए बैंकनोटों के बदले में ₹500 और ₹2,000 के नए नोट जारी करने की घोषणा की थी।

नोटबंदी के बाद कई महीनों तक देश में लोग अपने पुराने नोट बदलवाने के लिए अफतार-तफरी के माहौल में अपने कामधाम छोड़कर बैंकों में लंबी कतार लगाकर खड़े दिखे।

लोगों को पुराने नोट जमा करने और नए नोट हासिल करने के लिए बैंकों में लंबी लाइनें लगानी पड़ीं।

सिर्फ रसूखदार ही नहीं बल्कि छोटे से छोटे आदमी और यहां तक की गृहणियों तक को अपनी जमा-पूंजी बैंको में डिपॉजिट करवानी पड़ी,जिसके चलते कई लोगों की घंटों लाइनों में लगने और अफरा-तफरी के कारण जान तक चली गई।

सरकार ने यह निर्णय कालाधन वापस लाने और डिजिटलीकरण के नाम पर लिया। हालांकि जब आरबीआई की रिपोर्ट सामने आई कि महज 1फीसदी 500-1000के नोट वापस नहीं आएं,तो मोदी सरकार विपक्ष और जनता के निशाने पर भी आई।

जिसके बाद तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने अपने पद से बाद में इस्तीफा भी दे दिया था।

 

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2.सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर LAC पर चीन से विवाद तक
18 सितंबर 2016 को पाकिस्तान के आतंकियों ने उरी में सेना के बेस पर हमला कर 19 जवानों को शहीद कर दिया था। इसके जवाब में 28 सितंबर को भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक(Air Strike) की थी।

सेना की इस कार्रवाई पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी(Rahul Gandhi)ने सरकार पर ‘खून की दलाली’ के आरोप लगाए। वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सबूत की मांग कर दी थी। इनके अलावा कांग्रेस नेता संजय निरुपम समेत कई नेताओं ने वास्तविकता पर सवाल उठाए थे।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत और चीन के बीच(India-China border tension) तनाव जारी है। ताजा विवाद जून 2020 में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद शुरू हुआ था।

उस दौरान 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। कहा जा रहा था कि साल 1975 के बाद यह दोनों देशों के बीच सबसे हिंसक आमना-सामना था। दोनों देशों के आरोपों के बीच भारत में विपक्ष ने भी सरकार पर आरोप लगाए थे।

विपक्षी दल लगातार भारतीय क्षेत्र में चीनी दखल की बात पर सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने सदन में इस मुद्दे पर बहस की भी मांग की थी।

राहुल गांधी ने कहा था कि सरकार इस बात को नहीं जानती कि चीन से कैसे निपटा जाए। उन्होंने कहा था, ‘चीन की हरकतों को अभी नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी मुश्किलें खड़ी करेगा।’

पीएम मोदी ने कहा कि भारतीय क्षेत्र में कोई नहीं आया लेकिन रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड हुई रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया गया कि चीन ने भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण किया है,इससे सरकार निशाने पर आई।हालांकि विवाद बढ़ने पर वेबसाइट से रिपोर्ट को हटा लिया गया। इस मुद्दे पर अभी तक सरकार राहुल गांधी और विपक्ष के निशाने पर है।

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3.राफेल डील विवाद: NDA और UPA के मापदंडों पर डील की तुलना
सितंबर 2016 में भारत ने फ्रांस सरकार के साथ 36 नए राफेल विमानों(Rafael Aircrafts) के लिए 7.87 बिलियन यूरो का करार किया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अनुबंध के तहत भारत को मीटियोर और स्कैल्प मिसाइल जैसे हथियार, 5 साल का सपोर्ट पैकेज शामिल है। फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन ने राफेल का निर्माण किया है।

आरोप लगे थे कि सरकार हर विमान को 1670 करोड़ रुपये से ज्यादा में खऱीद रही है। जबकि, UPA सरकार में यह डील मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट्स (MMRCA) पर चर्चा के दौरान 526 करोड़ रुपये में हुई थी।

नवंबर 2017 में कांग्रेस ने राफेल लड़ाकू विमान की डील में ‘बड़े घोटाले'(Rafael Deal Scam)का आरोप लगाया था। पार्टी ने कहा था कि अनुबंध ने खरीदी प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।

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कांग्रेस ने सरकार पर डिफेंस पब्लिक सेक्टर यूनिट की कीमत पर ‘क्रोनी पूंजीपति दोस्तों’ को मदद पहुंचाने के आरोप लगाए थे।

कांग्रेस का कहना था कि फ्रांस के साथ की गई डील में तकनीक ट्रांसफर की बात नहीं थी और इससे राजकोष को ‘अपूरणीय’ नुकसान हुआ था।

 

 

 

 

 

4.CAA विरोधी आंदोलन: आग की लपटों में सुलग रही थी दिल्ली
साल 2019 में सरकार के नागरिकता (संशोधन) कानून का जमकर विरोध हुआ। कहा जा रहा है कि इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम प्रवासिों के लिए भारत की नागरिकता की प्रक्रिया आसान करने की बात कही थी।

लेकिन इसमें हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय को शामिल करना और मुसलमानों को अलग रखने के चलते विवाद खड़ा हो गया था। उस दौरान दिल्ली के शाहीन बाग में महीनों लंबा प्रदर्शन चला था।

कानून के खिलाफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, दिल्ली और यूनिवर्सिटी समेत कई शैक्षणिक संस्थानों और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

विपक्ष ने भी दावा किया था कि यह कानून संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ था और धर्म के आधार पर भेदभाव करता था। 23 फरवरी को 2020 को CAA समर्थकों और विरोधियों(CAA Protest) के बीच पूर्वोत्तर दिल्ली में विवाद हुआ, जिससे दंगा भड़क गया था। इस हिंसा ने सांप्रदायिक रूप लिया, जिसमें अगले 10 दिनों में ही 53 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। राजधानी में कई घर, दुकानें आग के हवाले कर दी गई थी।

 

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5.जम्मू कश्मीर से धारा 370 का निरस्तीकरण

मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को एक बड़ा कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष रूप से बनाई गई धारा 370(Article 370 remove) तथा अनुच्छेद 35-ए के प्रावधानों को निरस्त कर दिया।

यह मोदी सरकार के सबसे बड़े फैसलों में से एक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त थे।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर(Jammu-Kashmir)के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए होता था।

कश्मीर से इस अनुच्छेद को हटाने के लिए भाजपा ने सरकार में आने से पहले अपने घोषणा पत्र में इसकी घोषणा की थी। सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद को हटाया व इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया।

इसके अलावा लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश के रूप में घोषित किया। निर्मला सीतारमण ने संसद को बताया था कि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाने के बाद, 890 केंद्रीय कानून वहां लागू हो गए हैं।

भले ही सरकार यह निणर्य इसलिए लेकर आई थी कि घाटी में आतंकवाद कम होगा और देश का कोई भी नागरिक अब जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीद सकेगा। हालांकि इस कानून के हटने के बाद केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में जमीन तो किसी भी राज्य के नागरिक खरीद सकते है लेकिन आतंकवाद का खात्मा अभी तक नहीं हुआ है।

मौजूदा वक्त में घाटी में कश्मीरी पंडितों पर हमले(Kashmiri Pandits attack)बढ़ते जा रहे है। इससे सरकार विपक्ष और कश्मीरी पंडितों के निशाने पर है।

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6.तीन कृषि कानून लाने से लेकर वापसी तक: सड़क से संसद तक चला संग्राम
5 जून 2020 को सरकार ने तीन कृषि कानून(New Farm Laws)जारी किए। महज 2 महीनों के बाद ही देश में इन कानूनों को लेकर उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया था।

25 सितंबर 2020 को एक ओर जहां किसान ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति(AIKSCC) के आह्वान पर विरोध में उतर आए।

वहीं, अगले ही दिन यानि 26 सितंबर को NDA से शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने रास्ते अलग कर लिए थे।

इस आंदोलन को खत्म करने के लिए किसानों और सरकार के बीच कई दौर की बातचीत हुई। किसानों के समर्थन के लिए कई विपक्षी दल आगे आए थे।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कानूनों पर रोक लगा दी थी। आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली आयोजित हुई, जिसमें जमकर हंगामा हुआ था।

आखिरकार 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गलती स्वीकार करते हुए तीनों कृषि कानून वापस लेने का एलान कर दिया था।

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7.पेगासस जासूसी कांड(Pegasus-Snooping): जासूसी के मुद्दे पर विपक्ष ने साधा निशाना,मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा
18 जुलाई 2021 को खुलासा हुआ कि इजरालयी कंपनी NSO समूह के पेगासस स्पाइवेयर ने भारत में 300 मोबाइल फोन नंबर को निशाना बनाया था।

एक अन्य रिपोर्ट में कहा कि डेटाबेस में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों, राजनेताओं समेत कई लोगों के नंबर शामिल थे। 19 जुलाई को केंद्र ने पेगासस के जरिए निगरानी के आरोपों का खंडन किया था।

20 जुलाई को मानसून सत्र के दौारन संसदीय समिति की तरफ से मामले की जांच की मांग की। वहीं, कई सियासी दलों ने पेगासास जासूसी मुद्दे पर जमकर हंगामा किया था, जिससे सदन की कार्यवाही कई बार अटकी।

इसके बाद 22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court)में याचिका दाखिल हुई, जिसमें SIT जांच की मांग की गई। 27 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने पेगासस के इस्तेमाल के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की थी।

 

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8.किसानों को कार से रौंदने वाला लखीमपुर खीरी कांड: जब उप्र चुनाव से पहले बढ़ गई थी भाजपा की चिंताएं

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी(Lakhimpur Kheri Violence)में बीते साल 3 अक्टूबर को किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। उस दौरान कुल 8 लोगों की मौत हो गई थी।

किसान तिकुनिया-बनबीरपुर रोड पर प्रदर्शन कर रहे थे। किसानों ने दावा किया था कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष ने प्रदर्शनकारियों को वाहन से रौंद दिया था।

उस दौरान विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। सपा के अखिलेश यादव और कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी वाड्रा उस दौरान खासे सक्रिय नजर आए।

शुरुआत में भाजपा नेता मिश्रा ने सभी आरोपों से इनकार किया और दावा किया ‘हिंसा के वक्त मेरा बेटा वहां मौजूद नहीं था।’

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लंबे समय बाद गिरफ्तार हुए आशीष को पहले इलाहबाद हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

उस दौरान शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया था और मिश्रा को सरेंडर करने के आदेश दिए थे। फिलहाल, आशीष जेल में है।

हिंसा के दौरान मारे गए किसानों की पहचान नक्षत्र सिंह, दलजीत सिंह, लवप्रीत सिंह, गुरवेंद्र सिंह के रूप में हुई थी। वहीं, अन्य 8 मृतकों में भाजपा के खेमे को लोग शामिल हैं। जबकि, मामले को कवर कर रहे रतन कश्यप नाम के एक पत्रकार ने भी दम तोड़ दिया था।

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9. कोविड से मौत के आंकड़े: WHO ने भी खड़े कर दिए थे सवाल

कोरोनावायरस महामारी के चलते हुई मौतों के आंकड़ों ने देश में कई बार विवाद खड़ा हुआ। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक रिपोर्ट में दावा किया कि भारत में सरकारी आंकड़ों की तुलना में करीब 10 गुना ज्यादा मौतें हुई हैं।

WHO ने भारत में 47 लाख से ज्यादा लोगों के मारे जाने की बात कही थी। वहीं, इससे पहले अंग्रेजी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी भारत में कोविड से मौत और संक्रमितों की संख्या ज्यादा होने का दावा किया था।

एक ओर जहां WHO की गणना के तरीकों पर सवाल उठाए थे। वहीं NYT की 2021 में आई रिपोर्ट को निराधार बताया था।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था, ‘यह पूरी तरह निराधार है और पूरी तरह झूठी है और कोई सबूत इसका समर्थन नहीं करता है।’

सरकारी आंकड़ों को अनुसार, भारत में अब तक कोरोना संक्रमण के 4 करोड़ 31 लाख 42 हजार 192 मरीज मिल चुके हैं। वहीं, 5 लाख 24 हजार 507 मरीज जान गंवा चुके हैं।

 

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